सांडों की लड़ाई से मेलजोल | मनोरंजन | DW | 21.08.2013
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मनोरंजन

सांडों की लड़ाई से मेलजोल

उनके मालिकों ने इतिहास में जातिगत युद्ध देखा है, अपनों में लड़ाई देखी है लेकिन जब खेल का मामला आता है, तो उनकी जाति आड़े नहीं आती. और अगर बोस्निया में सांडों की लड़ाई हो रही हो, तब तो राष्ट्रीयता पीछे छूट जाती है.

वे 14 सांड़ों के साथ तैयार हैं. उनकी सींगों को अच्छी तरह पॉलिश करके चमकाया गया है. उन्हें खास तौर पर "चैंपियंस लीग" के लिए चुना गया है, जो बोस्निया के चेवलेयानोविची में खेला जा रहा है. इन्हें देखने बोस्नियाई भी आए, सर्ब भी और क्रोएट्स भी आए. 1992 से 1995 के बीच चले युद्ध के बाद यह अपने तरह का अनूठा मौका होगा, जब जातिगत आधार पर बंटे इन देशों के लोग एक साथ जमा हुए.

बोस्निया में रहने वाले क्रोएशियाई मूल के इवो इलिच का कहना है, "यहां कोई जातिगत भेदभाव नहीं है. हम लोग भाई बहनों की तरह हैं." यह खेल राजधानी सारायेवो से कोई 40 किलोमीटर दूर विशालकाय पठार पर हर साल होता है.

उत्सव का माहौल

मुकाबला अगस्त में हुआ और तापमान सारे रिकॉर्ड तोड़ता हुआ 39 डिग्री पार कर गया लेकिन दर्शकों की संख्या पर कोई फर्क नहीं पड़ा. सुबह से ही माहौल में अंगीठी से उठती मजेदार खुशबू फैलने लगी. रेहड़ीवाले सुबह से ही मटन ग्रिल करने लगते हैं.

दर्जनों तंबू कामचलाऊ रेस्त्रां की शक्ल ले लेते हैं. यहां एक किलो मटन कोई 10 यूरो (800 रुपये) में मिलता है. जिस देश की औसत आय 400 यूरो (32,000 रुपये) हो, वहां के लोगों के लिए यह सस्ता सौदा नहीं, लेकिन खरीदारों की लाइन लगी है. बैंड बाजे वाले बारात का समां बांध देते हैं. जवान दिलकश लड़कियां लोकगीतों पर थिरकने लगती हैं, तो टूर्नामेंट का मजा दोगुना हो जाता है. बाहर खुले मैदान में स्थानीय लोग मशहूर "कोलो" संगीत पर हाथ में हाथ डाले झूमने लगते हैं. इनमें से शायद कुछ ही लोगों को याद होगा, जब यूगोस्लाविया एक देश हुआ करता था और ये सब एक साथ रहा करते थे.

लंबी है परंपरा

इसके आयोजकों में से एक बेसिम गिलिचा का कहना है, "यह ऐसी जगह है, जहां हर तरह के लोग हैं, सर्ब, क्रोएट्स और मुस्लिम." उन्होंने बताया कि सांडों की लड़ाई की परंपरा 66 साल से चली आ रही है लेकिन इस इलाके में 19वीं सदी से ही उत्सवों का आयोजन होता आया है. युद्ध के दौरान इसका आयोजन नहीं हो पाया और उस जंग में एक लाख से ज्यादा लोग मारे गए. युद्ध खत्म होने के बाद इसे फिर से आयोजित किया जाने लगा.

तीनों समुदाय के सांड मालिकों ने 2003 में राष्ट्रीय संघ बनाया और उसके बाद हर साल गर्मियों में रविवार को बोस्निया में सांडों की लड़ाई होने लगी. हालांकि चेवलेयानोविची के विजेता को कोई नकद राशि नहीं मिलती लेकिन यहां टूर्नामेंट के बाद सांडों की कीमत 25,000 यूरो (करीब 20 लाख रुपये) तक पहुंच जाती है.

Bosnien und Herzegowina Steierkampf im Dorf Stricici

सांडों की लड़ाई की परंपरा 66 साल से चली आ रही है.

खूनखराबा नहीं

जीते हुए सांडों को परिवार के सदस्यों की तरह देखा जाता है और कई बार तो उनकी मौत के बाद सार्वजनिक तौर पर अंतिम रस्म भी की जाती है. लेकिन यह स्पेनी लड़ाई की तरह नहीं है. यहां किसी तरह का खूनखराबा नहीं होता.

सांड़ों की लड़ाई में कभी किसी की मौत नहीं होती क्योंकि उनके सींगों को धारदार बनाने पर रोक है ताकि किसी को गंभीर चोट न लगे. खेल उस वक्त खत्म हो जाता है, जब एक सांड मैदान छोड़ कर भाग जाता है. कई बार तो दोनों सांडों के बीच टकराव होता भी नहीं और कई बार दोनों घंटों एक दूसरे पर हावी होने की कोशिश करते हैं.

इस बार मुस्लिम भागीदार नजीर सरासेविच के 1200 किलो के सांड गरोनिया को सबसे मजबूत सांड चुना गया. सरासेविच कहते हैं, "सबसे मजबूत सांड रखना प्रतिष्ठा की बात है." हालांकि उन्हें बधाई देने वाले लोग गरोनिया से भी सावधान हैं कि कहीं काले रंग का यह सांड अपने मालिक की हिफाजत करते करते खतरनाक न हो जाए.

एक शख्स ने उसकी तरफ इशारा करके कहा, "वह पहाड़ है." हारे हुए लोग भी हार भुला कर विजेता के साथ एक बीयर साझा करने एक ही टेबल पर पहुंच गए हैं.

एजेए/एमजे (एएफपी)

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