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ब्लॉग

समस्या है देश में बाघों की बढ़ती तादाद

भारत में चार साल पर होने वाली बाघों की गिनती के बाद इनकी तादाद 30 फीसदी बढ़ने का दावा किया जा रहा है. वन्यजीव विशेषज्ञ इस सरकारी आंकड़े पर सवाल उठा रहे हैं तो बाघों का शिकार होने वाले इंसान अपनी सुरक्षा का.

वन्यजीवों के संरक्षण के लिए काम कर रहे लोगों का कहना है कि इस दौरान बाघों के शिकार पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है. सरकारी आंकड़ों में कहा गया है कि वर्ष 2011 से 2014 के दौरान शिकारियों के हाथों 73 बाघ मारे गए हैं. लेकिन वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी आफ इंडिया ने दावा किया है कि इस दौरान कुल 110 बाघ मारे गए.

अगर सरकारी दावों पर यकीन करें तो बाघों की इतनी तेजी से बढ़ी तादाद एक समस्या है. अब सवाल यह है कि इतने बाघ रहेंगे कहां और खाएंगे क्या. वन व पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं कि अब हम दूसरे देशों को बाघों का निर्यात करने की स्थिति में हैं. लेकिन सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज बंगलूर के निदेशक के. उल्लास कारंत कहते हैं, "आखिर यह बाघ रहेंगे कहां ? पूरी दुनिया में बाघों के शिकार के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. ऐसे में उनको दूसरे देशों में भेजने से कोई खास फायदा नहीं होगा." वन्यजीव संरक्षक बाल्मिकी थापर कहते हैं, "यह कोई खुश होने वाली बात नहीं है. बाघों के संरक्षण की दिशा में अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है."

वन्यजीव विशेषज्ञ बाघों की गिनती के तरीके पर भी सवाल उठाते हैं. के. उल्लास कारंत कहते हैं कि बाघों की इस गिनती पर 30 करोड़ रुपए का खर्च बेमतलब है. वह कहते हैं कि सही आंकड़ा हासिल करने के लिए बाघों की हर साल गिनती जरूरी है. भारत की प्रमुख वन्यजीव संरक्षण कार्यकर्ता बेलिंडा राइट के मुताबिक, अवैध शिकार पर अंकुश लगाना बेहद जरूरी है. उनका सवाल है कि आखिर चार साल में बाघों की तादाद इतनी ज्यादा कैसे बढ़ गई? इस तथ्य के बावजूद कि कालेबाजार में बाघों के शारीरिक अंगों की मांग बढ़ी है. बाघों के अंगों की तस्करी एक गंभीर समस्या है.

देश में बाघों की आकलन रिपोर्ट को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने ‘सफलतम कहानी' करार दिया है. सरकारी आंकड़ों पर भरोसा करें तो यह कम बड़ी उपलब्धि नहीं है कि दुनिया में बाघों की कुल आबादी का 70 प्रतिशत हमारे देश में है. लेकिन बाघों की इस बढ़ी तादाद से उन लोगों को शायद ही खुशी होगी, जो आए दिन बाघों के शिकार होते हैं या जिनकी संतानों और फसलों को उनसे नुकसान पहुंचता है. आज देश का ऐसा कोई इलाका नहीं है, जहां इंसानों और जानवरों के बीच बढ़ते टकराव की खबरें नहीं मिलती हों. पहले ऐसी घटनाएं ग्रामीण इलाकों तक सीमित थीं, लेकिन अब आए दिन शहरी इलाकों में बाघ की ही प्रजाति के तेंदुए के घरों में घुसने और लोगों को नुकसान पहुंचाने की खबरें सुनने को मिलती हैं.
पहाड़ी व मैदानी इलाकों में पिछले कुछ समय से बाघों का आक्रामक रूप देखने को मिल रहा है. लगभग रोजाना बाघ के हमले की एकाध घटनाएं सामने आ रही हैं. बाघों का यह रुख उनके लिए तो आत्मघाती है ही, हमारे पर्यावरण के लिए भी खतरनाक है. वन्यजीव विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या बाघों के भोजन की भी कोई व्यवस्था की गई है? अब बाघ घास तो खाने से रहे. वे अपना पेट भरने के लिए या तो दूसरे जीवों का शिकार करेंगे या फिर रिहायशी इलाकों का रुख करेंगे. लगातार घटते जंगल व उनमें आग लगने से शाकाहारी जीवों की तादाद में भारी कमी आई है.

यही वजह है कि बाघ जैसे हिंसक जानवर अपने भोजन की तलाश में रिहायशी इलाकों में पहुंच कर मवेशियों और इंसानों का शिकार करते हैं. हमें बाघों को बचाने के साथ-साथ उसके भोजन की चिंता भी करनी चाहिए. लेकिन फिलहाल इस ओर किसी का ध्यान नहीं है. ऐसे में बाघों की यह बढ़ती तादाद खुशी की बजाय चिंता का ही सबब है.

प्रभाकर

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