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दुनिया

समानांतर बैंकिंग का मक्का कैसे बना कोलकाता

भारत में आर्थिक घोटालों की जांच के सिलसिले में पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता फर्जी कंपनियों के केंद्र के रूप में उभरी है. देश की 90 फीसदी फर्जी कंपनियां कोलकाता में रजिस्टर्ड हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दशकों पहले जब कोलकाता को मरता हुआ शहर कहा था तब उनके बयान पर काफी विवाद हुआ था. लेकिन अगर वह आज जीवित होते तो कम से कम एक मामले में तो इस महानगर के बारे में वैसी टिप्पणी कभी नहीं करते. वह मामला है शेल यानी कागजी कंपनियों के फलते-फूलते धंधे का. कभी ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्यालय रहा कोलकाता अब शेल कंपनियों के लगातार बढ़ते कारोबार के लिए सुर्खियों में हैं. इसे दुनिया के कई देशों की तरह कर के स्वर्ग यानी टैक्स हैवेन का तमगा दिया जा रहा है. महज कागजों पर चलने वाली इन फर्जी कंपनियों का इस्तेमाल मुख्य रूप से काले धन को सफेद बनाने में किया जाता है.

बीते साल नवंबर और दिसंबर में नोटबंदी के दौरान ऐसी कंपनियों के जरिए बैंकों में 1,238 करोड़ रुपए जमा कराए गए. उसके बाद प्रधानमंत्री दफ्तर ने शेल कंपनियों पर निगाह रखने के लिए एक कार्य बल का गठन किया है. केंद्र सरकार की ओर से शेल कंपनियों की ओर से बड़े पैमाने पर शुरू देशव्यापी अभियान के बाद कई चौंकाने वाली जानकारियां सामने आ रही हैं. कोलकाता ऐसी कंपनियों के केंद्र के तौर पर उभरा है. यहां एक ही पते पर सैकड़ों कंपनियां दर्ज हैं. ऐसे मामलों की जांच करने के लिए गठित विशेष जांच टीम (एसआईटी) के सदस्यों ने कई बार कोलकाता का दौरा कर स्थानीय अधिकारियों से मुलाकात की है. एसआईटी का दावा है कि कोलकाता में ऐसी एक लाख से ज्यादा कंपनियां लंबे अरसे से सक्रिय रही हैं. आयकर विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि देश में सक्रिय ऐसी कंपनियों में से 90 फीसदी कोलकाता में ही हैं. लेकिन आखिर इसकी वजह क्या है?

एक ही पते पर कई कंपनियां

कोलकाता पुलिस मुख्यालय लालबाजार के ठीक सामने लगभग सौ साल पुरानी एक बिल्डिंग में एक ही पते पर कई सौ ऐसी कंपनियां पंजीकृत हैं. मर्केंटाइल बिल्डिंग नामक इस पुरानी इमारत में छोटे-बड़े 470 दफ्तर हैं. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि कई कंपनियां एक ही पते पर पंजीकृत हैं. हावड़ा ब्रिज के निर्माण के दौरान इसका इस्तेमाल इंग्लैंड से आयातित लोहे की बीमों को रखने के लिए किया जाता था. लेकिन अब यह इमारत आए दिन लगने वाली आग या आयकर विभाग के छापों के लिए ही सुर्खियों में रहती है.

इस इमारत में काम करने वाले एक चार्टर्ड अकाउंटेंट कहते हैं, "कागज पर कंपनी खोलना यहां एक पुराना धंधा है. लोगों में यह भी मान्यता है कि जिसने भी इस इमारत में धंधा शुरू किया वह करोड़पति हो गया." वह बताते हैं कि रजिस्ट्रार आफ कंपनीज में लगभग 14 लाख कंपनियां पंजीकृत हैं. लेकिन उनमें से आधी भी रिटर्न फाइल नहीं करतीं. जानकार सूत्रों का कहना है कि शेल कंपनियां खोलने के खेल में शामिल 70 फीसदी लोग तो चार्टर्ड अकाउंटेंट भी नहीं हैं. वे महज डाटा इंट्री ऑपरेटर हैं. ऐसे में उनका मेहनताना सीए के मुकाबले एक चौथाई होता है. शेल कंपनियां चलाने के लिए सस्ते दफ्तर और कर्मचारी मिलने की वजह से ही कोलकाता में बीते लगभग दो दशकों से यह कारोबार दिन दूना रात चौगुना गति से बढ़ा है.

