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ब्लॉग

सही वक्त पर सही फैसला

जर्मनी ने सीरिया के शरणार्थियों के लिए डब्लिन प्रक्रिया फिर से लागू कर दी है. डॉयचे वेले के क्रिस्टॉफ हाजेलबाख का कहना है कि इस प्रक्रिया को लागू करना मुश्किल होगा, लेकिन यह सैद्धांतिक रूप से सही है.

अब हो रहे हैं फटाफट फैसले. कुछ ही दिनों के अंदर दूसरी बार है कि जर्मन गृह मंत्री थोमस डे मेजियेर ने संकेत दिया है कि जर्मनी में शरणार्थियों के लिए असीम स्वागत के दिन गए. सीरिया के लोगों के लिए भी. अब फिर से सभी शरणार्थियों के लिए डब्लिन नियम लागू किया जा रहा है. अब यूरोप आने वाले शरणार्थियों को शरण का आवेदन उस देश में देना होगा जहां से वह यूरोपीय संघ में प्रवेश करेगा. यदि फिर भी वह जर्मनी आता है तो अधिकारी उसे वापस उसी देश भेज सकेंगे.

मानवीय कारणों से और जर्मन शरणार्थी दफ्तर को जांच की लंबी प्रक्रिया से बचाने के लिए चांसलर अंगेला मैर्केल ने सीरिया के शरणार्थियों के लिए यह नियम स्थगित कर दिया था. इस बीच लाखों ऐसे लोग आ गए हैं जो अपने को सीरिया का बताते हैं क्योंकि उसकी वजह से शरण पाना आसान है. ग्रीस, गंहरी, क्रोएशिया, स्लोवेनिया और ऑस्ट्रिया जैसे देशों ने लोगों को जर्मनी आने दिया. करें भी क्यों न, लोग जर्मनी आना चाहते थे और जर्मनी उन्हें स्वीकार कर रहा था. लेकिन अब वो दिन गए. जर्मनी पर शरणार्थियों की लहर को रोकने का दबाव है.

अपेक्षित आलोचना

जैसी कि अपेक्षा थी, डे मेजियेर पर आलोचना की बौछार हो रही है. उन्हें अमानवीय बताया जा रहा है, कहा जा रहा है कि यह लागू करने लायक नहीं है और यह भी कि उन्होंने इसके बारे में गठबंधन के साथियों से बात नहीं की है. इनमें से बहुत सी टिप्पणियों का दलगत राजनीति से लेना देना है तो कुछ टिप्पणी बस प्रतिक्रिया में की गई है कि भाग रहे लोगों को शरण को सीमित करना अनैतिक है. संभवतः सबसे गंभीर आपत्ति यह है कि डब्लिन कानून को लागू करने का कोई असर नहीं होगा. ग्रीस उन देशों में शामिल नहीं है जहां शरणार्थियों को वापस भेजा जा सकता है, लेकिन वह ईयू में घुसने का प्रमुख रास्ता है.

इसके अलावा जर्मनी को हर वापसी से पहले पता होना चाहिए कि शरणार्थी किस रास्ते से होकर आया है. लेकिन इसकी जानकारी शरणार्थी छुपाएंगे. और रास्ते में पड़ने वाले देश शरमार्थियों को आगे जाने देंगे, क्योंकि अगर वे उनका रजिस्ट्रेशन करते हैं तो उन्हें जर्मनी से वापस भेजे जाने पर उन्हें लेना होगा. उनकी संख्या लाखों में है और खासकर स्लोवेनिया जैसे छोटे देशों के लिए यह बहुत बड़ा बोझ होगा. यूरोपीय साथियों के सहयोग के बिना जर्मनी के लिए डब्लिन नियमों को लागू करने के लिए यूरोपीय साथियों के सहयोग पर निर्भर है, हालांकि जर्मन चांसलर मैर्केल ने खुद उसे अव्यावहारिक बताया है.

जिन्न वापस बोतल में

यह आलोचना भी अत्यंत उचित है कि दबाव के नीचे दबे जर्मन शरणार्थी एजेंसी पर नए मामलों की जांच का और बोझ डाल दिया गया है. इससे शरण के आवेदनों पर फैसला लेने में देर होगी और इंतजार का समय लंबा हो जाएगा. जर्मन सरकार शरण की प्रक्रिया को आसान और तेज बनाना चाहती थी, लेकिन कर उल्टा रही है.

फिर भी फैसला सही है और एक दिन की भी जल्दबाजी नहीं हुई है. आखिरकार मामला संदेश का है, अपनी जनता के लिए, शरणार्थियों के लिए और यूरोपीय सहयोगियों के लिए. जर्मनी शरणार्थियों की इतनी बड़ी तादाद से अकेले नहीं निबट सकता. मैर्केल का फैसला शुरू से ही गलत था. अब दूसरे लोग जिन्न को वापस बोतल में डालने की कोशिश कर रहे हैं. सर्वेक्षण दिखाते हैं कि शरणार्थी संकट की वजह से मैर्केल पर भरोसा गिरा है और उनकी सीडीयू पार्टी का समर्थन भी घटा है. अगर मध्यमार्गी पार्टियां शरणार्थियों की बाढ़ नहीं रोकेंगी तो कभी न कभी रैडिकल पार्टियों का पलड़ा भारी हो जाएगा.

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