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ताना बाना

समय से पहले मानसून की दस्तक

भारत के किसानों और अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर है. मानसून समय से पहले ही आ गया है. सोमवार को मानसून ने अंडमान के दूर दराज के द्वीपों पर दस्तक दे दी. पिछले साल भारत में गंभीर सूखा देखने को मिला.

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बंगाल की खाड़ी में अंडमान निकोबार के द्वीपों में इस साल की मानसून की पहली बारिश हुई. मौसम विभाग के प्रवक्ता बीके बंदोपाध्याय ने बताया, "अंडमान के इलाकों में मानसून अनुमानित समय से तीन दिन पहले आ गया है और यह 30 मई तक केरल के मुख्य तटवर्ती इलाकों तक पहुंच जाएगा जो पहले के अनुमान से दो दिन पहले होगा." अगले 48 घंटों के दौरान मानसून के आगे बढ़ने की अच्छी संभावना बताई जा रही है.

पिछले महीने मौसम विभाग की तरफ से जारी पूर्वानुमान के मुताबिक इस बार मानसून सामान्य रहने की उम्मीद है. भारत में मानसून की अस्सी प्रतिशत बारिश सितंबर तक हो जाती है. उधर अच्छे मानसून की भविष्यवाणियों के बीच केंद्र सरकार को उम्मीद है कि आम जरूरत की चीजों के लगातार बढ़ रहे दाम कम होंगे. खासकर पिछले साल गंभीर सूखा रहा जिसके कारण कृषि उत्पादन खासा कम रहा.

भारत में मुद्रास्फीति की सालाना दर 16..4 प्रतिशत चल रही है, जिसके कारण सरकार को कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है. हालांकि देश की अर्थव्यवस्था में 1990 के दशक के मुकाबले कृषि का योगदान 30 प्रतिशत से घटकर अब 17.5 प्रतिशत रह गया है, लेकिन दुनिया की उभरती हुई भारतीय अर्थव्यवस्था को अब भी काफी हद तक मानसून पर निर्भर रहना पड़ता है.

अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी का कहना है, "इस बार अच्छा मानसून हर लिहाज से अहम है. बात चाहे उपभोक्ता मांग की हो, मुद्रास्फीति की हो, हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर की हो या फिर पानी की उपलब्धता की. एक बार मानसून का अच्छा न रहना आप जैसे तैसे झेल लेते हैं लेकिन लगातार दो बार मानसून की नाकामी बहुत मुश्किलें पैदा करेगी."

भारत दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा चावल, गेंहू और गन्ना उत्पादक देश है लेकिन उसकी 60 फीसदी खेती की जमीन सिचाई के लिए मानसून पर ही निर्भर करती है. अमेरिका के कृषि विभाग का कहना है कि अगर मानसून सामान्य रहता है तो भारत चावल उत्पादन में कमी की भरपाई कर सकता है. 13 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 2010-11 में यह उत्पादन लगभग दस करोड़ टन हो सकता है.

गर्मी में होने वाली चावल, गन्ना, कपास और तेल के बीज वाली फसलें जुलाई में बोई जाती हैं और अक्तूबर में काटी जाती हैं. अच्छा मानसून सर्दी की फसलों के लिए नमी के हिसाब से भी जरूरी है. ये फसलें नवंबर में लगाई जाती हैं और इनकी कटाई मार्च में होती है. इस बार सामान्य मानसून के अनुमानों को कृषि उत्पादन के लिए शुभ संकेत माना जा रहा है.

रिपोर्टः एजेंसियां/ए कुमार

संपादनः एस गौड़

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