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ब्लॉग

सवाल डिग्री का नहीं, लोगों के भरोसे का है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्रियों को लेकर भारत में राजनीतिक विवाद हो रहा है. प्रधानमंत्री खुद चुप हैं. विवेक कुमार का कहना है कि पूरे विवाद में सवाल उनकी डिग्रियों का नहीं बल्कि लोगों में डगमगाते विश्वास का है.

नरेंद्र मोदी बीए पास हों या एमए. उनके पास दिल्ली यूनिवर्सिटी की डिग्री हो या गुजरात यूनिवर्सिटी की. वह स्कूल, कॉलेज में क्लासें लगाते रहे हों या नहीं. उन्होंने रेग्युलर कोर्स किया या करेसपोंडेंस से. क्या फर्क पड़ता है? सच में, क्या फर्क पड़ता कि नेता कितने पढ़े लिखे हैं, या नहीं भी हैं. लोग जानते हैं कि डिग्री का योग्यता से कोई लेना देना नहीं है. लोग यह भी जानते हैं कि बीती सरकार में 10 साल तक मुल्क का प्रधानमंत्री ऐसा आदमी था जिसकी डिग्रियों को दुनियाभर के लोग सलाम करते थे. और लोग अच्छी तरह जानते हैं कि वह जब गया तो देश को किस हाल में छोड़कर गया. तो सच में, कोई फर्क नहीं पड़ता कि नरेंद्र मोदी की डिग्री असली या है नकली. बस एक बात का फर्क पड़ता है, वह सच बोलते हैं या नहीं. फर्क इस बात से पड़ता है कि वह जनता के प्रति ईमानदार हैं या नहीं. लोगों को कहीं ऐसा तो नहीं लग रहा कि उनका नेता कुछ छुपा रहा है. क्योंकि इसी बात से तय होगा कि जनता उन पर भरोसा कर सकती है या नहीं. और डिग्री वाले इस पूरे विवाद से भरोसा थोड़ा सा हिला है. एक बार फिर.

पहले सरकारी वेबसाइट पर लिखा था कि नरेंद्र मोदी एमए हैं. फिर उसे हटा लिया गया. क्यों? लोगों के मन में यह 'क्यों' रह गया है, हालांकि बाद में उसे फिर से डाल दिया गया. साबित तो हो ही गया है कि पीएम ने बीए भी किया और एमए भी. लेकिन लोगों को इस क्यों का जवाब नहीं मिला.

Amit Shah Neu Delhi Indien

डिग्री दिखाते बीजेपी प्रमुख

ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि नरेंद्र मोदी के शपथ खाकर दिए तथ्यों पर संदेह हुआ. उनकी शादी को लेकर भी तो यही हुआ था. इतने साल तक वह छिपाते रहे कि शादीशुदा हैं. तब भी सवाल यह नहीं था कि वे शादीशुदा हैं या नहीं हैं. सवाल यह था कि किसी जानकारी पर लोगों को संदेह है तो स्पष्टता और ईमानदारी से उसे सबके सामने कर दिया जाए. ऐसा इसलिए ताकि लोग भरोसा कर सकें. उन्हें तसल्ली रहे कि उनका और उनके बच्चों का भविष्य एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में है जिस पर भरोसा किया जा सकता है. लेकिन नरेंद्र मोदी ने ऐसा नहीं किया. उनकी शादी पर जमकर बवाल हुआ. उन्होंने खुद कभी कुछ नहीं कहा. बस उनके सहयोगी इधर-उधर की बातें करते रहे. जिससे विवाद बढ़ा. और आखिर में बस इतना पता चला कि नरेंद्र मोदी ने सच में अपनी शादी की बात छिपाई थी. ठीक है, दुनियाभर के लोग छिपाते हैं, कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन एक सवाल मन में छूट गया, क्यों छिपाई. ऐसे क्यों बढ़ते जाते हैं तो संदेहों का दायरा भी बढ़ता जाता है. मसलन, नरेंद्र मोदी संघ के प्रचारक थे. लोग जानते हैं कि प्रचारक शादीशुदा नहीं होते. ताउम्र अविवाहित रहते हैं. फिर शादीशुदा नरेंद्र मोदी स्वयंसेवक कैसे बन गए होंगे? क्या उन्होंने वहां भी झूठ बोला होगा? या संघ ने उनकी विलक्षण प्रतिभा और योग्यता को देखते हुए उन्हें छूट दे दी होगी?

2013 में जब नरेंद्र मोदी को बीजेपी की चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया गया और नाराज लाल कृष्ण आडवाणी ने इस्तीफा दे दिया. उस दौरान उन्होंने एक ट्वीट किया था कि आडवाणी से उन्होंने फोन पर बात कर ली है और उन्हें आशीर्वाद भी मिल गया है. बाद में खबरें आईं कि आडवाणी और उनके बीच फोन पर ऐसी कोई बात नहीं हुई है. तो क्या मोदीजी झूठ बोल रहे थे? गूगल पर सर्च कीजिए, इस कथित झूठ पर फोर्ब्स मैगजीन में भी स्टोरी है.

भारत खुद को आदर्श लोकतंत्र कहता है तो उससे आदर्श की उम्मीद की जाती है. ऐसे तो बहुत उदाहरण हैं जब लोगों का भरोसा टूटा तो बड़े से बड़े नेताओं ने पद छोड़ दिए. ब्रिटेन में हाल ही में एक दिलचस्प वाकया हुआ था. वहां के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन पर टैक्स बचाने के लिए कुछ हथकंडे अपनाने के आरोप लगे. कैमरन ने अपना बचाव किया. इसके कुछ दिन बाद वहां ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में रहने के बारे में एक सर्वे हुआ. इस सर्वे में कैमरन दूसरों से पिछड़ गए. टेलीग्राफ में एक लेख में सिमोन हेफर ने सर्वे में कैमरन के पिछड़ने का जिक्र करते हुए लिखा, "नाई की दुकानों पर लोग बात कर रहे हैं कि आप कैमरन पर भरोसा नहीं कर सकते क्योंकि टैक्स को लेकर उसकी ईमानदारी नहीं झलकी." बहुत छोटी सी बात थी, लेकिन लोगों का भरोसा टूटा और उसका नतीजा कहीं और नजर आया.

आप कह सकते हैं राजनीति में तो झूठ बोला ही जाता है. आप कह सकते हैं कि दुनियाभर के नेता झूठ बोलते हैं. पर सवाल नरेंद्र मोदी का है. अगर फलां झूठ बोलता है और नरेंद्र मोदी भी बोलते हैं तो बाकियों में और आप में क्या फर्क है?

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