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विज्ञान

सिनेमा की विरासत संभालने की सुध आई

भारतीय सिनेमा की विरासत संभाल कर रखने के लिए सरकार एक नई एजेंसी बनाएगी. यह एजेंसी सिनेमा के अलावा सिनेमा के पोस्टर, कलाकारों की पोशाक औऱ फिल्म से जुड़ी दूसरी चीजें भी संभाल कर रखेगी.

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आलम आरा, राजा हरिश्चंद्र, सत्यवान सावित्री ये कुछ ऐसी फिल्में हैं जिनके प्रिंट या तो खत्म हो गए या फिर इस हाल में नहीं हैं कि उन्हें संभाला जा सके. मूक फिल्मों के दौर में बनी एक हजार से ज्यादा फिल्मों में से 10 फिल्में भी अब नहीं बची हैं. बोलती फिल्मों के शुरूआती दौर में बनी फिल्मों का भी कुछ यही हाल है. आलम आरा समेत दूसरी सैकड़ों फिल्मों का अब बस नाम ही बचा है. पर जल्दी ही देश में एक एजेंसी होगी जो फिल्मों के साथ ही उनसे जुड़ी बाकी चीजों को संभाल कर रखेगी. राष्ट्रीय फिल्म विरासत मिशन नाम के इस संस्थान का पहला काम होगा पुरानी फिल्मों को ढूंढकर उन्हें डिजिटल फॉर्मेट में बदलना और फिर उन्हें संभाल कर रखना.

शुरूआत में 8,000 फिल्मों को डिजिटल रूप में बदलने औऱ 2,000 फिल्मों को सुधारने का लक्ष्य रखा गया है.इसके अलावा 5 हजार विडियो टेप औऱ 40 हजार स्क्रिप्ट को भी डिजिटल रूप में बदला जाएगा. साथ ही फिल्मों में काम आने वाले 90 फीसदी से ज्यादा ऐतिहासिक उपकरणों के रखरखाव के भी इंतजाम किए जाएंगे.

इस काम के लिए फिलहाल पांच साल का समय तय किया गया है. शुरूआत सबसे ज्यादा पुरानी फिल्मों से होगी. मिशन फिल्म की जरूरत के आधार पर ये तय करेगा कि किन फिल्मों पर पहले काम किया जाए. मिशन के काम में अपने पास मौजूद फिल्मों की सूची बनाने के साथ ही यह सूची भी बनाएगा कि कौन सी फिल्म या उससे जुड़ी चीज देश में किस एजेंसी या संस्थान के पास मौजूद है. ज्यादातर फिल्में आम जनता के लिए मौजूद नहीं हैं तो एजेंसी इस बात पर भी काम करेगी की निजी कंपनियों की भागीदारी से इन फिल्मों की सीडी बाज़ार में बिकने के लिए दी जा सके.

भारत की सूचना औऱ प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी इसकी चेयरमैन होंगी जो इसके कामकाज पर निगरानी रखेंगी. योजना आयोग ने इस काम के लिए फिलहाल 660 करोड़ रुपये के बजट का प्रस्ताव किया है. हालांकि माना जा रहा है कि इस पर खर्च और ज्यादा आएगा. राज्यों के फिल्म से जुड़े संस्थान भी इस काम में मिशन की मदद करेंगे.

रिपोर्ट: एजेंसियां/एन रंजन

संपादन: एस गौड़

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