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ब्लॉग

सड़क सुरक्षा के लिए इच्छाशक्ति जरूरी

भारत में हर साल हजारों लोग सड़क हादसों में मारे जाते हैं. लेकिन बावजूद इसके इन पर अंकुश लगाने के लिए कहीं से कोई ठोस पहल नहीं हुई है.

केंद्र सरकार ने बरसों पहले नया कानून बनाने की दिशा में पहल की थी. लेकिन राजनीतिक दाव-पेंच की वजह से वह प्रस्ताव अभी फाइलों में धूल फांक रहा है. अब परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने शीघ्र उसे कानून का स्वरूप देने का भरोसा दिया है.

जमीनी हकीकत

एनडीए सरकार के कार्यकाल में देश में सड़कों का जाल बिछाने के लिए एक महात्वाकांक्षी परियोजना तैयार की गई थी. उसके तहत विभिन्न महानगरों को एक-दूसरे से जोड़ा जाना था. उस परियोजना के तहत कई अच्छी सड़कों बनीं. लेकिन सड़कों का जाल बिछाने के फेर में सबसे अहम मुद्दे यानी सड़क सुरक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. नतीजतन उस दौरान बने हाइवे और एक्सप्रेसवे पर रफ्तार से होड़ लेते वाहनों के हादसों का शिकार होने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं.

भारत की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां ज्यादातर राज्यों में अब तक वाहनों की कोई गति सीमा नहीं तय की गई है. सड़कों पर रोजाना नए-नए देशी-विदेशी वाहन उतर रहे हैं. इससे हादसों की आशंका भी तेज हो रही है. देश में बेहतर सड़कों का हादसों से करीबी संबंध हैं. यहां बढ़िया सड़कों पर वाहन चालक काफी तेज गति से चलाते हैं और सुरक्षा नियमों की जमकर अनदेखी होती है. हाल के एक अध्ययन से पता चला है कि वाहनों की रफ्तार में 10 फीसदी वृद्धि से सड़क हादसों में होने वाली मौतों की तादाद 30 फीसदी तक बढ़ सकती है.

समस्या की वजह

सड़क हादसों में लगातार बढ़ती मौतों के लिए कई वजहें जिम्मेदार हैं. सड़क हादसों की वजहों के विश्‍लेषण से पता चलता है कि 78.7 फीसदी हादसे चालकों की लापरवाही के चलते होती हैं. इसकी वजहों में शराब व दूसरे नशीले पदार्थों के सेवन से लेकर अधिक माल लादना या ज्यादा सवारियां बैठाना शामिल है. साथ ही, ज्‍यादा रफ्तार से गाड़ी चलाना और ड्राइवर का थका होना भी कारण हो सकते हैं. ड्राइवरों की लापरवाही ही ऐसे हादसों की प्रमुख वजह है.

ऐसे में उनमें जागरुकता पैदा करना काफी अहम है. उनको यह अहसास कराना जरूरी है कि उनकी ओर से ट्रैफिक नियमों की अनदेखी की वजह से बेकसूर लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है. सड़क परिवहन मंत्रालय ने देश में हादसों की तादाद पर अंकुश लगाने के लिए कुछ उपाय किए हैं. उसने राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का अनुमोदन किया है. लेकिन अभी यह कागजों पर ही सीमित है. अब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्द्धन ने हाल में परिवहन मंत्रालय को सड़क सुरक्षा से संबंधित नए प्रस्तावित कानून के सिलसिले में कई सुझाव भेजे हैं. इनमें हेलमेट नहीं पहनने या सीट बेल्ट नहीं बांधने वालों को ईंधन की सप्लाई नहीं करने और भारी वाहनों के चालकों का नियमित अंतराल पर मानसिक परीक्षण अनिवार्य करने जैसे सुझाव हैं. सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ इंद्रजीत जाना इंग्लैंड में हुए एक अध्ययन के हवाले कहते हैं कि सीट बेल्ट बांधने की स्थिति में वाहनों में सामने की सीट पर पर बैठे यात्रियों की मौत की संभावना आधी हो जाती है.

बाधाएं और उपाय

सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करने की राह में आखिर क्या बाधाएं हैं? हाल के वर्षों में हुए विभिन्न अध्ययनों के आधार पर कहा जा सकता है कि आम लोगों की ओर से सड़क सुरक्षा नियमों की अनदेखी, ड्राइवरों की लापरवाही, सड़कों की बदहाल स्थिति, शराब पीकर वाहन चलाने और ट्रैफिक नियमों पर कड़ाई से अमल नहीं होने जैसे मुद्दे ही बढ़ते सड़क हादसों के लिए जिम्मेदार हैं.

यहां ड्राइविंग लाइसेंस के नियमों को भी कड़ा बनाना जरूरी है. फिलहाल शिथिल नियमों और बिचौलियों के सहारे ठीक से ड्राइविंग नहीं कर पाने वालों को भी आसानी से लाइसेंस मिल जाता है. सड़क हादसे में शामिल ड्राइवरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई जरूरी है. एक से ज्यादा बार हादसे की स्थिति में लाइसेंस निलंबित या निरस्त करने का प्रावधान किया जाना चाहिए.

सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ और इंस्टीट्यूट फार रोड ट्रैफिक एजुकेशन के अध्यक्ष रोहित बालूजा कहते हैं कि ट्रैफिक नियम तोड़ने पर कई गुना ज्यादा जुर्माना व सजा, ड्राइविंग लाइसेंस के निलंबन या रद्द होने का भय, पैदल यात्री, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और बच्चों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान, वाहनों के निर्माण, रजिस्ट्रेशन और चालन के सख्त नियम, सड़कों की गुणवत्ता और बेहतर आधारभूत ढांचे पर जोर, हर पांच साल में कार व दुपहिया वाहनों का सुरक्षा परीक्षण, बच्चों के लिए हेलमेट और स्कूल बसों में जीपीएस व कैमरे को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए. इससे बढ़ते सड़क हादसों पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है. आम लोगों में जागरुकता पैदा करने के लिए गैर-सरकारी संगठनों का भी सहारा लिया जा सकता है. लेकिन तमाम विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि सड़क सुरक्षा से संबंधित चाहे जितने भी नए नियम-कानून बनाए जाएं, जब तक उन पर कड़ाई से अमल नहीं होगा तब तक इस समस्या पर अंकुश लगाना मुश्किल है. इसके लिए जरूरी है एक मजबूत राजनीतिक इच्छा शक्ति की.

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