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ब्लॉग

सर्वोच्च न्याय प्रणाली में सुधार की मांग

भारत में अब तक सत्ता और सत्ता से जुड़े प्रतिष्ठानों के विकेंद्रीकरण की बात हो रही थी, मगर अब देश की सर्वोच्च अदालत को भी विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया में भागीदार बनाने की बहस चल पड़ी है.

आजादी के छह दशक बाद भी नागरिक अधिकार से लेकर सरकार के दायित्व तक, भारत में हर बात दिल्ली तक ही सिमट कर रह गर्इ है. सरकार और सरकारी प्रतिष्ठानों ही नहीं बल्कि गैरसरकारी संगठन भी खुद को दिल्ली तक सीमित रख पाते हैं. नतीजा यह हुआ है कि किसान हो या नौजवान हर कोई सियासी और साहित्यिक बहस का मकसद दिल्ली की डयोढ़ी छूना हो गया है. आजादी के बाद सत्ता के विकेंद्रीकरण की बातें बेमानी हैं और यह काम अभी शुरु किया जाना बाकी है.

सत्ता के विकेंद्रीकरण की बहस के बीच अब भारत में कानूनी अधिकारों के विकेंद्रीकरण की मांग दोर पकड़ने लगी है. कानून बनाने से लेकर इन्हें लागू करने तक सारा काम दिल्ली से हो रहा है. लोगों को लगता है कि ये सब वादे और घोषणाएं दिल्ली की देहरी तक नहीं लांघ पाती हैं और मजबूरन लोगों को अपने हक हुकूक की लड़ार्इ के लिए अकेले या समूह में दिल्ली कूच करना पड़ता है.

पिछले हफ्ते एक दक्षिण भारतीय वकील ने जनहित याचिका के मार्फत सुप्रीम कोर्ट की चार अपीलीय शाखाएं देश के विभिन्न इलाकों में खोलने की मांग की है. तथ्य एवं मजबूत दलीलों वाली इस अर्जी को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवार्इ के लिए मंजूर करते हुए केन्द्र सरकार और कानून मंत्रालय से इस पर जवाब मांगा है. सरकार का जवाब तो एक महीने बाद ही पता चलेगा लेकिन इस मसले पर देश का बड़ा तबका मुददर्इ के साथ है.

मांग नर्इ नहीं

पांडिचेरी के वकील वी वसंत कुमार ने सुप्रीम कोर्ट को उसके अपने ही फैसले की याद दिलाई है. दरअसल सुप्रीम कोर्ट के विकेंद्रीकरण का मुददा नया नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने ही अपने तीन दशक पुराने फैसले में यह सुझाव दिया था. अदालत की पांच जजों की पीठ ने 1986 में बिहार विधिक सहायता सोसाइटी बनाम भारत के मुख्य न्यायाधीश मामले में दिए गए फैसले में सरकार को राष्ट्रीय अपीलीय अदालत के गठन का सुझाव दिया था. इसमें कहा गया था कि देश भर के हार्इकोर्ट और ट्रिब्यूनल के आपराधिक, संविदा और राजस्व सहित अन्य मामलों से जुड़े सभी फैसलों को चुनौती देने के लिए एक अपीलीय अदालत का गठन होना चाहिए, जबकि मौजूदा सुप्रीम कोर्ट संविधान से जुड़ी गुत्थियों को ही सुलझाए.

दरअसल यह सुझाव अदालती फैसले के बाध्यकारी हिस्से का भाग नहीं था इसलिए सुप्रीम कोर्ट के तीन दशक पुराने इस सुझाव को सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया. गाहे बगाहे यह मुददा बहस मुबाहसों का हिस्सा मात्र बनकर रह गया है. देश के नामचीन वकील केके वेणुगोपाल ने 2010 में मांग की थी कि सुप्रीम कोर्ट पर लगातार बढ़ते मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए क्षेत्रीय शाखाएं खोलना कारगर तरीका है. साथ ही इससे अदालती फैसलों की प्रभावशीलता को भी बढ़ाया जा सकता है.

