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ब्लॉग

सत्ता की सियासत में चंदे की चाशनी

भारत में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर काले धन का जिन्न सबसे पहले सामने आता है. काले धन के नाम पर सियासत जरूर तेज हो जाती है, मगर सियासी दल चंदे में मिलने वाले काले धन की हकीकत को बेशर्मी से पचा जाते हैं.

गाहे बगाहे समय समय पर काले धन का मुद्दा तब गर्माता है जब इसकी वापसी की राह में किसी विदेशी बैंक या उस मुल्क का कोई नकारात्मक फरमान आता है. या फिर अपनी ही किसी अदालत से इस बारे में कोई आदेश जारी होता है. बेशक जनता और हुक्मरान इस हकीकत से बावस्ता हैं कि काला धन एक काल्पनिक नूराकुश्ती है जिसका कोई अंत, कोई अंजाम नहीं है. फिर भी यह कवायद तमाम सियासी और गैरसियासी इदारों की दुकानें चलते रहने के लिए बेहतरीन खाद पानी मुहैया कराती है.

काले धन की मात्रा और इसकी वसूली भारत की ही नहीं, बल्कि कई मुल्कों की सनातन समस्या है. बेहद देशज अंदाज में अगर इसकी हकीकत को समझा जाए तो इसके मात्र दो पहलू हैं. पहला विदेशी बैंकों में जमा काला धन और दूसरा अपने ही देश में मौजूद काला धन. यह सर्वमान्य सच है कि विदेश जा पहुंचे काले धन की वापसी अगर असंभव नहीं, तो संभव भी नहीं है. इसकी वसूली को देश में मौजूद काले धन से ही हकीकत बनाया जा सकता है. उसमें भी सियासी दलों के पास मौजूद चंदे में मिले काले धन का आकलन किया जा सकता है. मगर यहां भी नाउम्मीदी ही है क्योंकि सियासत के इस रंगमंच पर चोर और थानेदार के किरदार घुलमिल गए हैं.

चंदे पर चुनाव आयोग को दी गई रिपोर्ट फिर दिखाती है कि सियासत और कॉरपोरेट जगत का गठजोड़ चंदे के रूप में काले धन से राजनीतिक दलों के पालन पोषण की समस्या को गहरा रहा है. खास कर बीते एक दशक में इस गठजोड़ की तस्वीर बेहयाई से खुल्लम खुल्ला प्यार करने वालों जैसी हो गई है. यह भी अब साबित करने की जरूरत नहीं कि काले धन के चंदे से अपने सियासी कुनबे को सींचने वाले कौन लोग हैं. बीते दो सालों में एक नई नवेली पार्टी ने अपने चंदे की पाई पाई का हिसाब बतौर रोजनामचा सार्वजनिक कर औरों को आईना तो दिखाया लेकिन स्थापित पार्टियों पर इससे फर्क नहीं पड़ा.

हाल में दो घटनाओं ने सियासत के इस कड़वे सच को साबित भी कर दिया है. पहला सूचना आयोग द्वारा सभी सियासी दलों को आरटीआई के दायरे में लाने पर सभी दलों द्वारा बेशर्म चुप्पी साध लेना और दूसरा हाल ही में जारी हुई एक रिपोर्ट में सियासी दलों को कॉरपोरेट घरानों से मिल रहे बेहिसाब चंदे की हकीकत का उजागर होना. सूचना आयोग के तमाम नोटिसों से इन दलों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी. जबकि सामाजिक संगठन एडीआर की रिपोर्ट में जब यह सामने आ गया है कि राजनीतिक दलों का 90 फीसदी चंदा कॉरपोरेट घरानों से आता है. और यह तब है जबकि सुशासन दिवस मना कर सिस्टम में पारदर्शिता लाने का दावा करने वाले सत्ताधारी दल ने तो अब तक चुनाव आयोग को अपने चंदे का हिसाब तक नहीं दिया है. इससे साफ जाहिर है कि काले धन और भ्रष्टाचार पर सभी दलों की मंशा एक जैसी है. सिर्फ वक्त के साथ इस रंगमंच पर चेहरे और पहनावे बदलते हैं मगर किरदार वही रहते हैं.

ब्लॉग: निर्मल यादव

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