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ब्लॉग

सऊदी-ईरान विवाद का फायदा आईएस को

सऊदी अरब में शिया मौलवी को फांसी के बाद तेहरान में सऊदी दूतावास पर हमला और फिर ईरान के साथ सुन्नी देशों का कूटनीतिक रिश्तों को तोड़ने का सिलसिला. डॉयचे वेले के म का कहना है कि इस विवाद का फायदा आईएस को होगा.

खबर छोटी सी थी: सऊदी अरब ने आतंकी गतिविधियों और आपराधिक साजिश के आरोप में 47 लोगों को फांसी दी है. उनमें से एक थे शिया मौलाना निम्र अल निम्र. सालों तक ईरान में रह चुके अल निम्र सऊदी अरब और बहरीन में शियाओं के अधिकारों का समर्थन कर रहे थे.

बहुत आम है फांसी

फांसी ईरान और सऊदी अरब दोनों में ही बहुत आम है. फांसी देने वाले देशों में चीन के बाद ईरान दूसरे नंबर पर और सऊदी अरब उसके ठीक बाद है. यह बात कोई राज नहीं है कि दोनों ही देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों का दमन होता है और कभी कभी उन्हें फांसी भी दे दी जाती है. लेकिन अल मिम्र की फांसी एक खूनी और लक्षित उकसावा था और इस तरह मध्यपूर्व नाम के बारूद में चिंगारी लगाने जैसा. इस उकसावे ने वही किया है जिसकी रियाद उम्मीद कर रहा था, ईरान की ओर से बिना सोची समझी प्रतिक्रिया. यानि तेहरान में सऊदी दूतावास और मशहद में कंसुलेट पर धावा. इस नजरिए से अल निम्र का मामला एक फांस था.

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जमशीद फारूगी

उसके तुरंत बाद ईरान, इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में प्रदर्शन हुए और पूरा मध्यपूर्व आरोपों प्रत्यारोपों और दूतावासों को बंद करने के खेल में फंस गया. मामला कूटनीतिक संकट में बदल गया. अब कहा जा सकता है कि अल निम्र की फांसी के नतीजे गंभीर हैं, सिर्फ सऊदी राजघराने और ईरान के अयातोल्लाह के पहले से बिगड़े संबंधों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे मध्यपूर्व के लिए.

दूरगामी परिणाम

सऊदी अरब ने ईरान के साथ रिश्ते पूरी तरह तोड़ दिए. बहरीन, सूडान और जीबूती ने उसका साथ दिया. यूएई ने भी अपने राजदूत को वापस बुला लिया. कूटनीतिक विवाद के और भड़कने का खतरा गंभीर है. लेकिन सवाल यह है कि ईरान आखिरकार यह गलती दोबारा क्यों कर रहा है? क्या दूसरे दूतावासों पर अब तक हुए हमलों से कोई सबक नहीं सीखा गया है? क्या विदेशनैतिक अलगाव ने अब तक पर्याप्त नुकसान नहीं पहुंचाया है? ये निश्चित तौर पर आसान सवाल नहीं हैं और उनका कोई आसान जवाब भी नहीं है.

मामला सिर्फ एक शिया मौलाना को दी गई फांसी का नहीं है, सुन्नियों और शियाओं के बीच धार्मिक विवाद का भी नहीं. मध्यपूर्व में वर्चस्व की लड़ाई है. सचमुच क्षेत्रीय सत्ताओं के बीच खतरनाक छद्मयुद्ध चल रहा है. और इस विवाद के पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लेने का खतरा है. ईरान और पश्चिमी देशों के बीच हुए परमाणु समझौते के दुश्मन सिर्फ सऊदी राजघराना, इस्राएल और खाड़ी के देश नहीं हैं. ईरान में ऐसी ताकतें हैं जो इलाके में राजनीतिक तनाव पर जिंदा हैं. अल्ट्रा कंजरवेटिव ताकतें तो शुरू से ही इसके खिलाफ थीं. वे दुश्मन नंबर एक अमेरिका के साथ हर तरह की नजदीकी के खिलाफ हैं.

किसे होगा लाभ

इस ग्रुप की सऊदी अरब के भड़काऊ लोगों के साथ गहरी समानता है. सऊदी दूतावास पर हमला सऊदी राजघराने के उकसावे पर इस ग्रुप की प्रतिक्रिया थी. राजनयिक संबंध टूटने का दोनों को ही फायदा है. कूटनीतिक संकट उन्हें बेरोकटोक छद्म युद्ध में खुलकर भाग लेने की छूट देता है. लेकिन इसका नुकसान दूसरों को होगा. सीरिया विवाद का शांतिपूर्ण समाधान और दूर खिसक गया है, यमन और इराक में शांति की स्थापना मुश्किल हो गई है. जातीय और धार्मिक ग्रुपों के विवाद ने हिंसा का सामना कर रहे इलाके को और अस्थिर कर दिया है.

इस विवाद का असली फायदा सीरिया और इराक में सक्रिय आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट और उसके समर्थकों को होगा. खतरा ऐसा नहीं कि चुप होकर बैठा जाए और घटनाओं को होने दिया जाए. इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, विश्व समुदाय को फौरन प्रतिक्रिया दिखानी होगी और हस्तक्षेप करना होगा.

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