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ब्लॉग

सामाजिक सुरक्षा सुधारों के असुरक्षित प्रश्न

भारत में 44 श्रम कानूनों की जगह सिर्फ चार श्रम संहिताएं लागू करने की तैयारी की जा रही है. लेकिन आलोचकों का कहना है कि कानूनों को लचीला, सरल और समावेशी बनाने की आड़ में सरकार ने मजदूर हितों से खिलवाड़ किया है.

इन चार श्रम संहिताओं में से वेतन पर बनी श्रम संहिता को मॉनसून सत्र में संसद में पेश करने से पहले कैबिनेट की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा. फिलहाल ये जांच के लिए कानून मंत्रालय के पास है. सुरक्षा और कामकाज की दशाओं पर बनी श्रम संहिता पर इस महीने के अंत तक मंत्रालयों के बीच आपसी बातचीत शुरू होगी. औद्योगिक संबंधों पर बनी श्रम संहिता पर इस समय मंत्रालयों की कमेटी की बहस जारी है जिसमें वित्त मंत्री, श्रम मंत्री और पेट्रोलियम मंत्री और ऊर्जा मंत्री सदस्य हैं. सामाजिक सुरक्षा और कल्याण पर श्रम संहिता प्रतिक्रियाओं के लिए मंत्रालय की वेबसाइट पर डाली गई थी और इसकी मियाद एक महीने से बढ़ाकर दो महीने की गई जो 15 मई को पूरी हो चुकी है. उधर औद्योगिक संबंधों पर श्रम संहिता भी अभी इसी चरण में है. ये तय है कि आने वाले अगलो दो तीन साल में हम पूरी तरह से बदला हुआ श्रम कानून ढांचा देखने वाले हैं.

बुनियादी स्वरूप में ये लेबर कोड्स यानी श्रम संहिताएं एक सकारात्मक मसविदा नजर आते हैं. और श्रम सुधारों की दिशा में इसे बड़ा कदम माना जा रहा है. अपने तेवर और आवरण में ये सुधार जितने दर्शनीय और कल्याणकारी हैं, अपनी अंदरूनी बुनावट और अलिखित निहितार्थों में उतने ही जटिल, अस्पष्ट और श्रम अधिकारों को कमजोर करने वाले लगते हैं. खासकर सामाजिक सुरक्षा से जुड़े सुधार, एक आलोचनात्मक विमर्श की मांग करते हैं. सामाजिक सुरक्षा और कल्याण श्रम संहिता के तहत 166 धाराएं बनाई गई हैं जो 22 खंडों और छह अनुसूचियों में बंटी हैं. कर्मचारी पंजीकरण से लेकर, नियंत्रण और दंड के प्रावधान इसमें रखे गए हैं. देश में 70 करोड़ कामगार हैं जिनमें से 92 फीसदी कर्मचारी, असंगठित और इन्फॉर्मल सेक्टर में काम करते हैं. जाहिर है प्रस्तावित संहिता को इस बड़ी मजदूर आबादी पर ध्यान देना होगा.

विवादास्पद बिंदुओं को देखें तो सबसे पहले ट्रेड यूनियनों की भूमिका एक तरह से समाप्त की जा रही है. कर्मचारियों और नियोक्ताओं के बीच कानून के लिहाज से एक ऐसी पारदर्शिता और बाध्यता विकसित करने का दावा है जिसमें किसी दबाव समूह की बहुत जरूरत नहीं रहेगी. लेकिन नियोक्ता अपना दायित्व नैतिक और कानूनी विवेक के साथ निभा रहा है, ये कौन और कैसे तय करेगा. कर्मचारी की जागरूकता का स्तर भी एक जैसा नहीं होता. उनके पदों का भी एक हाआरकीअल ऑर्डर है जिसमें प्रथम श्रेणी से लेकर चतुर्थ श्रेणी तक के कर्मचारी हैं. किसी निचले स्तर के कर्मचारी के साथ अगर वेतन या सामाजिक सुरक्षा या किसी अन्य विषय पर नाइंसाफी होती है तो क्या वो अकेला अपने दम पर उससे लड़ने में सक्षम होगा. मजदूर यूनियनें ऐसे नाजुक मौके पर ही काम आती हैं. ये बात अलग है कि सार्वजनिक उद्यमों में उनकी भूमिका लगातार सिकुड़ ही रही है. मुक्त अर्थव्यवस्था के इस दौर में छंटनी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं. बड़े औद्योगिक घराने से लेकर मझौले और छोटे कारोबारी उद्यमों के कर्मचारियों की मुश्किलों थम नहीं रही हैं.

सुधार की इस प्रक्रिया में कर्मचारी भागीदारी नहीं दिखती. वेबसाइट में प्रकाशित सामग्री पर सार्वजनिक टिप्पणी की खानापुरी कर दी गई है लेकिन वो सामग्री भी अंग्रेजी में है. प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सामाजिक सुरक्षा के लिए जो राष्ट्रीय परिषद् प्रस्तावित की गई है उसके 21 सदस्यों में से कर्मचारियों के सिर्फ तीन प्रतिनिधि होंगे और वे भी सरकार से नामांकित होंगे. सामाजिक कल्याण परिषद् में ट्रेड यूनियनों के लिए भी कोई जगह नहीं है. इस तरह निर्णय लेने की प्रक्रिया धीरे धीरे एक कड़े केंद्रीकरण का रुख करती हैं. कर्मचारी प्रोविडेंट फंड और राज्य बीमा पॉलिसियों में नियोक्ताओं का अंशदान तीस फीसदी निर्धारित किया जा रहा है जबकि अभी ये साढ़े 31 फीसदी का है. मातृत्व लाभ के योग्य महिला वो होगी जिसने किसी संस्थान में, संभावित डिलीवरी की तारीख से फौरन पहले के 12 महीनों के दौरान कम से कम 80 दिनों की अवधि तक वास्तव में काम किया हो. इस क्लॉज से वे महिलाएं बाहर हो सकती हैं जिनके पास कोई नियमित रोजगार नहीं रहता है. सुधारों में जिस तरह से निजी एजेंसियों से मदद लेने के रास्ते निकाले गए हैं उससे लगता है कि ये एक तरह से दायित्वों का निजीकरण होगा.

आखिरी बात ये कि संहिता में कही भी कर्मचारी के अधिकारों की बात नही है बल्कि हर जगह "लाभ” की शब्दावली से काम चलाया गया है. ये मानो सरकार का संवैधानिक दायित्व नहीं,  दानदाता या परोपकारी एजेंसी हो. सामाजिक सुरक्षा समेत तमाम प्रस्तावित सुधारों पर संसद में तीखी बहस की संभावना है. कड़े एतराज भी होंगे. यूं तो सरकार को इन्हें पास कराने में ज्यादा दिक्कत नहीं आएगी लेकिन एक स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा में नागरिक अधिकारों से जुड़ा संवैधानिक तकाजा ये कहता है कि आननफानन में ऐसी संहिताएं न अमल में आएं जो विशाल कामगार आबादी को एक नये दुष्चक्र में घेर लें. क्योंकि तब न यूनियनें होंगी न नियोक्ता आएंगे, सरकारें चुप रहेंगी, बाकी बची अदालत- तो उन पर पहले ही इतना बोझ है, फिर वहां तक जाने और लड़ते रहने की हिम्मत और संसाधन भी चाहिए.

(21वीं सदी के "गुलाम")

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

 

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