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दुनिया

सतलुज यमुना लिंक नहर के बारे में आप क्या जानते हैं?

सतलुज यमुना लिंक (एसवाईएल) पर टिप्पणी करते हुए बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस परियोजना पर चल रहे विवाद को जल्द से जल्द खत्म करते हुए पंजाब राज्य को एसवाईएल नहर के निर्माण पर दिए गए आदेश का पालन करना होगा.

न्यायमूर्ति पीसी घोष और अमिताव रॉय की दो सदस्यीय बेंच ने साफ किया कि पंजाब सरकार को आदेश की अवहेलना की अनुमति नहीं दी जा सकती और अदालत इस बारे में राज्य सरकार का कोई भी बहाना नहीं सुनेगी.

न्यायालय ने कहा "बहुत हो चुका, नहर को अब बनाना ही होगा. यह मामला हमेशा नहीं चल सकता और हम चुनाव नतीजों का इंतजार भी नहीं कर सकते. कानून अपना काम करेगा और इस मामले में अगली सुनवाई 2 मार्च को होगी."

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले पर बढ़ते तनाव के चलते दोनों राज्यों ने एक-दूसरे की सीमाओं में बसों के आने जाने पर रोक लगा दी है और पंजाब ने हरियाणा से लगी सीमाएं भी सील कर दी गई हैं. हरियाणा ने भी घोषणा की है कि राज्य परिवहन की बसें पंजाब नहीं जाएंगी. हरियाणा में विपक्षी इंडियन नैशनल लोकदल ने इसे "वाटर वॉर" का नाम दिया है.

क्या है मसला

यह पूरा विवाद साल 1966 में हरियाणा राज्य के बनने से शुरू हुआ था. पंजाब और हरियाणा के बीच जल बंटवारे को लेकर सतलुज-यमुना लिंक नहर परियोजना के अंतर्गत 214 किलोमीटर लंबा जल मार्ग तैयार करने का प्रस्ताव था. इसके तहत पंजाब से सतलुज को हरियाणा में यमुना नदी से जोड़ा जाना है. इसका 122 किलोमीटर लंबा हिस्सा पंजाब में होगा तो शेष 92 किलोमीटर हरियाणा में. हरियाणा समान वितरण के सिद्धांत मुताबिक कुल 7.2 मिलियन एकड़ फीट पानी में से 4.2 मिलियन एकड़ फीट हिस्से पर दावा करता रहा है लेकिन पंजाब सरकार इसके लिए राजी नहीं है. हरियाणा ने इसके बाद केंद्र का दरवाजा खटखटाया और साल 1976 में केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी की जिसके तहत हरियाणा को 3.5 मिलियन एकड़ फीट पानी का आवंटन किया गया.

नहर की अहमियत

इस नहर के निर्माण से हरियाणा के दक्षिणी हिस्से की बंजर जमीन को सींचा जा सकेगा. हरियाणा ने नहर के अपने हिस्से का निर्माण 1980 में करीब 250 करोड़ रुपये खर्च कर पूरा कर लिया था. पंजाब में नहर के निर्माण पर आने वाले खर्च का कुछ हिस्सा हरियाणा को देना था. हरियाणा ने 1976 में ही एक करोड़ रुपये की पहली किश्त पंजाब सरकार को दी थी लेकिन पंजाब ने नहर बनाने की दिशा में कोई काम नहीं किया. विवाद गहराया तो दोनों राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दायर कीं.

त्रिपक्षीय समझौता

 तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों से मुलाकात की. तीनों ही मुख्यमंत्रियों ने एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किये. इस समझौते के तहत पंजाब को नहर निर्माण कार्य दो साल में पूरा करना होगा और दोनों ही पक्ष न्यायालय से याचिका वापस लेंगे. पंजाब ने एक त्रिपक्षीय समझौते के बाद नहर पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया लेकिन उस वक्त भी दोनों पक्षों की याचिकाएं अदालत में लंबित रहीं.

लेकिन संत हरिचंद्र सिंह लोंगोवाल के नेतृत्व में नहर के खिलाफ शिरोमणि अकाली दल ने एक आंदोलन शुरू किया. अगस्त 1982 तक यह विरोध और आंदोलन एक धर्म युद्ध में तब्दील हो गया और साल 1985 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी और लोंगोवाल ने पंजाब समझौते पर हस्ताक्षर किये. इसके मुताबिक अगस्त 1986 तक नहर निर्माण का कार्य पूरा किया जाएगा और शीर्ष न्यायालय के न्यायाधीश के नेतृत्व वाला प्राधिकरण शेष पानी पर पंजाब और हरियाणा की हिस्सेदारी तय करेगा.

पंजाब ने रोका निर्माण

एसएस बरनाला के नेतृत्व वाली अकाली दल सरकार ने 700 करोड़ की लागत से नहर का 90 फीसदी काम पूरा भी किया लेकिन 1990 में सिख उग्रवादियों ने जब दो वरिष्ठ इंजीनियरों और नहर पर काम कर रहे 35 मजदूरों को मार डाला तो इसका निर्माण कार्य बंद कर दिया गया. साल 1996 में हरियाणा ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते हुए मांग की कि पंजाब नहर का निर्माण कार्य पूरा करे. अदालत ने जनवरी 2002 और जून 2004 में नहर के शेष भाग को पूरा करने का आदेश दिया. केंद्र ने साल 2004 में अपनी एक एजेंसी से नहर के निर्माण कार्य को अपने हाथों में लेने को कहा लेकिन एक ही महीने बाद पंजाब विधानसभा ने एक कानून लाकर जल बंटवारे से जुड़े सभी समझौतों को खत्म कर दिया.

मौजूदा स्थिति

साल 2004 में केंद्र ने पंजाब के इस कदम पर अदालत से सुझाव मांगा जिसके बाद न्यायालय ने मामले की सुनवाई की. हरियाणा ने 2002 और 2004 में जारी आदेशों को लागू कराने के लिए साल 2011 में एक याचिका दायर की थी.

वहीं पंजाब ने 2016 में एक याचिका दायर पानी के बंटवारे पर एक नया ट्रिब्यूनल बनाने की मांग की. पंजाब ने एक और कानून बनाया और इसमें नहर बनाने के लिए अधिग्रहित की गई जमीन को इसके मालिकों को वापस लौटाने की बात कही. इस कानून को हरियाणा ने शीर्ष अदालत में चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थित बनाए रखने का आदेश दिया. इसके साथ ने पंजाब ने नहर निर्माण के लिए हरियाणा से अब तक मिली 192 करोड़ रुपये की राशि को भी लौटा दिया है. 

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