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दुनिया

सरकार में आरएसएस का रुतबा

संघ के कार्यकर्ता नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही आरएसएस एक बार फिर सुर्खियों में छा गया है. ज्यादातर कार्यकर्ता बचपन में ही इससे जुड़ जाते हैं. लेकिन आखिर इसका एजेंडा क्या है.

संघ से एक बार इससे जुड़ने के बाद बच्चे आम तौर पर जीवन भर इसकी शाखा से जुड़े रहते हैं. इस बार के चुनाव में संगठन के कार्यकर्ताओं ने अलग तरह का रोल निभाया. वोटर लिस्ट को लैपटॉप या टैबलेट कंप्यूटर पर लिए वे नजर रख रहे थे कि किसने वोट दिया, किसने नहीं.

लखनऊ में संघ की वर्दी यानि सफेद शर्ट और खाकी निक्कर पहने आरएसएस के कार्यकर्ता प्रभुनारायण श्रीवास्तव का कहना है, "यह मजेदार था." श्रीवास्तव ग्राउंड में बच्चों को संघ की ट्रेनिंग दे रहे हैं. उनका कहना है, "हम बरसों से एक बहुमत के लिए काम कर रहे थे और इस बार लोगों का उत्साह देखते ही बनता है."

ज्यादातर मंत्री संघ कार्यकर्ता

नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में 23 कैबिनेट मंत्री हैं, जिनमें से 17 की जड़ें कहीं न कहीं आरएसएस से जुड़ी हैं. पूरी बीजेपी ही आरएसएस आंदोलन की उपज है और मोदी के राज्य मंत्रियों में भी शाखा से जुड़े लोग अच्छी खासी संख्या में हैं.

Amtsübernahme Premierminister Narendra Modi 27.5.2014

संघ के करीबी हैं मोदी

उत्तर प्रदेश में आरएसएस सदस्य दिनेश शर्मा कहते हैं, "मोदी, बीजेपी और आरएसएस को अलग करके देखना ठीक नहीं है. ये सभी एक ही टहनी के अलग अलग पत्ते हैं. वे एक दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते, बल्कि वे तो एक दूसरे के पूरक हैं." मोदी खुद कट्टर विचारधारा के माने जाते हैं. लेकिन जानकारों की राय है कि मोदी सरकार इसके बावजूद हिन्दूवादी एजेंडा नहीं चला पाएगी. उन्होंने चुनाव प्रचार में आर्थिक विकास और अच्छे शासन की बात कही है.

विकास है एजेंडा

मोदी की टीम आरएसएस प्रवक्ता राम माधव का कहना है कि संघ ने मोदी से कहा है कि वे "सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, प्रशासन और सामाजिक सौहार्द्र" को प्राथमिकता दें. हालांकि सामाजिक सौहार्द्र वाला मसला बहुत विस्तृत और निजी नजरिए पर आधारित है. माधव का कहना है, "जब मैं सामाजिक ढांचे की बात करता हूं, तो इसका मतलब किसी तरह की बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक राजनीतिक विचार से परे समानता की बात करता हूं."

बीजेपी ने घोषणापत्र में उन तीन चीजों को रखा है, जो मुख्य तौर पर आरएसएस की मांगें हैं. इनमें अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भी शामिल है. यहां 16वीं सदी की ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद को 1992 में गिरा दिया गया था. इसके अलावा जम्मू कश्मीर को दिए गए विशेष राज्य का दर्जा वापस लेने और समान नागरिक कानून लागू करने की बात है. हालांकि दबे स्वरों में कहा जा रहा है कि यह सरकार की प्राथमिकता नहीं हो सकती. आगे पढ़िए...

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