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दुनिया

साए में अवैध आप्रवासियों की जिंदगी

जर्मनी में करीब चार लाख लोग अवैध रूप से रह रहे हैं. सही परमिट न होने के कारण ये लोग कई सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं. न ही वे अपना इलाज करा सकते हैं और न ही सरकार से किसी तरह की मदद की उम्मीद कर सकते हैं.

मारिया पंद्रह साल से जर्मनी में रह रही थी. पहचान छिपाने के लिए हमने उसका नाम बदल दिया है. पंद्रह साल में उसका हर दिन एक सा ही रहा. रोज वह ट्राम स्टेशन पर जा कर टिकट खरीदती और काम करने पहुंचती. बारह घंटे कुछ दफ्तरों में झाड़ू पोछा लगाकर वह अपना गुजारा करती. शायद ही कोई ऐसा दिन रहा हो जब उसने बीमारी का बहाना कर या फिर किसी भी और वजह से काम पर जाने से मना किया हो. गर्मियों की एक सुबह उसने काम पर जाने का अपना रास्ता बदल लिया. देर हो रही थी, इसलिए वह रेलवे स्टेशन से होते हुए छोटे रास्ते पर निकल पड़ी. इस रास्ते ने उसकी जिंदगी भी बदल दी.

सामने पुलिस खड़ी थी. जर्मनी में राह चलते पुलिस किसी भी वक्त किसी से भी अपनी पहचान साबित करने को कह सकती है. इसके लिए किसी का अपराधी होना जरूरी नहीं. जरूरी है कि आपका पहचान पत्र हर समय आपके पास हो. लेकिन मारिया के पास तो पिछले पंद्रह साल से कोई पहचान पत्र नहीं था.

बेटी की वजह से राहत

आम तौर पर ऐसे मामले में व्यक्ति को फौरन ही अपने देश लौटा दिया जाता है. लेकिन मारिया की बेटी स्कूल जाती थी. उसने पुलिस वालों से विनती की कि वे ऐसा ना करें, नहीं तो उसकी बच्ची का साल खराब हो जाएगा. मारिया के खिलाफ कार्रवाई हुई, लेकिन उसे बच्ची के स्कूली साल खत्म होने तक जर्मनी में रहने की अनुमति दे दी गयी. उसके बाद उसे अपने देश इक्वाडोर लौटना पड़ा.

मारिया की बेटी जर्मनी में ही पैदा हुई थी. इक्वाडोर के बारे में उसने केवल किताबों में ही पढ़ा था. वह थोड़ी बहुत टूटी फूटी स्पेनिश भी बोल लेती थी लेकिन उसके लिए जर्मनी ही उसका घर था. यह मामला 2009 का है. उस वक्त सिग्रिड बेकर विर्थ ने मारिया की मदद की थी. मारिया को याद करते हुए 61 साल की बेकर विर्थ बताती हैं कि वह अपने पार्टनर के साथ जर्मनी में रह रही थी. उसी से उसे बेटी भी हुई. लेकिन न तो पार्टनर के पास परमिट था और न ही मारिया के पास.

बेकर विर्थ के पास हर रोज कई ऐसे मामले आते हैं. 2003 में उन्होंने अवैध रूप से जर्मनी में रह रहे लोगों की मदद के लिए मेडीनेट्स बॉन नाम की संस्था शुरू की. तब से वह डॉक्टरों के साथ मिल कर इस तरह के लोगों को चिकित्सीय मदद दिलवा रही हैं. वह बताती हैं कि केवल बॉन में ही करीब चार हजार लोग अवैध रूप से रह रहे हैं. हफ्ते में एक बार ये लोग उनसे आ कर मिल सकते हैं.

मददगार के बंधे हाथ

आम तौर पर तो बुखार और खांसी जुकाम से जूझ रहे लोग ही यहां आते हैं पर बेकर विर्थ बताती हैं कि एक बार ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित महिला भी मदद की गुहार ले कर आई. लेकिन ऐसे मामलों में उनके हाथ बंध जाते हैं. सरकार का कहना है कि वह उसी हाल में मदद कर सकती है अगर लोग कानूनी रूप से उनके पास आएं.

शरणार्थी जर्मनी में रहने की अनुमति मांग सकते हैं बशर्ते वे इस बात को साबित कर सकें कि उनके देश में रहने लायक स्थिति नहीं है. अन्य मामलों में सरकार इलाज पर तभी खर्च करने को तैयार होती है अगर लोग इस बात की गारंटी दें कि इलाज के बाद वे लौट जाएंगे. लेकिन ऐसा कम ही होता है.

ऐसे में बेकर विर्थ को इस बात का दुख है कि वह इन लोगों की केवल एक हद तक ही मदद कर सकती हैं. वह नहीं जानती कि जर्मनी से चले जाने के बाद मारिया और उसकी बेटी का क्या हुआ. बस वह हर रोज मारिया और उसके जैसे लोगों की सलामती की दुआ करती हैं.

रिपोर्ट: नास्तास्या श्टोएडल/ईशा भाटिया

संपादन: महेश झा

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