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दुनिया

साल भर में केजरीवाल का करिश्मा

खादी के कुर्ता पायजामे की जगह चेक वाली शर्ट और कारों के काफिले की जगह सिर्फ छोटी सी एक कार. सिर पर गांधी टोपी और हाथ में झाड़ू. दिल्ली चुनाव में इस बार बिलकुल अलग नजारा दिख रहा है.

और यह बदलाव करने वाले हैं आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल, जो 2001 तक इनकम टैक्स अफसर थे और अब भारत में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के प्रतीक बनते जा रहे हैं. चार दिसंबर को भारत की राजधानी में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और राजनीति के पंडितों का कहना है कि वहां एक बड़ा राजनीतिक भूचाल आ सकता है. पार्टी बनाने के साल भर के अंदर अरविंद केजरीवाल तहलका कर सकते हैं.

उनके प्रचार का तरीका भी निराला है. चाहे कितनी भी ठंड हो या हवा चल रही हो, खुली जीप में घूमते हैं. कोई सुरक्षा नहीं. दिल्ली के बाहरी हिस्सों में गांवों में पहुंच कर लोगों से हाथ मिलाते हैं, उनकी समस्या सुनते हैं. यह सब लगातार चार घंटे तक चलता रहता है. रास्ते में छोटे छोटे भाषण भी देते हैं.

हाथ में झाड़ू, सिर पर गांधी टोपी

केजरीवाल का कहना है, "अगर सभी युवा साथ आ जाएं, तो वे देश का चेहरा बदल सकते हैं." उनका दावा है कि आम आदमी पार्टी के 50 फीसदी उम्मीदवार 30 साल से कम उम्र के हैं. उनके रास्ते में समर्थक भी गांधी टोपी पहने घूमते हैं और नेताओं को "खून चूसने वाला" और "चोर" बता रहे हैं. वे हवा में अपना चुनाव चिह्न झाड़ू लहरा रहे हैं, इस दावे के साथ कि इसी झाड़ू से राजनीति की सफाई करनी है.

सर्दियों में शाम भी जल्दी हो जाती है. केजरीवाल को खुली जीप से नीचे उतरना पड़ता है. वह फिर से अपनी छोटी सी नीली रंग की कार में बैठ जाते हैं. उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ कर भारत में सूचना के अधिकार कानून के लिए लड़ाई लड़ी, जो 2005 में हासिल कर लिया गया. इस काम के लिए उन्हें रामोन मैगसेसे अवार्ड भी दिया गया, जिसे एशिया के नोबेल के नाम से जाना जाता है. कुछ साल बाद वह भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के अगुवा अन्ना हजारे के साथ जुड़ गए. दोनों ने साथ मिल कर भारत में आम लोगों के गुस्से को बाहर निकाला और उन्हें इस बात का पाठ पढ़ाया कि भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एकजुट होना क्यों जरूरी है.

Indien Korruption Anna Hazare

अन्ना आंदोलन के दौरान केजरीवाल

अन्ना और केजरीवाल

हालांकि धीरे धीरे अन्ना और केजरीवाल के रिश्तों में दरार पैदा होने लगी, लेकिन केजरीवाल अभी भी अन्ना को अपना गुरु बताते हैं. उनका कहना है कि वह मजबूर होकर राजनीति में आए, "हमें राजनीति में आना पड़ा क्योंकि एक भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम चल रही थी और सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत कानून लाने की बात कही. पर बाद में वह वादे से मुकर गई."

पिछले साल उन्होंने आम आदमी पार्टी बनाई और उसके बाद दिल्ली के चुनाव में लड़ने का फैसला किया. उनकी शुरुआत अच्छी रही और अनुमान लगाया जाने लगा कि 70 सीटों वाली विधानसभा में उन्हें सात या आठ सीटें मिल सकती हैं. लेकिन अचानक कुछ महीनों में उनका जादू चल निकला और अब तो कयास लग रहे हैं कि उनकी पार्टी 30 सीटें भी पा सकती है.

मशहूर हुए केजरीवाल

गूगल करने पर पता चलता है कि भारत में वह सबसे ज्यादा सर्च किए जाने वाले पांच नेताओं में शामिल हैं. पास से गुजरने वाले उनके साथ तस्वीरें भी खिंचवा रहे हैं और वह खुद दो चीजों पर जोर दे रहे हैं, "पहला तो यह कि भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया है कि आम लोगों के बर्दाश्त से बाहर हो गया है. दूसरा जब भी कोई किसी और को हराता है, वह सिर्फ वोटों की अदला बदली होती है, उनके पास ईमानदार विकल्प है ही नहीं."

केजरीवाल ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की तर्ज पर छोटे छोटे चंदे जमा किए और इस तरह 20 करोड़ रुपये की राशि जमा हो गई है. केजरीवाल ने लोगों से कह दिया है कि वह दिल्ली विधानसभा चुनावों के लिए पर्याप्त पैसे जुटा चुके हैं और अब उन्हें कोई चंदा न दे. उन्होंने चंदा देने वालों के नाम भी अपनी वेबसाइट पर जारी किए हैं. हालांकि उन्हें विरोध का भी सामना करना पड़ रहा है और सरकार इस बात की जांच कर रही है कि विदेशों से उन्हें किन लोगों ने चंदा दिया है. वैसे कुछ लोग ऐसी जांच को राजनीति से प्रेरित भी मान रहे हैं. एक मीडिया सर्वे में 77 फीसदी लोगों ने माना कि आम आदमी पार्टी पर विदेशी पैसे के इस्तेमाल के आरोप राजनीतिक साजिश लगते हैं.

अपनी नई तरकीबों की वजह से 44 साल के केजरीवाल के राजनीतिक दुश्मन भी पैदा हुए हैं. उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ मुहिम चलाई, जिससे तमतमाए वाड्रा ने आम आदमी पार्टी (आप) के खिलाफ मशहूर बयान दे दिया, "ये बनाना रिपब्लिक की मैंगो (आम) पार्टी है."

रडार से बाहर

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित लगातार तीन बार पद संभाल चुकी हैं और 75 साल की होने के बावजूद इस बार भी पूरे जोश से मैदान में हैं. उनका कहना है कि वह केजरीवाल की परवाह भी नहीं करतीं, "वह तो हमारे रडार पर भी नहीं हैं."

लेकिन विश्लेषक भानु प्रताप मेहता का कहना है कि केजरीवाल जो कुछ कर रहे हैं, वह भारतीय राजनीति के लिए बिलकुल नया है. हालांकि वह इसकी आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाते हैं लेकिन उनके प्रशासन की तारीफ करते हैं, "जाहिर सी बात है कि हम भ्रष्टाचार से निजात पाना चाहते हैं लेकिन सवाल उठता है कि यह काम कैसे किया जाए."

उनका कहना है, "अगर भ्रष्टाचार दूर हुआ, तो सड़कें मिलेंगी, बिजली होगी, अच्छी शिक्षा और सेहत भी होगी. ऐसा नहीं है कि हमारे देश में इसका समाधान मुमकिन नहीं और ऐसा भी नहीं कि इसके लिए किसी रॉकेट साइंस की जरूरत है."

एजेए/ओएसजे (एएफपी)

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