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ब्लॉग

सही दिशा में पहला कदम

अपने तीन दिनों के भारत दौरे पर जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 समझौते किए. जिसमें जर्मन निवेश को तेजी से मंजूरी देने की प्रक्रिया भी शामिल है. ग्रैहम लूकस इसे अहम कदम मानते हैं.

हनोवर में जब इस साल भारत अपने मेक इन इंडिया अभियान के साथ मेहमान देश था, तो जर्मन कारोबारियों का मूड शांत था. भारत में निवेश बढ़ाने की प्रधानमंत्री मोदी की अपील पर जवाब से ज्यादा सवाल थे. जर्मन उद्यमियों ने धीमा फैसला लेने वाली नौकरशाही, भ्रष्टाचार ऊंचे टैक्स, बौद्धिक संपदा की सुरक्षा में कमियों और कामगारों में कुशलता के अभाव को निवेश की राह में गंभीर बाधा बताया था. इसके अलावा जर्मनी के मझौले उद्यमों के लिए निवेश का फल मिलने का समय बहुत ही लंबा था. सीमेंस, एसएपी और डाइम्लर जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां निवेश पर कमाई के लिए दस साल इंतजार कर सकती हैं लेकिन छोटी और मझौली कंपनियां नहीं. राजनीतिक संबंधों में भी कुछ समस्या थी, मोदी की सरकार ने कुछ स्कूलों में होने वाली जर्मन भाषा की पढ़ाई संस्कृत के लिए रोक दी थी. मैर्केल खुश नहीं थीं.

इस पृष्ठभूमि में चांसलर मैर्केल का भारत दौरा महत्वपूर्ण था. विश्व के चोटी के निर्यातकों में शामिल जर्मनी भारत के साथ द्विपक्षीय और कारोबारी रिश्ते बेहतर करना चाहता था. लेकिन 2012 से पारस्परिक व्यापार 16 अरब यूरो पर अटका है. जर्मन उद्यमों के लिए होने वाली मुश्किलों को दूर करना बड़ी समस्या है. नरेंद्र मोदी ने 2014 में चुनाव जीतने के बाद देश को आधुनिक बनाने का बीड़ा उठाया है और सुधार के कई कदम उठाए हैं. संसद में विरोध के चलते अब तक बहुत कामयाबी नहीं दिख रही है. लेकिन देश की बढ़ती आबादी का दबाव उनके लिए कोई मौका नहीं रहने दे रहा है. भारत की 1.3 अरब की आबादी में ज्यादातर लोग युवा हैं और वे नौकरी चाहते हैं, सुरक्षित भविष्य चाहते हैं.

इस बात के संकेत हैं कि हनोवर आने के बाद मोदी ने महसूस किया है कि जर्मन अर्थव्यवस्था को क्या चाहिए. मैर्केल और मोदी ने जर्मन कंपनियों के निवेश पर तेज फैसले के लिए फास्ट ट्रैक समझौता किया है. इसके अलावा दोनों पक्षों ने 18 समझौते किए हैं जिनमें अक्षत ऊर्जा जैसे इलाके भी हैं जिसमें जर्मनी की कुशलता है. जर्मन उद्यम भारत के देहाती इलाकों को स्वच्छ ऊर्जा देने के लिए तकनीक उपलब्ध कराने पर सहमत हैं. जर्मन कामगारों का कौशल बढ़ाने में भी भारत की मदद करेगा. और मोदी ने पिछला फैसला बदलकर स्कूलों में जर्मन भाषा पढ़ाने की बात मान ली है. बदले में जर्मनी भी देश में हिंदी, संस्कृत, मलयालम और तमिल को प्रोत्साहन देगा.

दोनों पक्ष भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार संधि पर रुकी बातचीत को आगे बढ़ाने पर भी सहमत हुए हैं. लेकिन उसमें प्रगति कॉपीराइट और बौद्धिक सम्पदा जैसे मुद्दों के समाधान पर निर्भर करेगी. यूरोपीय और जर्मन उद्यमी यह आश्वासन चाहते हैं कि मोदी कारोबारी माहौल को बेहतर बनाने का अपना वादा पूरा करेंगे. इस बात पर व्यापारिक प्रगति निर्भर करेगी और मोदी का राजनीतिक भविष्य भी. यह सही दिशा में पहला कदम था.

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