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ब्लॉग

सिर्फ आतंकवाद पर बढ़ी समझ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच दिवसीय अमेरिका यात्रा खत्म हो गई है. कुलदीप कुमार का कहना है कि यह यात्रा जमीन तोड़ने वाली घटना से ज्यादा सुखद लगने वाले बयानों के लिए जानी जाएगी, हालांकि आतंकवाद पर दोनों नेता करीब आए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई भी काम छोटे पैमाने पर नहीं होता. उनकी हर गतिविधि बड़ी और ऐतिहासिक राजनीतिक या राजनयिक घटना के रूप में पेश की जाती है और उनकी विराट छवि निर्माण का जो आयोजन चुनाव प्रचार के दौरान शुरू हुआ था, वह आज भी जारी है. उनकी अमेरिका यात्रा को भी एक अभूतपूर्व घटना के रूप में उछाला गया और मेडिसन स्क्वेयर गार्डेन में आयोजित कार्यक्रम का हवाला दिया गया जिसमें मोदी ने किसी रॉक स्टार की तरह भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों के सामने मंच पर अपनी वक्तृता का प्रदर्शन करने वाले थे. इस यात्रा के दौरान संयुक्त राष्ट्र महासभा में उनका हिन्दी में भाषण भी होना था. स्वाभाविक रूप से इन सभी आयोजनों से मोदी समर्थकों को न केवल बहुत उम्मीदें थीं, बल्कि घनघोर प्रचार करके बहुत पहले से इन्हें अत्यधिक महत्वपूर्ण बना दिया गया था.

लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा समाप्त होने के बाद ऐसा एक भी संकेत नजर नहीं आता जिसके आधार पर इसे नई जमीन तोड़ने वाली या एक नए अध्याय की शुरुआत करने वाली घटना माना जा सके. अतीत के भारतीय प्रधानमंत्रियों की यात्राओं की तरह ही यह भी कानों को सुखद लगने वाली घोषणाओं और बयानों के लिए अधिक जानी जाएगी, ठोस उपलब्धियों के लिए कम.

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रसिद्ध अमेरिकी समाचारपत्र ‘वॉशिंग्टन पोस्ट' के संपादकीय पृष्ठों पर प्रकाशित एक संयुक्त लेख में दोनों देशों के आपसी रणनीतिक संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का संकल्प व्यक्त किया लेकिन वह लेख भी सदिच्छाओं का पुलिंदा ही लग रहा था जिसे संभवतः दोनों देशों के विदेशमंत्रालयों के अधिकारियों ने मिलकर तैयार किया था. दोनों नेताओं ने मिलकर ‘साथ-साथ चलें' शीर्षक वाला एक विजन दस्तावेज भी जारी किया लेकिन उसमें भी किसी नई नीति का संकेत नहीं है.

मोदी चाहते हैं कि अमेरिकी कंपनियां भारत के रक्षा क्षेत्र में निवेश करें. हालांकि उनकी प्रमुख अमेरिकी कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों से मुलाकात भी हुई, लेकिन उनकी ओर से कोई पक्का आश्वासन नहीं मिला है. फिर, भारत का जोर हमेशा इस बात पर रहा है कि उच्च तकनीकी का हस्तांतरण किया जाए ताकि अंततः भारत अपने बलबूते पर ही उन वस्तुओं या हथियारों का निर्माण कर सके. अक्सर अमेरिकी सरकार की नीतियों के कारण यह संभव नहीं हो पाता. अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि ओबामा प्रशासन इस बारे में चली आ रही नीति को बदलने को तैयार है या नहीं. ऐसे संकेत मिले हैं कि असैन्य परमाणु ऊर्जा सहयोग के क्षेत्र में आई बाधाओं को दूर करने के लिए दोनों ही देश तैयार हैं. लेकिन यदि इस मामले में अमेरिकी सरोकारों को संतुष्ट करना होगा तो मोदी को भारतीय जनता पार्टी के उस विरोध को नजरंदाज करना होगा जो इस करार के होने के समय उसने संसद में किया था.

आतंकवाद के मसले पर ऐसा लगता है कि दोनों देशों के बीच समझ कुछ अधिक बढ़ी है और इसका श्रेय मोदी की अमेरिका यात्रा को दिया जा सकता है, भले ही इसके लिए बदलती अंतरराष्ट्रीय स्थिति ही क्यों न जिम्मेदार हो. अमेरिका अब समझ गया है कि आतंकवादी संगठनों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता क्योंकि उन सबके तार एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं. अल-कायदा का यदि तालिबान के साथ सहयोग-संबंध है तो उसके लश्कर-ए-तैयबा से भी गहरे रिश्ते हैं. हाल में कुख्यात हुए इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया, जो अब सिर्फ इस्लामिक स्टेट के नाम से ही जाना जाता है, में अनेक राष्ट्रीयताओं वाले आतंकवादी लड़ाके हैं. स्थिति यह है कि इन सभी संगठनों के विरुद्ध संयुक्त अभियान छेड़ना अब वक्त का तकाजा बन गया है. भारत भी अब इस बात को समझने लगा है और अमेरिका भी. पहले भारत मध्य-पूर्व के आतंकवाद पर अधिक ध्यान नहीं देता था और केवल पाकिस्तान की ओर से होने वाले आतंकवाद की बात करता था. इसी तरह अमेरिका भी पाकिस्तान की ओर से भारत के विरुद्ध होने वाले आतंकवाद को बहुत महत्व नहीं देता था. लेकिन अब यह स्थिति बदल रही है. लगता है मोदी और ओबामा के बीच इस मुद्दे पर बेहतर सहमति बनी है. भारतीय सेवा क्षेत्र की कंपनियों को अमेरिका में बेहतर पहुंच मिले, इसके लिए मोदी ने ओबामा पर जोर डाला है. उनकी बात कितनी मानी जाएगी, अभी कहना मुश्किल है.

मोदी समर्थकों का पूरा प्रयास था कि मोदी को अभूतपूर्व लोकप्रियता वाले नेता के रूप में पेश किया जाए. इसलिए प्रचार किया गया कि मेडिसन स्क्वेयर पर उनके आयोजन के टिकट बहुत पहले ही बिक गए. बाद में पता चला कि वे मुफ्त बांटे गए थे. दरअसल अमेरिका में भारतीय मूल के 31 लाख अमेरिकी नागरिक हैं और उन्हें इस बात का भारी अफसोस है कि यहूदियों एवं अन्य समुदायों की तरह अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान में उनका प्रभाव क्यों नहीं है. इसलिए वे मोदी के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं. इनमें सफल गुजराती व्यवसायी भी काफी बड़ी संख्या में हैं. लेकिन मोदी की इस ‘ऐतिहासिक' यात्रा के प्रति अमेरिकी मीडिया उसी तरह से उदासीन रहा, जिस तरह से वह अतीत में अन्य भारतीय प्रधानमंत्रियों की यात्राओं के प्रति रहा है. अमेरिकी जनता में अभी तक भारत को जानने की उत्सुकता नहीं बढ़ी है. जब बढ़ेगी तब भारत के बारे में मीडिया भी उसे जानकारी देने का प्रयास करेगा.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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