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ब्लॉग

साहसिक है दिल्ली सरकार का फैसला

पहले अंबानी बंधुओं और फिर बिजली कंपनियों के खिलाफ मोर्चा खोलने के बाद केजरीवाल सरकार ने अब स्कूल माफिया तंत्र के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. निर्मल यादव नर्सरी दाखिले में कोटों को खत्म करने को सही कदम मानते हैं.

देश भर में शिक्षा के बाजारीकरण की जड़ में बैठे शिक्षा माफिया का सबसे मारक असर राजधानी दिल्ली सहित अन्य बड़े शहरों में देखने को मिलता है. ये वही स्कूल माफिया है जिसकी वजह से दिल्ली में मकान खरीदना आसान माना जाता है लेकिन किसी अच्छे स्कूल में या बच्चे का नर्सरी में दाखिला आकाश से तारे तोड़ने के समान हो गया है. निजी स्कूलों की मनमानी का आलम यह है कि अदालतों में भी इनके खिलाफ शिकंजा कसने की तमाम मुहिमें बेअसर ही रहीं. दिल्ली सरकार ने निजी स्कूलों में नर्सरी दाखिले में जनता से जबरन वसूली का सबसे मारक हथियार बन चुके मैनेजमेंट कोटे को ही खत्म कर दिया.

सामाजिक संगठन स्कूल माफिया तंत्र के खिलाफ पिछले एक दशक से संघर्ष कर रहे थे. केजरीवाल सरकार ने आर्थिक और राजनीतिक तौर से मजबूत स्कूल लॉबी को तगड़ा झटका देकर न सिर्फ मैनेजमेंट कोटा रद्द कर सभी स्कूलों में 75 प्रतिशत सीटें अनारक्षित कोटे में सुरक्षित करने का आदेश जारी कर दिया है. अब सिर्फ 25 प्रतिशत सीटें निर्धन आय वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित रहेंगी.

दरअसल नर्सरी दाखिले को लेकर स्कूलों की मनमानी का खेल यह है कि स्कूल अपनी शत प्रतिशत सीटें मोटी फीस वसूल कर अभिभावकों को बेचते हैं. आलम यह है कि निर्धन आय वर्ग के लिए आरक्षित सीटों पर भी दाखिले के लिए फर्जी आय प्रमाण पत्र बनवाकर धनी सम्पन्न तबके के अभिभावकों से मोटी कीमत वसूलने का प्रचलन दिल्ली में जोरों पर था. सुप्रीम कोर्ट तक के आदेशों को ताक पर रखकर मनमानी कर रहे स्कूलों को काबू में करने की कोशिश केन्द्र सरकार ने भी छोड़ दी थी. केजरीवाल सरकार द्वारा कोटों को खत्म करने के फैसले को शिक्षा लॉबी हाईकोर्ट में चुनौती देगी. ऐसे में दाखिला प्रक्रिया शुरू होने के बाद इस फैसले के फिर से कानूनी पचड़े में पड़ने का खतरा है.

हाईकोर्ट ने एक फैसले में नर्सरी दाखिला प्रक्रिया को निर्धारित करने का अधिकार निजी स्कूलों को ही दे दिया था. अदालत ने सरकार की दखलंदाजी के विकल्प को बेहद सीमित कर सिर्फ निगरानी तक नियत कर दिया. निजी स्कूलों ने दाखिला प्रक्रिया के मानक तय करते हुए ऐसे बेसिरपैर के मानक तय कर दिए जो किसी भी आधार पर मान्य नहीं कहे जा सकते हैं. इनमें किसी बच्चे के माता पिता का धूम्रपान करना, शराब पीना और यहां तक कि मांसाहारी होने पर नकारात्मक अंक देने के मानक शामिल हैं. साथ ही कला, नृत्य और संगीत सहित अन्य विधाओं में पारंगत अभिभावकों के बच्चों को दाखिले में अतिरिक्त अंक देने के मानकों को सरकार ने शिक्षा के अनिवार्य अधिकार कानून के विरुद्ध मानते हुए यह कठोर फैसला किया.

दिल्ली ही नहीं देश भर में बेहतर स्कूलों में प्राथमिक शिक्षा से लेकर कॉलेज शिक्षा तक पढ़ाई के अवसर सीमित और अत्यधिक मंहगे होने के कारण आम आदमी की पहुंच से लगभग दूर हो गए हैं. शिक्षा के इस माफिया तंत्र से निपटने के लिए इस तरह के साहसिक फैसले करना समय की मांग है. इसे लागू नहीं किया गया तो शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित कराना सिर्फ कानून की किताबों तक ही सीमित होकर रह जाएगा.

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