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मंथन

सब जानकारी देता है डिजिटल फुटप्रिंट

खुफिया एजेंसियों की नजरें सब पर होती हैं. कौन कब क्या कर रहा है, हर शख्स अपनी छाप छोड़ते चलता है. इंटरनेट में कौन सी वेबसाइट देखी, किसके ईमेल पढ़े, अमेजन पर क्या खरीदा, ये सब जानकारी देता है डिजिटल फुटप्रिंट.

इंटरनेट पर इतनी जानकारी पर नजर कैसे रखी जाती है, यह समझने के लिए बर्लिन में गणित के प्रोफेसर राउल रोखास एक डाटाबैंक पर काम कर रहे. वह बताते हैं कि इतना सारा डाटा छांटना गणित के लिए बेहद मुश्किल है, "अगर मैं खास जानकारी ढूंढना चाहूं तो इसे फिल्टर करना भी एक चुनौती है. मिसाल के तौर पर इस डाटाबैंक में करोड़ों ईमेल हैं. हम इसमें शब्दों के एक संदिग्ध पैटर्न को खोज रहे हैं. हम एक अल्गोरिथम लगाते हैं जो ऐसा कर सकता है". राउल इस अल्गोरिथम के फॉर्मूले की मदद से ईमेल छांटते हैं और जब उन्हें कुछ संदिग्ध मिलता है तो एक दूसरे कंप्यूटर प्रोग्राम के जरिए ईमेल की जांच की जाती है.

DW.COM

ऐसे काम करता है अल्गोरिथम

जाहिर है इस डाटा में कई अक्षर हैं. अल्गोरिथम लगा कर किसी एक संदिग्ध शब्द या कई अक्षरों के कॉम्बिनेशन को ढूंढा जाता है. मिसाल के तौर पर 'बम'. अल्गोरिथम तब तक हर शब्द के पहले अक्षर को टेस्ट करता है जब तक वह उस शब्द तक नहीं आता जो 'बी' से शुरू होता है. फिर अल्गोरिथम के फॉर्मूले में 'बी' इस अक्षर के साथ मेल खा जाता है. इसके बाद वह पूरा सीक्वेंस टेस्ट करते रहते हैं.

इसके बाद संदिग्ध ईमेल भेजने वाले व्यक्ति के बारे में सारी जानकारी जुटाई जाती है जिससे पता चलता है कि वह क्या क्या करता है. इंटरनेट पर इस व्यक्ति के अलग अलग कामों को एक संख्या दी जाती है. क्या वह बहुत यात्रा करता है, क्या इसके पास क्रेडिट कार्ड है, वह महीने में कितना कमाता है, क्या उसके पास बीमा है, इस तरह की सारी जानकारी जुटाई जाती है.

इन आंकड़ों को आतंकवादियों के प्रोफाइल से मिलाया जाता है. अगर इनके प्रोफाइल मिलते जुलते हों, तो पुलिस काम पर लग जाती है. जर्मनी में बम हमलों की योजना बना रहे साउअरलांड ग्रुप के साथ भी ऐसा ही हुआ था. लेकिन तकनीक के बावजूद बॉस्टन मैराथन पर हमले की योजना को अल्गोरिथम से नहीं पकड़ा जा सका.

हालांकि कई बार बेकसूर भी इस चक्कर में फंस जाते हैं. इंटरनेट मेमोरी का बड़ा सा एक गोदाम है जिसमें आप नई जानकारी ला तो सकते हैं, लेकिन पुरानी चीजों को बाहर निकालना या डिलीट करना लगभग नामुमकिन है.

रिपोर्ट; कोर्नेलिय बोरमन/एम गोपालकृष्णन

संपादन: ईशा भाटिया