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विज्ञान

सिरके से कैंसर की रोकथाम

विनेगर के मामूली से टेस्ट से सरवाइकल कैंसर का पता लगाना और उससे होने वाली मौतों को कम करना संभव है. भारत में डेढ़ लाख गरीब महिलाओं में इस विधि से 31 प्रतिशत मौतें रोकी जा सकी हैं.

शिकागो में अमेरिकी सोसायटी ऑफ क्लिनिकल ओंकोलॉजी की बैठक में भारतीय डॉक्टरों की एक टीम ने रिपोर्ट दी है कि कैंसर का पता लगाने के इस प्रोग्राम को यदि व्यापक रूप से लागू किया जाए तो भारत में हर साल 22,000 लोगों को गर्भाशय के कैंसर की वजह से मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकेगा. इतना ही नहीं विकासशील देशों में हर साल 72,000 जानें बचाई जा सकेंगी.

मुंबई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के डॉ. सुरेन्द्र शास्त्री ने अपनी टीम के सर्वे की रिपोर्ट पेश करते हुए बताया, "गर्भाशय के कैंसर से होने वाली मौत में 31 प्रतिशत की कमी हुई. यह बहुत ही अहम था." इस रिपोर्ट से यह भी पता चला कि इस विधि से किसी भी वजह से होने वाली मौत में 7 प्रतिशत की कमी आई हालांकि यह संख्या आंकड़ों के हिसाब से बहुत महत्वपूर्ण नहीं थी.

गर्भाशय का कैंसर

भारत और विकासशील दुनिया के बहुत से हिस्सों में औरतों में कैंसर से होने वाली मौतों में गर्भाशय का कैंसर प्रमुख कारण है. ह्यूस्टन के एंडरसन कैंसर सेंटर की डॉ. कैथलीन श्मेलर ने कहा, "भारत में बताए गए सस्ते स्क्रीनिंग प्रोग्रामों की भारी जरूरत है." शास्त्री ने कहा कि इस भारत में गर्भाशय के कैंसर का पता लगाने का कोई स्क्रीनिंग प्रोग्राम नहीं है. उनका कहना है कि इसकी मुख्य वजह यह है कि विकसित देशों में इस्तेमाल होने वाला पारंपरिक प्रोग्राम लॉजिस्टिक, ढांचे और ऊंचे खर्च के कारण संभव नहीं है. शास्त्री ने कहा, "हमें उम्मीद है कि हमारे नतीजों को भारत और दुनिया भर में गर्भाशय के कैंसर का बोझ घटाने में व्यापक असर होगा."

इस सर्वे में शामिल महिलाओं को मुंबई की 20 झुग्गी झोपड़ी कॉलनियों से चुना गया था. सर्वे की सामाजिक बाधाओं को दूर करने के लिए टीम के सदस्यों ने धार्मिक, राजनीतिक और सामुदायिक नेताओं से मुलाकात की और उनका समर्थन हासिल किया. स्क्रीनिंग प्रोग्राम के लिए डॉक्टरों की टीम ने कम से कम दसवीं क्लास पास युवा महिलाओं को ट्रेनिंग दी और उन्हें बताया कि सिरके का इस्तेमाल कर कैंसर की स्क्रीनिंग कैसे की जाए और उसके नतीजों का आकलन कैसे किया जाए.

टेस्ट सफल

शास्त्री ने बताया कि इस प्रयासों की वजह से स्क्रीनिंग में भागीदारी 89 प्रतिशत रही, जो भारत जैसे देशों के लिए बहुत ही ज्यादा है. सर्वे में 35 से 64 साल की ऐसी महिलाओं को शामिल किया गया था जिन्हें पहले से कोई कैंसर नहीं था. उन्हें अनियमित तरीके से चुन कर या तो एक शिक्षा प्रोग्राम में भेजा गया जिसमें उन्हें कैंसर का पता करने के तरीके बताए जाते थे, या फिर स्क्रीनिंग प्रोग्राम में शामिल किया गया जिसमें यूटेरस की विनेगर के जरिए स्क्रीनिंग की गई, जिसके बाद कैंसर वाले टिशु एक मिनट बाद ही नंगी आंखों से भी दिखने लगते हैं.

सर्वे में शामिल होने वाली महिलाओं को हर दो साल पर चार बार सिरके वाली स्क्रीनिंग में हिस्सा लेना पड़ा. इसके अलावा उनकी सामान्य जांच भी की गई और कैंसर के बारे में शिक्षा दी गई. सभी महिलाओं को सरवाइकल कैंसर के लिए चिकित्सा की सुविधा भी मुहैया कराई गई. स्क्रीनिंग ग्रुप में शामिल महिलाओं में एजुकेशन ग्रुप वाली महिलाओं की तुलना में 31 प्रतिशत कम मौतें हुईं. शास्त्री का कहना है कि इस सर्वे के नतीजों के आधार पर भारत सरकार इस प्रोग्राम को आबादी के आधार पर लागू करना चाहती है. महाराष्ट्र में स्वास्थ्य अधिकारी प्राइमरी हेल्थ वर्करों को स्क्रीनिंग की ट्रेनिंग देने की तैयारी कर रहे हैं ताकि प्रांत में 35 साल से 64 साल की सभी महिलाओं की स्क्रीनिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जा सके.

अहम टेस्ट

बैठक में भाग लेने वाले डॉक्टरों का कहना है कि यह स्क्रीनिंग प्रोग्राम पीएपी टेस्ट प्रोग्राम का अच्छा विकल्प हो सकता है. ओहायो के कैंसर सेंटर में गाइनोकोलोजिकल कैंसर की विशेषज्ञ एलेक्ट्रा पास्केट कहती हैं, "हम स्क्रीनिंग प्रोग्राम में ऐसी जगहों पर विनेगर के इस्तेमाल की बात कर रहे हैं, जहां पीएपी टेस्ट उपलब्ध नहीं है. ऐसे रिसर्च हुए हैं जिनसे पता चला है कि इन कार्यक्रमों की शुद्धता तुलना योग्य है." कोलेराडो कैंसर सेंटर की मोनिक श्पिलमन ने बताया कि ऐसे प्रयास अफ्रीका के कुछ हिस्सों में भी हुए हैं. श्मेलर भी ब्राजील और अल सल्वाडोर में विनेगर तकनीक का इस्तेमाल कर टेस्ट कर रहे हैं. श्पिलमन का कहना है कि इन सस्ते तरीकों से उन महिलाओं का पता किया जा सकता है जिन्हें इलाज की जरूरत है और उन्हें आश्वस्त किया जा सकता है, जिन्हें कैंसर नहीं है.

एमजे/एएम (रॉयटर्स)

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