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ब्लॉग

साध्य के लिए हर साधन उचित नहीं

सत्तर साल पहले दूसरे विश्व युद्ध के अंत में परमाणु बमों के इस्तेमाल ने अपराधी जापान को पीड़ित जापान बना दिया. डॉयचे वेले के अलेक्जांडर फ्रॉएंड का कहना है कि शांति के लिए जापान को अपने अतीत का सामना करना चाहिए.

हिरोशिमा जापान के पश्चिम में मझौले साइज का गोदीनगर है, राजधानी टोक्यो से सैकड़ों किलोमीटर दूर. नागासाकी भी और पश्चिम में मझौले आकार का गोदीनगर है. सुंदर शहर, प्यारे लोग, सब कुछ बहुत ही सामान्य. ये आज ऐसा है और 70 साल पहले भी ऐसा ही था. इसलिए पहले तो सामरिक रूप से कम महत्व वाले ये शहर अमेरिकी बम बरसाने वालों से बचे रहे. और इसीलिए वे नए चमत्कारी हथियार का आदर्श निशाना बने जिसका वहां पहली बार इस्तेमाल हुआ.

Freund Alexander

डॉयचे वेले के अलेक्जांडर फ्रॉएंड

इस तरह अमेरिका की सेना और वैज्ञानिक पहली बार जांच सके कि परमाणु बम का विनाशकारी प्रभाव कितना भयानक है. पलक झपकते दो शहर नेस्तनाबूद हो गए. 200,000 से ज्यादा लोग मारे गए. उनमें से 90,000 फौरन और दूसरे कुछ दिनों के अंदर. असली माहौल में दुर्भावनापूर्ण परीक्षण. नागासाकी की इस दिन बदनसीबी थी. असली लक्ष्य फुकुओका पर स्याह बादल थे, नागासाकी में आसमान नीला था.

"हे भगवान, यह हमने क्या किया!"

आज सारी दुनिया जापान के इन दो शहरों का नाम जानती है क्योंकि वे इंसानी पतन की एक घटना और परमाणु विनाश की भयवहता का प्रतीक हैं. हिरोशिमा पर बम गिराने वाले विमान के कोपाइलट ने अपनी डायरी में लिखा था, "हे भगवान, यह हमने क्या किया". सिर्फ उसे ही अपनी गलती का अहसास नहीं था. कम से कम नागासाकी पर दूसरा बम गिराया जाना माफ न किया जाने वाला युद्ध अपराध था, क्योंकि इस बीच सारी दुनिया को बम की विनाशकारी शक्ति का पता था. अमेरिकियों ने बाद में इसे यह कहकर उचित ठहराने की कोशिश की कि इसके बिना प्रशांत का युद्ध और लंबा चला होता और युद्ध में और ज्यादा लोग मरे होते. परमाणु बम के इस्तेमाल के बाद ही जापान समर्पण करने के लिए तैयार हुआ.

70 साल पहले बोतल से निकला था जिन्न

इसके अलावा भी कि इतिहासकारों के अनुसार परमाणु बम नहीं, बल्कि युद्ध में रूस के शामिल होने की वजह से जापान समर्पण करने को मजबूर हुआ, मानवता के खिलाफ इस तरह के अपराध को उचित नहीं ठहराया जा सकता. साध्य कभी भी साधन को उचित नहीं ठहरा सकता. अमेरिका बस एक नया हथियार टेस्ट करना चाहता था और अपनी ताकत दिखाना चाहता था. मुख्य रूप से जापान के खिलाफ लेकिन रूस के खिलाफ भी. यहां महाशक्ति अमेरिका ने अपनी ताकत दिखाई और इसके साथ हथियार होड़ की शुरुआत हुई जिसका असर हम आज भी देख रहे हैं. हिरोशिमा और नागासाकी के बाद हर महाशक्ति और वे जो अपने को समझते हैं, बम के इच्छुक हो गए. रूस, फ्रांस, ब्रिटेन, चीन और बाद में भारत और पाकिस्तान. कुछ अन्य देश जो उसके बारे में बात नहीं करते और उत्तर कोरिया जैसे कुछ अन्य जो परमाणु बम के सहारे जिंदा रहना चाहते हैं. और ईरान जो परमाणु बम चाहता है, लेकिन जिसे संभवतः रोका जा सकता है. ये वह जिन्न है जिसे सत्तर साल पहले बोतल से निकाला गया था.

अपराधी है पीड़ित जापान

लेकिन परमाणु बम फेंके जाने के साथ जापान पीड़ित की भूमिका में आ गया. युद्ध की समाप्ति के बाद से जापान इसके बारे में उन अत्याचारों से कहीं ज्यादा याद करता है, जो उसने पड़ोसी देशों में किए. लेकिन पीड़ित जापान दरअसल अपराधी है. अब तक जापान अतीत का सामना करने और पड़ोसियों के साथ मेलमिलाप करने में विफल रहा है. आज जापान का प्रधानमंत्री परमाणु बम के शिकारों के सामने सिर झुकाता है लेकिन साथ ही विजेता अमेरिका द्वारा थोपे गए अहिंसावादी संविधान को बदलना चाहता है.युद्ध में दुश्मन रहे अमेरिका के साथ प्रधानमंत्री शिंजो आबे जापान को शक्तिशाली बनाना चाहते हैं ताकि वह आक्रामक चीन का मुकाबला कर सके. रणनैतिक तौर पर यह समझ में आने वाली बात हो सकती है लेकिन युद्ध के 70 साल बाद भी बहुमत इसका समर्थन नहीं कर रहा है. हथियार और ताकत का प्रदर्शन शांति और स्थिरता नहीं लाते. इसके लिए मेलमिलाप और खुशहाली की जरूरत है. ये सिर्फ जापान के लिए ही नहीं, इलाके के दूसरे देशों के लिए भी युद्ध की विभीषिका का सबक होना चाहिए.

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