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दुनिया

सिंगुर में अब भी नैनो ही मुद्दा

सिंगुर को बंगाल के उद्योग की कब्रगाह कहा जाता है. पिछले सालों की हताशा के बाद विधान सभा चुनावों के दौरान यह इलाका फिर से जिंदा हो उठा है. सिंगुर आंदोलन के कारण सत्ता खोने वाली सीपीएम इस क्षेत्र को फिर से जीतना चाहती है.

"हम बीते आठ साल से अपने जीवन में छाए अंधेरे के मिटने का इंतजार कर रहे हैं. हमारे लिए तो अमावस की काली लंबी रात उसी समय शुरू हो गई थी जब टाटा ने यहां से अपना बोरिया-बिस्तर समेटने का एलान किया था. पता नहीं हमारे जीवन में नई सुबह कब आएगी?" महानगर से कुछ दूर हुगली जिले के सिंगुर इलाके के गोपालनगर गांव के जयदेव दास यह कहते हुए अतीत में कहीं खो जाते हैं. राज्य की बाकी 52 सीटों के साथ पांचवें दौर में 30 अप्रैल को हुगली जिले की सिंगुर सीट के लिए भी मतदान होना है. बीते चुनावों में तृणमूल ने जिले के 18 में से 16 सीटें जीती थीं. लेकिन अबकी स्थानीय नेता भी चुनाव प्रचार में सक्रिय नहीं हैं. यहां से हटने के आठ साल बाद भी इन चुनावों में टाटा की सबसे छोटी कार नैनो ही इलाके में सबसे बड़ा मुद्दा है. नैनो परियोजना का लगभग उजाड़ हो चुका संयंत्र इलाके के लोगों के टूटे सपनों का प्रतीक बन चुका है.

हुगली जिले का यह अनाम कस्बा कोई दस साल पहले उस समय अचानक सुर्खियों में आया था जब टाटा समूह ने यहां अपनी लखटकिया नैनो परियोजना लगाने का फैसला किया था. उस परियोजना की वजह से जमीन की कीमत आसमान छूने लगी और लोगों के सपनों में कई रंग भरने लगे. लेकिन उसके बाद अनिच्छुक किसानो की जमीन वावास करने की मांग में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के नेतृत्व में चले लंबे आंदोलन ने वर्ष 2008 में टाटा को यह परियोजना समेटने पर मजबूर कर दिया. इसी सिंगुर आंदोलन ने वर्ष 2011 में ममता को सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी. तब तृणमूल उम्मीदवार रवींद्रनाथ भट्टाचार्य यहां कोई 35 हजार वोटों से जीते थे. ममता ने सत्ता में आते ही किसानों को उनकी जमीन लौटाने का भरोसा दिया था. उन्होंने इसके लिए कानून भी बनाया था. लेकिन यह मामला अब अदालती पचड़े में फंसा है. जमीन वापसी का लंबा होता इंतजार तृणमूल कांग्रेस के निवर्तमान विधायक रवींद्रनाथ के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है. बीते दिनों सिंगुर में ममता ने माना था कि अब उनके हाथों में कुछ नहीं है. इस मामले में पांच साल भी लग सकते हैं और पचास साल भी.

स्थानीय लोगों की इस नाराजगी को भुनाने के लिए ही सीपीएम-कांग्रेस गठजोड़ के उम्मीदवार और सीपीएम के वरिष्ठ नेता रबीन देव यहां नैनो पर चढ़ कर ही प्रचार करते रहे हैं. लेकिन देब कहते हैं, "यह महज एक संयोग है. इलाके के लोग हमसे सिर्फ एक सवाल पूछते रहे हैं कि क्या हम टाटा को यहां लौटा सकते हैं? वह कहते हैं कि हमारी सरकार बनी तो सिंगुर में नैनो जरूर लौटेगी."

नैनो परियोजना के लिए इच्छा या अनिच्छा से जमीन देने वाले किसानों में भारी हताशा है. टाटा के जाने के तीन साल बाद विधानसभा चुनावों तक तो लोग भावनाओं के ज्वार में बह रहे थे. उनको अपनी दीदी पर पूरा भरोसा था. लेकिन बाद में दीदी ने भी हाथ जोड़ लिए. अब भावनाओं का ज्वार कब का थम चुका है और उसकी जगह हताशा ने ले ली है. बेड़ाबेड़ी गांव के स्वपन माल कहते हैं, "राजनीति करने वाले तो मजे में ही हैं. लेकिन इलाके के युवकों को रोजगार की तलाश में विभिन्न शहरों की धूल फांकनी पड़ रही है."

टाटा की परियोजना लगने की सूचना फैलते ही तमाम छोटे-बड़े कारोबारी सिंगुर में जमीन खरदीने लगे. नतीजतन जमीन की कीमत रातोंरात आसमान छूने लगी थी. लेकिन वह तमाम जमीन अब खाली पड़ी है. जमीन के एवज में मिला मुआवजा तो कब का खत्म हो गया. जिन लोगों ने ममता की बातों में आकर जमीन का मुआवजा नहीं लिया था वे तो न घर के रहे न घाट के. कोलकाता को दिल्ली से जोड़ने वाली नेशनल हाइवे 2 के किनारे नैनो के लिए बना संयंत्र अब उजाड़ हो चुका है. परियोजना की जमीन पर अब पशु घास चरते नजर आते हैं.

तृणमूल कांग्रेस के प्रति सिंगुर के लोगों की नाराजगी और हताशा को भुनाने के प्रयास में जुटे विपक्षी दलों ने नैनो के नाम पर वोटरों का समर्थन हासिल करने के लिए पूरा जोर लगा दिया है. सीताराम येचुरी और सोनिया गांधी व राहुल गांधी समेत तमाम दिग्गज इलाके में चुनावी रैलियां कर चुके हैं. लेकिन राजनेताओं से स्थानीय लोगों का भरोसा ही उठ चुका है और उन्होंने चुप्पी साध रखी है. बीते लोकसभा चुनावों में बीजेपी को सिंगुर इलाके में लगभग 25 हजार वोट मिले थे. ऐसे में यह वोट अहम भूमिका निभाएंगे. क्या बीजेपी इसे बचाए रख सकेगी और नहीं तो फिर यह वोट कांग्रेस-वाम गठजोड़ और तृणमूल कांग्रेस में किसको मिलेंगे, सिंगुर का भविष्य इसी सवाल के जवाब से तय होगा.

रिपोर्टःप्रभाकर

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