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ब्लॉग

साइबर जगत में स्कैम इंडिया

लोकसभा चुनाव के दौरान भारत को स्कैम इंडिया की छवि से मुक्ति दिलाने के जुमले लोग भूले नहीं हैं. अब एक और महाघोटाले ने सबको चौंका दिया है. साइबर जगत पर फर्जीवाड़े से अर्थव्यवस्था को एक साल में 240 अरब रुपये का चूना लगा है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्कैम इंडिया से देश को स्किल्ड इंडिया में बदलना चाहते हैं. मगर जिस साइबर जगत को वह अपना सबसे मजबूत हथियार बना रहे हैं उसी क्षेत्र के स्वछंद महारथी अपने हुनर का दुरुपयोग कर उनकी मुहिम को ठेस पहुंचाने पर आमादा हैं. साइबर जगत में सक्रिय अराजक तत्वों की बीते एक साल की करतूतों का खुलासा डीएलएसए की रिपोर्ट में हुआ हैं. आर्थिक और साइबर अपराध पर काबू रखने वाली एजेंसियों के कान खड़े कर देने वाली रिपोर्ट के मुताबिक भारत में साइबर अपराधों के माध्यम से पिछले एक साल में जो फर्जीवाड़े हुए हैं उनसे भारतीय अर्थव्यवस्था को 240 अरब रुपये का चूना लग गया है.

चौंकाने वाले आंकड़े

जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस जेआर मिधा की खंडपीठ को सुपुर्द की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में साइबर क्राइम समूचे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के लिए खतरा बन गया है. रिपोर्ट में चिंताजनक दो मुख्य बातों का खुलासा किया गया है. पहला साइबर अपराधों से महज एक साल में अरबों रुपये का अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ है. दूसरा चौंकाने वाला तथ्य है कि अधिकांश साइबर अपराध छोटे शहरों और कस्बों में दर्ज किए गए.

मतलब साफ है कि महानगरों में साइबर सक्रियता को देखते हुए पुलिस इन मामलों को पकड़ने में सक्षम हो रही है जबकि दूरदराज के इलाकों में इंटरनेट की पहुंच तो महानगरों की ही तरह सुलभ हो गई है मगर वहां की पुलिस अभी कंप्यूटर का क ख ग भी नहीं जानती है. ऐसे में साइबर अपराधियों के लिए छोटे शहर आसान अड्डा बन रहे हैं. हैकिंग से जुड़े 60 फीसदी और आपत्तिजनक टिप्पणियों के लिए साइबर जगत का इस्तेमाल करने के 28 फीसदी मामले छोटे शहरों में दर्ज किए गए जबकि इनमें से महज 40 फीसदी हैकर्स को हिरासत में लिया गया.

साइबर अपराधों में 40 प्रतिशत मामले आर्थिक फर्जीवाड़े और यौन शोषण से जुड़े होते हैं. इनमें अधिकांश मामले कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल के कस्बों में दर्ज किए गए. बीते साल दिल्ली पुलिस ने स्टॉक गुरु घोटाले का पर्दाफाश किया था. इस मामले में महाराष्ट्र के एक नौजवान दंपति ने ऑनलाइन फ्रॉड कर दो लाख से अधिक लोगों को 1100 करोड़ रुपये का चूना लगा दिया.

चिंता नहीं चेतावनी

डीएलएसए की रिपोर्ट और स्टॉक गुरु मामले के तथ्य हालात की गंभीरता को उजागर करने के लिए काफी हैं. खासकर पारंपरिक अपराधों की राजधानी बन चुके उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के लिए जहां अल्पशिक्षित नौजवानों के हाथ में राज्य सरकारें लैपटॉप खुले दिल से बांट कर अपने लिए ही मुसीबत मोल ले रही हैं. उत्तर प्रदेश सरकार ने अपना चुनावी वादा पूरा करने के लिए दसवीं पास छात्रों को लैपटॉप तो बांट दिए मगर उन्हीं छात्रों ने सरकारी लैपटॉप से ही सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया में जमकर अपना गुबार निकाला.

चिंता की बात यह भी है कि रिपोर्ट में पुलिस द्वारा दर्ज मामलों के आधार पर ही आंकड़े जुटाए गए हैं. जबकि छोटे शहरों में साइबर क्राइम को लेकर पुलिसतंत्र की कमजोरियों के कारण पुलिस साइबर अपराधों को लेकर सक्रिय नहीं है. इस हकीकत को देखते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि कितने मामले पुलिस के संज्ञान में आने से बच रहे हैं. इसलिए यह रिपोर्ट और स्टॉक गुरु का मामला चिंता करने के साथ नीति नियंताओं के लिए चेतावनी भी है.

कारगर कदम

दिल्ली और मुंबई सहित अन्य महानगरों में पुलिस की अलग से साइबर ब्रांच कार्यरत हैं. इनमें साइबर जगत के महारथी और काबिल पुलिस अफसरों को तैनात किया गया है. दिल्ली पुलिस साइबर क्राइम ब्रांच के पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को विकसित देशों में प्रशिक्षण भी कराती है. इसी का नतीजा है कि उल्लास प्रभाकर जैसे शातिर अपराधी पुणे और बंगलौर पुलिस की आंख में धूल झोंकते रहे मगर दिल्ली पुलिस के जाल से नहीं भाग सके. अब अन्य राज्यों को भी अपने पुलिस तंत्र में साइबर क्राइम ब्रांच को मजबूत करना होगा.

छोटे शहरों को ठिकाना बनाते अपराधियों पर नकेल कसने के लिए दूर दराज के राज्यों को बिना देर किए दिल्ली और मुंबई की तर्ज पर खुद को इस आसन्न खतरे से निपटने के लिए तैयार करना होगा. दरअसल भारत में रातों रात अमीर बनने की चाहत जनसामान्य की सहज प्रवृत्ति होने के कारण यहां की धरती साइबर क्राइम के लिए उर्वरा बन गई है. इसमें केन्द्र सरकार को निर्णायक पहल करनी होगी. साथ ही राज्य सरकारों को बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के केन्द्र एवं अन्य राज्यों के साथ तालमेल बिठाते हुए इस खतरे से लड़ना होगा. आखिर यह चिंता महज अर्थव्यस्था को होने वाले नुकसान की नहीं बल्कि अंतिम तौर पर देश की सुरक्षा से भी जुड़ी है.

ब्लॉग: निर्मल यादव

संपादन: महेश झा

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