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ब्लॉग

साफ सुथरे चुनाव की चुनौती

संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते भारत में चुनाव जम्हूरियत का महाकुंभ है. अगले महीने भारत के 80 करोड़ से अधिक मतदाता 16वीं बार नई संसद के सदस्य चुनेंगे. निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की है.

विशाल भूभाग पर फैले देश में हर पांच साल बाद होने वाले इस महापर्व का आयोजन भी बड़े पैमाने पर होता है. देश के 28 राज्यों की 543 सीटों के लिए होने जा रहे इस चुनाव में राजनीतिक दलों के अलावा निजी स्तर पर लोगों की भागीदारी इसकी अहमियत को उजागर करती है. महानगरों से लेकर कस्बों और गांव देहातों तक हर गली नुक्कड़ पर चलती राजनीतिक चर्चाओं के अंतहीन होते दौर देश के सियासी मिजाज को दिखाते हैं.

सबसे मंहगा चुनाव

लोकसभा के चुनाव पर इस बार 30 हजार करोड़ रुपये के खर्च का अनुमान है और यह भारतीय संसदीय के अब तक के इतिहास का सबसे खर्चीला चुनाव होने जा रहा है. भारत में चुनाव विश्लेषण से जुड़े संगठन एडीआर की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर अमेरिका के बाद भारत का आम चुनाव दूसरा सबसे मंहगा चुनाव होगा. 2012 में अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में 42 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान था. भारत में चुनाव के प्रति लोगों के क्रेज का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चुनाव के अनुमानित खर्च 30 हजार करोड़ रुपये में सरकारी खजाने की हिस्सेदारी महज 7 से 8 हजार करोड़ रुपये की ही है बाकी खर्च गैरसरकारी स्तर पर होगा. इसमें उम्मीदवारों के खर्च के अलावा कार्पोरेट जगत की भागीदारी भी शामिल है.

भारतीय लोकतंत्र के सकारात्मक विकास के अलावा समय के साथ इसमें तमाम नकारात्मक पहलू भी जुड़ते गए हैं. इसमें राजनीति के अपराधीकरण और चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल की समस्या बीते तीन दशकों में लगातार गंभीर रुप धारण करती गई है. खासकर 80 के दशक में वैश्वीकरण के नाम पर भारत के दरवाजे विश्व बाजार के लिए खुलने के बाद अपराध और कालेधन के गठजोड़ ने समस्या को विकराल रुप दे दिया. इस पर नकेल कसने के लिए चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने काफी प्रयास किए हैं जिनके सार्थक परिणाम अब दिखने लगे हैं.

चुनाव सुधार के लिए राइट टू रिजेक्ट और राइट टू रिकॉल की मांग पिछले कुछ सालों से चली आ रही थी. मतदाताओं के पास उम्मीदवार नकारने का विकल्प नहीं था. लेकिन बीते साल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट द्वारा राइट टू रिजेक्ट को लागू करने का आदेश देने के बाद इस चुनाव में पहली बार मतदाता इसका इस्तेमाल कर सकेंगे. इसके लिए वोटिंग मशीन नोटा बटन जोड़ा गया है. दिसंबर 2013 में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में नोटा के प्रति मतदाताओं के सकारात्मक रुझान को देखते हुए चुनाव आयोग द्वारा जल्द ही इससे जुड़े अन्य प्रावधान भी लागू करने की उम्मीद की जा रही है.

फास्ट ट्रैक कोर्ट की पहल

चुनाव सुधार की दिशा में हाल ही में निर्वाचन आयोग ने एक नई पहल की है. चुनाव संबंधी शिकायतों का निपटारा फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगा. मौजूदा व्यवस्था में चुनाव संबंधी शिकायतें सामान्य अदालतों में चुनाव आयोग के मार्फत निपटाई जाती है और इनके निपटारे में कई साल बीत जाते हैं. फास्ट ट्रैक कोर्ट में नियमित सुनवाई कर फैसला एक साल के भीतर होगा. दिल्ली के मुख्य चुनाव अधिकारी विजय देव ने बाकायदा चुनाव आयोग से अनुमति मांगी है जिससे महिला अधिकारों एवं भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों के लिए दिल्ली में कार्यरत दस फास्ट ट्रैक कोर्ट में चुनाव शिकायतें भी यथाशीघ्र निपटारे के लिए भेजी जा सकें.

नई व्यवस्था में आपराधिक एवं भ्रष्टाचार के मामले में किसी अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए व्यक्ति को चुनाव लड़ने से अयोग्य करार दिया गया है. लेकिन अगर दोषी व्यक्ति निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने की अपील के आधार पर चुनाव लड़ना चाहता है तो उसे लिखित रुप में आयोग को इस बात रजामंदी देनी होगी कि उसकी अपील पर सुनवाई फास्ट ट्रेक कोर्ट में की जाए.

चुनाव सुधार पर कार्यरत संस्थान सीएसडीएस के शोधकर्ता संजय कुमार का कहना है कि यह व्यवस्था बीच का रास्ता मुहैया कराती है. इससे नागरिकों का चुनाव लड़ने का अधिकार भी सुरक्षित रहेगा और राजनीति में अपराधीकरण की समस्या से निपटने में भी मदद मिलेगी. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को दागी नेताओं के आपराधिक मामलों को एक साल के भीतर निबटाने का आदेश दिया है.

आजाद भारत में तकरीबन सात दशकों के सियासी सफर ने चुनाव को लोकतंत्र का महाकुंभ और विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं को सियासी पंथ का दर्जा तो दे दिया है. मगर जिन सियासी धाराओं के संगम पर यह महाकुंभ होता है उनकी साफ सफाई के बिना राजनीति साफ सुथरी नहीं हो पाएगी. यह मकसद चुनाव सुधारों के माकूल प्रयासों से ही संभव हो सकेगा.

ब्लॉग: निर्मल यादव

संपादन: महेश झा

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