सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के खतरे | ब्लॉग | DW | 12.06.2014
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ब्लॉग

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के खतरे

लोकसभा चुनाव के पहले से ही देश के अनेक भागों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशें शुरू हो गई थीं. पिछले दिनों कुछ प्रांतों में हुई घटनाओं से इसके जारी रहने का अंदेशा होता है.

2012 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी. इसके बाद से राज्य में सांप्रदायिक हिंसा की 300 से अधिक छोटी-बड़ी वारदातें हो चुकी हैं जिनमें एक सौ से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है. पिछले साल ही 77 घटनाएं हुई थीं जिनमें मुजफ्फरनगर में हुए दंगे सबसे अधिक भयंकर थे. वर्ष 2013 में ही महाराष्ट्र में 88, मध्यप्रदेश में 84, कर्नाटक में 73, बिहार में 63 और राजस्थान में 52 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं घटीं.

इस दौरान सांप्रदायिक तत्वों का मनोबल भी बहुत तेजी के साथ बढ़ा और वे बौद्धिक जगत में निरंकुश ढंग से हस्तक्षेप करने के काम में और भी अधिक सक्रिय हो गए. केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद से यह प्रक्रिया पहले की तुलना में काफी तेज हो गई. पिछले दिनों पुणे में एक मुस्लिम युवा की केवल इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि उसने दाढ़ी रखी हुई थी और वह दुपल्ली टोपी पहने हुए था.

दिल्ली से लगे ग्रेटर नोएडा में कुछ ही दिन पहले भारतीय जनता पार्टी के एक नेता की हत्या कर दी गई. अब मुजफ्फरनगर जिले के मीरांपुर कस्बे में भी भाजपा के एक स्थानीय नेता को मार दिया गया है. स्वाभाविक है कि राजनीतिक नेताओं की इस तरह दिन-दहाड़े हत्या होने से माहौल विषाक्त होगा और सांप्रदायिक तनाव फैलेगा और फैलाया भी जाएगा. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सत्ता में है जबकि केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का शासन है. ऐसे में समाजवादी पार्टी पर यह आरोप लगना स्वाभाविक है कि वह अपने राजनीतिक विरोधियों का सफाया कर रही है.

लोकसभा चुनाव में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से भाजपा को तो फायदा हुआ, लेकिन समाजवादी पार्टी बेहद नुकसान में रही. उसे भरोसा था कि मुस्लिम वोट उसकी झोली में आएगा, लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों के पीड़ित हजारों मुस्लिम परिवारों को जिस बुरी दशा में खुले आसमान के नीचे राहत शिविरों में कड़कड़ाती सर्दी में दिन-रात गुजारने पड़े, उसके कारण उनका समाजवादी पार्टी से मोहभंग हो गया. और उसे सिर्फ पाँच लोकसभा सीटों से ही संतोष करना पड़ा. मुजफ्फरनगर दंगों के एक आरोपी संजीव बालियान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में शामिल करके स्पष्ट संकेत दिया है कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश में उनकी रणनीति क्या होने वाली है.

राज्य में कानून-व्यवस्था की हालत बहुत खराब है और आए दिन बलात्कार और हत्याएं हो रही हैं. बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने राज्य में तत्काल राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की मांग की है. भाजपा नहीं चाहती कि उस पर यह आरोप लगे कि सत्ता में आते ही उसने एक विपक्षी पार्टी की सरकार को बर्खास्त कर दिया. लेकिन यदि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार न हुआ और हत्या, बलात्कार और सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं इसी तरह नियमित रूप से घटती रहीं, तो इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि निकट भविष्य में सही समय देखकर मोदी सरकार उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार को बर्खास्त कर सकती है ताकि वहां विधानसभा चुनाव करवा कर वर्तमान मोदी लहर का राजनीतिक फायदा उठाया जा सके.

कुछ ही माह बाद हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने हैं. 10 जून को दिल्ली से सटे गुड़गांव में एक सामान्य सी सड़क दुर्घटना को सांप्रदायिक रंग दे दिया गया और वहां आनन-फानन में ऐसी हिंसा फैली कि तीन दिन तक कर्फ्यू लगाना पड़ा. महाराष्ट्र में शिवाजी के अपमान की बात फैला कर कभी भी तनाव पैदा किया जा सकता है. इन दिनों इस तरह की अफवाहों को हवा देने में फेसबुक और ट्विटर जैसे लोकप्रिय सामाजिक मीडिया भी प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं. पुणे में इसी तरह की अफवाह फैलाई गई जिसके फलस्वरूप मुस्लिम युवक मोहसिन पूरी तरह से निर्दोष होते हुए भी उत्तेजित भीड़ के हाथों मारा गया.

उसे मारने वाले हिन्दू राष्ट्र सेना के कार्यकर्ता थे और इस संगठन के प्रमुख धनंजय देसाई के खिलाफ पहले भी इसी तरह के बीस से अधिक मामले दर्ज हैं. लेकिन उसके खिलाफ कार्रवाई करने में पुणे पुलिस को तीन दिन लग गए. पहले भी महाराष्ट्र में इस तरह की घटनाओं में पुलिस की भूमिका संदिग्ध ही रही है. इसलिए यदि राज्य की कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी गठबंधन की सरकार भविष्य में इस प्रकार की स्थितियों से निपटने के लिए कारगर कदम उठाने में नाकाम रहती है, तो इसका फायदा विपक्ष यानि भाजपा-शिवसेना गठबंधन और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को मिलेगा, जैसा उत्तर प्रदेश में हुआ. हरियाणा की स्थिति भी बहुत मिलती-जुलती है.

इसलिए आने वाले दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में वृद्धि होने की आशंका है. इनमें विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्य के अलावा वे राज्य भी शामिल हैं जहां निकट भविष्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. भाजपा की कोशिश होगी कि लोकसभा चुनाव के समय बने माहौल का पूरा-पूरा राजनीतिक लाभ उठाया जाए.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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