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ब्लॉग

सदमा और सौभाग्य

8 मई 1945 का दिन जर्मनी के इतिहास का एक अहम दिन है. डॉयचे वेले के फेलिक्स श्टाइनर का कहना है कि पिछले 70 सालों में पतन की भावना की जगह अलग नजरिए ने ले ली है, फिर भी सदमा बना हुआ है.

जर्मनों के लिए 8 मई 1945 का दिन हाल के इतिहास का एक मुश्किल दिन है. मुश्किल इसलिए कि वह विरोधाभासी है. हालांकि 30 साल से सब कुछ इतना स्पष्ट नजर आता है. राष्ट्रपति रिचर्ड फॉन वाइत्सेकर ने युद्ध की समाप्ति की 40वीं वर्षगांठ पर कहा था, "8 मई 1945 मुक्ति का दिन था. इसने हम सबको नाजियों के हिंसक शासन की अमानवीय व्यवस्था से मुक्ति दिलाई." शुरुआती दिनों के विपरीत इस बीच 90 फीसदी जर्मन इसी नजरिए को मानते हैं.

लेकिन यदि 8 मई सिर्फ मुक्ति दिवस होता तो यह जश्न मनाने का मौका होता, फिर जर्मन इस दिन को वैसे मनाते जैसे यूरोप में हमारे बहुत से पड़ोसी मनाते हैं, खुश होकर, उत्साह के साथ और समारोही तरीके से. लेकिन यह 70 साल बाद भी उचित नहीं होगा. जैसा कि वाइत्सेकर ने अपने भाषण में राजनेता के अंदाज में कहा था, "हम जर्मन ये दिन आपस में मनाते हैं और यह जरूरी है. हमें अपने पैमाने खुद खोजने होंगे." पैमाने क्योंकि इसका एक पैमाना नहीं हो सकता.

दोष, शोक, शर्म और आभार

एक ओर उन अपराधों का दोष और जिम्मेदारी है जो जर्मनी के नाम पर किए गए. यह दोष और जिम्मेदारी बाद की पीढ़ियों को भी स्थायी रूप से जोड़ती है, उसकी याद को ताजा रखना और सुनिश्चित करना कि ऐसा फिर न हो. दूसरी ओर शिकारों के लिए शोक और अपनी जनता की तकलीफ है. उन लोगों की जो उस युद्ध में मरे जो जर्मनी ने साढ़े पांच साल तक यूरोप पर ढाया था और जो पूरी पूरी ताकत के साथ वापस जर्मनी पर कहर बरपा रहा था. जो शहरों पर बमबारी में, पूर्वी जर्मनी से भागते हुए और देश पर जीत के दौरान मारे गए. औरतें और लड़कियां जिनके साथ बलात्कार किया गया. जर्मन सैनिक जो युद्धबंदी में मारे गए. और 1.2 करोड़ जर्मन जिन्हें 8 मई के बाद अपने घर से भगा दिया गया. इन सब की याद करना भी वैध और जरूरी है क्योंकि इसके साथ शिकारों के लिए हर्जाने या दोष को कम करने की बात नहीं जुड़ी है.

इसके अलावा शर्म भी है. शर्म इसलिए क्योंकि जर्मनी इस हालत में नहीं था कि वह नाजियों का अकेले मुकाबला कर सके. इस बात की शर्म कि नाजी राज्य अंतिम मिनट तक हर कहीं काम कर रहा था, हालांकि उसका पतन लंबे समय से तय था. बहुत जल्दी सफेद झंडा दिखाने वालों को इसकी कीमत जान देकर चुकानी पड़ी. भगोड़ों को मोबाइल अदालतों द्वारा मृत्युदंड दिया जाता था, भले ही विरोधी सेना करीब हो. हर कहीं व्यर्थ की बर्बादी, ठीक वैसा ही जैसा हिटलर चाहता था. यह सब आज अजीब लगता है लेकिन हमारे इतिहास का हिस्सा है. और अंत में आभार. इस बात के लिए कि हम जर्मनों को नाजीवाद के बावजूद एक मौका मिला. इस बात का मौका कि हम सिर्फ कब्जे वाला उपनिवेश न रहें बल्कि आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में भविष्य का रुख कर सकें. फ्रांस, ब्रिटेन और मुख्य रूप से अमेरिका ने बहुत जल्दी इस कदम को संभव बनाया. बिना शर्त आत्मसमर्पण करने के ठीक चार साल बाद 8 मई 1949 को 65 लोगों ने जर्मनी का संविधान पास किया जो आज भी लागू है. 1990 में सोवियत संघ ने भी सहमति दे दी कि यह संविधान सभी जर्मनों के लिए लागू हो.

इतिहास का मोड़

बहुत कम ही जर्मन थे जिन्होंने 8 मई 1945 के दिन को मुक्ति का दिन समझा. उस समय की स्थिति बहुत ही नाउम्मीदी भरी और असुरक्षित थी. जब नाजी शासन के आतंक की जगह कब्जावरों की मनमानी ने ली तो बहुत से लोगों के लिए प्राथमिकता किसी तरह जिंदा रहने की थी. लेकिन पीछे देखने पर पता चलता है कि वर्तमान की राह पर ये दिन एक निर्णायक मोड़ था. आजादी, मानवाधिकारों का पालन, और उदारवाद, जिस पर आज जर्मनी के लोग इतना नाज करते हैं, इस 8 मई 1945 के बिना संभव नहीं होता.

8 मई 1945 सौभाग्य के साथ साथ सदमा भी है. जो यह पूछता है कि जर्मन अंतरराष्ट्रीय सैनिक अभियानों में शामिल होने के बारे में इतने दुविधा में क्यों दिखते हैं, संकट की स्थिति में हथियार देने के बदले बातचीत और मध्यस्थता क्यों करते हैं, और यूक्रेन संकट में बर्लिन हमेशा मॉस्को से बातचीत करने पर जोर क्यों देता है, उन्हें उसका जवाब 1945 की घटनाओं में मिलेगा. अपने खुद के देश में युद्ध की बर्बरता एक राष्ट्रीय सदमा बना रहेगा, युद्ध के अंतिम प्रत्यक्षदर्शियों के चले जाने के बाद भी.

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