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विज्ञान

सर्द इलाकों तक फैलता मलेरिया

जहां एक तरफ वैज्ञानिक आए दिन बीमारियों को जड़ से खत्म करने की कोशिश में लगे हैं, वहीं मौसम में हो रहे बदलाव उन्हें और बढ़ा रहे हैं. जलवायु परिवर्तन के कारण ठंडे इलाकों में भी मलेरिया फैलने का खतरा बन गया है.

एक अमेरिकी साइंस जर्नल में प्रकाशित यह स्टडी इथियोपिया और कोलंबिया के पर्वतीय क्षेत्रों में दर्ज किए गए आंकड़ों पर आधारित है. इन आंकड़ों से पता चला है कि बढ़ती गर्मी के साथ ही मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों के बढ़ने की भी काफी संभावना है. इन इलाकों में साल 2012 में मच्छरों के कारण फैलने वाली बीमारियों से छह लाख से भी ज्यादा लोगों की मौतें दर्ज की गई हैं. मलेरिया का जलवायु परिवर्तन के साथ बहुत गहरा संबंध पाया गया है. कारण यह है कि इस बीमारी के लिए जिम्मेदार प्लाज्मोडियम परजीवी और इसे फैलाने वाले एनोफिलीज मच्छर दोनों गर्म माहौल में बहुत अच्छी तरह फलते फूलते हैं.

ब्रिटिश और अमेरिकी रिसर्चरों ने पश्चिमी कोलंबिया के एंटिओकिया क्षेत्र में 1990 से 2005 के बीच दर्ज हुए मलेरिया के मामलों का अध्ययन किया. इसी तरह उन्होंने केंद्रीय इथियोपिया के एक इलाके में मलेरिया के मामलों पर गौर किया. जिन सालों में मौसम गर्म रहा, तब मलेरिया के औसत मामले भी ज्यादा दर्ज हुए. मिशिगन यूनिवर्सिटी के परिस्थिति विज्ञानी मर्सिडीज पासकल बताते हैं, "जलवायु परिवर्तन के असर का यह सबूत विवादों से परे है." वह कहते हैं कि गर्म वातावरण के साथ ही उष्णकटिबंधी पर्वतीय इलाकों में ज्यादा से ज्यादा लोग मलेरिया जैसी बीमारियों की चपेट में आते दिख रहे हैं.

हर मिनट एक मौत

वैज्ञानिकों को चिंता है कि अगर पर्वतों से होते हुए मलेरिया अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक पहुंच जाता है तो वहां के स्थानीय लोगों को बहुत गंभीर रूप से बीमार करेगा. इस स्टडी की सहलेखिका और लंदन स्कूल ऑफ हाईजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन की मेनो बाउमा कहती हैं, "क्योंकि यहां के लोगों की प्रतिरोधी क्षमता कम होती है, इन लोगों के गंभीर रूप से बीमार पड़ने और जान जाने का खतरा खास तौर पर बढ़ जाता है."

Malaria in Afghanistan

मलेरिया से हर मिनट एक बच्चे की जान जाती है

पहले के कुछ शोधों में यह बात सामने आ चुकी है कि तापमान में हर एक डिग्री की बढ़ोत्तरी के साथ ही हर साल इथियोपिया में मलेरिया के करीब 30 लाख मामले और बढ़ जाते हैं. यह आंकड़े 15 साल से कम उम्र के लोगों में दर्ज किए गए. अफ्रीका जैसे देशों में मलेरिया बच्चों की सबसे बड़ी जानलेवा बीमारी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार यहां हर मिनट एक बच्चा मलेरिया से मरता है. मच्छरदानी, कीड़े मारने वाली दवा और दवाइयों के इस्तेमाल से मलेरिया से बचना संभव है, फिर भी यहां हालात इतने बुरे हैं. पासकल कहते हैं, "हमारे नतीजों से इस समस्या के पैमाने का सही सही पता चलता है. इस बात पर भी ध्यान जाता है कि इन इलाकों में इसकी रोकथाम के लिए लगातार प्रयास करने की कितनी जरूरत है."

भविष्य में अगर विश्व में तापमान बढ़ने का सिलसिला ऐसे ही जारी रहा तो घनी आबादी वाले इलाकों में मलेरिया के मामले और बढ़ेंगे. वैज्ञानिकों को लगता है कि अफ्रीकी और दक्षिण अमेरिकी इलाकों में मलेरिया से बचाने की कोशिशें और तेज करने की जरूरत है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार 2012 में करीब 22 करोड़ लोग मलेरिया से प्रभावित थे जिसमें से साढ़े छह लाख से ज्यादा लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. भारत जैसे विकासशील देशों के गरीब तबकों में मलेरिया के मामले बड़ी संख्या में पाए जाते हैं.

आरआर/आईबी (एएफपी,रॉयटर्स)

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