कारोबार का तरीका

आखिर यह कंपनियां कैसे काम करती हैं? एक चार्टर्ड अकाउंटेंट नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "कर की मौजूदा दर 24 फीसदी है यानी एक करोड़ की पूंजी पर 24 लाख कर देना होता है. लेकिन किसी इंट्री ऑपरेटर को साल में 50 से 70 हजार रुपए देकर बनी ऐसे कागजी कंपनियों के जरिए कर का भुगतान नहीं के बराबर करना होता है." मिसाल के तौर पर अगर किसी को एक करोड़ रुपए के कालेधन को सफेद में बदलना है तो संबंधित कारोबारी किसी इंट्री ऑपरेटर को एक लाख रुपए देता है. वह इसे 10 रुपए सममूल्य के 10 हजार शेयरों में बांट देता है. अब शेल कंपनियों के निदेशकों को ये शेयर एक हजार रुपए प्रति शेयर के प्रीमियम पर बेच दिए जाते हैं. इससे कंपनी की कीमत एक लाख से बढ़ कर एक करोड़ हो जाती है.

ऐसे कई फर्जी कंपनियों में तो चाय बेचने वाले या दफ्तर के सुरक्षा कर्मचारियों को भी निदेशक बना दिया गया है. ऐसे निदेशकों को महज हस्ताक्षर करने के एवज में पांच से 10 हजार रुपए थमा दिये जाते हैं. आयकर विभाग के एक अधिकारी बताते हैं कि ऐसे कई ब्रोकर और इंट्री ऑपरेटर हैं जो एक छोटे से दफ्तर में बैठ कर एक लैपटाप के सहारे कई सेल कंपनियों का संचालन करते हैं. वह बताते हैं कि कोलकाता में सक्रिय हजारों शेल कंपनियों पर लगभग 40 हजार करोड़ का कर बकाया है.

कागजी कंपनियों का स्वर्ग

एसआईटी के उपाध्यक्ष अरिजित पसायत ने इस साल की शुरुआत में ही कोलकाता का दौरा किया था ताकि ऐसी फर्जी कंपनियों के खिलाफ सुनियोजित कार्रवाई की जा सके. इससे पहले सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड आफ इंडिया (सेबी) ने जिन 331 कंपनियों के शेयरों की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाई थी उनमें से 150 कोलकाता में ही पंजीकृत थीं. आयकर विभाग के सूत्रों का दावा है कि अब भी यहां कम से कम 16 हजार ऐसी कंपनियां सक्रिय हैं जिनका कोई कामकाज नहीं है.

कंपनी मामलों के जानकार सुरेश नारायण कहते हैं, "कोलकाता ऐतिहासिक रूप से समानांतर बैंकिग का मक्का रहा है. इसकी वजह यहां इस धंधे की जड़ों का काफी पुराना और व्यवस्थित होना है. इसके अलावा यहां कालेधन को शेल कंपनियों के जरिए सफेद में बदलने का खर्च भी बेहद कम है." अब केंद्र सरकार की ओर से शेल कंपनियों के खिलाफ शुरू किए गए अभियान के दौरान इन पर कुछ अंकुश लग सकता है. लेकिन यहां जानकारों का कहना है कि इस धंधे में शामिल लोगों के पास इतने तरीके हैं कि वे कागजी कंपनियों के कामकाज पर कोई आंच नहीं आने देंगे.

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