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ब्लॉग

सियासी दंगल में फिर फंसी दिल्ली

पिछले आठ महीनों में दिल्ली सियासत का ऐसा दंगल बन गई है. यह सब दिल्ली की दो ध्रुवीय प्रांतीय राजनीति में आम आदमी की सेंधमारी का नतीजा है. सियासी पटल पर नवोदित आम आदमी पार्टी ने पुराने धुरंधरों को जमीन पर ला खड़ा किया है.

पिछले साल हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिलने के कारण सरकार के गठन की संभावनाएं खोजने के नाम पर राजधानी राष्ट्रपति शासन के अधीन है. हकीकत यह है कि सरकार की संभावनाएं तलाशने की आड़ में विधायकों को खरीदने की संभावनाएं टटोली जा रही हैं. इतना ही नहीं इस काम में कानून को भी अपने तरीके से हथियार बनाने से नेता बाज नहीं आ रहे हैं.

मगर यहां भी विधायी मर्यादाओं को बचाने में सुप्रीम कोर्ट ही काम आ रहा है. दरअसल विधानसभा भंग करने की मांग को लेकर आम आदमी पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. अदालत के दबाव में ही केन्द्र की भाजपा सरकार को दिल्ली में सरकार के गठन की संभावनाएं तलाशनी पड़ रही हैं. वर्ना रणनीति तो यह है कि मोदी का खुमार उतरता देख दिल्ली विधानसभा को निलंबित रखा जाए जिससे मौका मिलने पर कभी भी सरकार बनाई जा सके. मगर आप है कि भाजपा की इस जुगत को तमाम तिकड़मों के बावजूद भी कामयाब नहीं होने दे रही है.

कानूनी उलझन

हकीकत तो यह है कि इस मामले में कानून की कोई उलझन नहीं है. उलझन है तो सिर्फ नेताओं की मंशा में खोट को लेकर. शायद इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट को भी पहली बार किसी विधानसभा को भंग करने की मांग पर सुनवाई करनी पड़ रही है. जबकि यह स्पष्ट है कि सबसे बड़े दल भाजपा ने पहले ही ईमानदारी का हवाला देकर अल्पमत की सरकार बनाने से इंकार कर दिया था. वहीं आप और कांग्रेस की साझा सरकार का प्रयोग विफल रहा. कांग्रेस ने अब आप को समर्थन देने से तौबा कर ली है. अब इन दोनों के फिर से गठजोड़ की कोई आस नहीं है. ऐसे में सरकार के गठन की भी कोई संभावना नहीं है. इसी का हवाला देकर आप ने सुप्रीम कोर्ट से विधानसभा भंग करने की मांग की है.

इस पर कोई फैसला आता, इस बीच गु्प्त मतदान से दलबदल कानून की बाधाओं को दूर करने का शिगूफा छोड़ दिया गया. दरअसल मौजूदा विधानसभा का गणित कुछ ऐसा है कि बिना जोड़तोड़ के बहुमत का जादुई आंकड़ा पाना मुमकिन नहीं है. ऐसे में 29 विधायकों वाली भाजपा को 35 का जादुई आंकड़ा हासिल करने के लिए दो निर्दलीय विधायकों के अलावा आप या कांग्रेस के चार विधायकों के समर्थन की दरकार होगी. इस राह में दलबदल कानून की बाधा दूर करने के लिए या तो कोई चार विधायक बहुमत साबित करते समय सदन से गैरहाजिर हों या अपनी सदस्यता गंवा कर उपचुनाव में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ कर फिर से किस्मत आजमा लें. लेकिन ये दोनों ही रास्ते अपनाने वालों का सियासी भविष्य जोखिम भरा हैं. ऐसे में कानूनी जानकारों ने दिल्ली अधिनियम की धारा 9 में उपराज्यपाल के विशेषाधिकार से गुप्त मतदान कराकर भाजपा की सरकार बनावाने का रोडमैप तैयार किया. इसे अमजलीजामा पहनाए जाने से पहले ही आप ने भाजपा के एक बड़े नेता का स्टिंग ऑपरेशन को सार्वजनिक कर राजतिलक की तैयारी का पूरा खेल ही बिगाड़ दिया.

आगे का रास्ता

अब 16 साल बाद सरकार बनाने के भाजपाई सपने को हकीकत में तब्दील करने की क्षीण संभावनाओं के बीच चुनाव ही एकमात्र विकल्प दिखता है. हालांकि सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं जिसे मंगलवार को आप की याचिका पर सुनवाई करनी है. मजे की बात तो यह है कि आप स्टिंग ऑपरेशन के टेप और अन्य सबूत अदालत को सौंपेगी. देखना होगा कि इन्हें अदालत कानूनी साक्ष्य के तौर पर कबूल करती है नहीं. अदालत के रुख से इस तरह के स्टिंग ऑपरेशन की वैधानिक मान्यता का भी भविष्य तय हो जाएगा. साथ ही इस मामले को आधार बनाकर विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए गुप्त मतदान संबंधी कानूनी शिगूफे की हकीकत को भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय करने की उम्मीद है. जिससे अन्य राज्यों में इस तरह का सियासी संकट पैदा होने पर गुप्त मतदान की कानूनी मान्यता का असमंजस भी दूर हो सकेगा.

सियासी सच

यह सही है कि किसी भी दल के विधायक मध्यावधि चुनाव नहीं चाहते हैं. मगर आप अपने विधायकों की इस मंशा के खिलाफ जाकर हर हाल में चुनाव चाहती है. क्योंकि हाल ही में हुए उपचुनावों में मोदी लहर की खुमारी अब उतरते दिख रही है. जबकि भाजपा और कांग्रेस इस हकीकत को मानते हुए सरकार बनाने के पक्ष में हैं. मगर आप को लगता है कि अभी चुनाव होने पर भाजपा को नुकसान और उसे लाभ मिलना तय है. ऐसे में माकूल हालात का हर हाल में चुनावी लाभ उठाने के लिए आप किसी भी कीमत पर भाजपा की सरकार नहीं बनने देना चाहती है.

निष्कर्ष

वैसे तो भारत में अल्पमत की सरकारों का सांसद और विधायकों की खरीद फरोख्त जैसे भ्रष्ट तरीकों से बनना अचंभे की बात नहीं है. मगर दिल्ली में यह पहली बार देखने को मिल रहा है कि भ्रष्टाचार विरोधी तप से उपजे नेताओं की नयी जमात करोड़ों रुपये ठुकराकर लोकतंत्र का दीन-ईमान बेचने को तैयार नहीं हैं. शायद इसी का नतीजा है कि अप्रैल 2012 में जंतर मंतर से भ्रष्टाचार के खिलाफ उपजी चिंगारी महज दो साल में दावानल बन कर कई दशक पुराने सियासी छत्रपों की रियासत में भूचाल लाने में कामयाब हो रही है.

ब्लॉगः निर्मल यादव

संपादनः आभा मोंढे

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