पूर्वोत्तर या दक्षिणी राज्यों के दूरदराज के इलाकों से लोग अपील के लिए दिल्ली तक आने की जहमत नहीं उठाते हैं, जिससे वे न्याय के सर्वोच्च पायदान तक आने से वंचित हो जाते हैं. एक अध्ययन बताता है कि सुप्रीम कोर्ट में अपील के लिए आने वालों में सर्वाधिक हिस्सेदारी उत्तरी राज्यों की है. इनमें सर्वाधिक 12 फीसदी दिल्ली, 9 प्रतिशत पंजाब और हरियाणा, 7 प्रतिशत उत्तराखंड और 5 फीसदी हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों की हिस्सेदारी है. जबकि 2.8 प्रतिशत केरल, 2 प्रतिशत आंध्र प्रदेश और 1 प्रतिशत के साथ तमिलनाडु की अपीलें सुप्रीम कोर्ट पहुंचने वालों में सबसे पीछे हैं.

संभावित नुकसान

जहां तक इस पहल के संभावित नुकसान की बात है तो सिर्फ सरकार पर बढ़ने वाला अतिरिक्त आर्थिक बोझ तथा वकीलों की सहूलियत की बात ही कही जा रही है. भारत के पूर्व महान्यायवादी सोली जे सोराबजी सैद्धांतिक तौर पर इसे सही मानते हैं लेकिन आर्थिक संकट का सामना कर रही सरकारों से इस पहल को अमली जामा पहनाने की उम्मीद को हकीकत से परे बताते हैं. उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की चार बेंच बनाना सामान्य अदालतों को खोलने से नितांत अलग है और इससे सरकारी खजाने पर भारी बोझ बढ़ेगा.

सोली सोराबजी इलाहाबाद हार्इकोर्ट की तीसरी बेंच मेरठ में खोलने की दशकों पुरानी पहल का हवाला देते हैं और कहते हैं कि निकट भविष्य में इस मांग के पूरा होने की उम्मीद करना बेमानी है. इसके दूसरे व्यावहारिक नकारात्मक पहलू की ओर वह इशारा करते हुए वे कहते हैं कि चार नर्इ पीठ खोलने का वादियों से ज्यादा फायदा वकीलों का होगा. इससे वकीलों को मिलने वाले मुकदमों की संख्या बढ़ना तय है लेकिन समय पर कितने वादियों को न्याय मिल पाएगा यह कह पाना मुशिकल है.

अमल की मुश्किलें

संविधान के अनुच्छेद 130 का प्रावधान है कि सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में या ऐसे स्थान या स्थानों पर स्थित होगा जिसका निर्धारण भारत के मुख्य न्यायमूर्ति राष्ट्रपति के अनुमोदन से समय समय पर तय करें. इससे साफ है कि सुप्रीम कोर्ट की शाखाएं खोलना न तो जटिल है न ही दुरुह. महज राष्ट्रपति के अनुमोदन की औपचारिकता मात्र पूरी करनी है. सर्वोच्च अदालत को ही यह बात तय करनी होगी लेकिन साथ में संसद और सरकार को विश्वास में लेना भी नितांत अनिवार्य होगा.

वैसे भी दिल्ली में हर दिन बनते कानूनों की लंबी होती फेहरिस्त से कानून के हाथ तो लंबे हो रहे हैं लेकिन विशाल भूभाग पर फैले इस देश के नागरिकों तक इनका लाभ पहुंचाने वाले हाथ लगातार सीमित होते जा रहे हैं. सिस्टम के तीन मूल स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में से पहले दोनों आधारस्तंभ शिथिलता के शिकार हो कर न्यायपालिका पर लगातार बोझ बढ़ा रहे हैं. विस्तार और संकुचन की विरोधाभाषी प्रक्रिया से तंग आकर अब सुप्रीम कोर्ट के भी विकेंद्रीकरण की मांग हो रही है. औरों से उम्मीद किए बिना न्यायपालिका को मंजिल तक का अपना रास्ता खुद ही बनाना होगा.

ब्लॉग: निर्मल यादव

संपादन: महेश झा

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