सऊदी अरब के नए किंग की चुनौतियां | दुनिया | DW | 31.01.2015
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दुनिया

सऊदी अरब के नए किंग की चुनौतियां

सऊदी अरब में किंग अब्दुल्ला की मौत के बाद उनके भाई सलमान बिन अब्दुल अजीज अल सऊद ने सत्ता संभाली है. उनके सामने रूढ़िवादी वहाबी विचारधारा पर लगाम लगाने की चुनौती है और सुन्नी आतंक से निबटने की भी.

भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने शुभकामनाएं भेजीं तो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपना भारत दौरा बीच में छोड़कर किंग से मिलने गए और साथ काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई. सऊदी अरब के नए राजा को फोन पर बधाई देने के बाद भारतीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा, "दोनों दोस्ताना देशों के बीच संबंध ऐतिहासिक रूप से काफी करीबी रहे हैं. दोनों देशों के लोगों के बीच आपसी संपर्क गहरा और परस्पर सम्मान का रहा है. मुझे पूरा विश्वास है कि राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के मामले में सहयोग और मजबूत होगा."

सऊदी अरब में वहाबी संप्रदाय के प्रतिनिधियों की रूढ़िवादी राजशाही है. इन दिनों वह एक ब्लॉगर को दस साल के लिए कैद करने और 1000 कोड़ों की सजा देने के लिए सुर्खियों में है. नए राजा के सामने आंतरिक राजनैतिक सुधारों के अलावा विदेश नीति के मोर्चे पर भी तमाम चुनौतियां हैं. किंग अब्दुल्लाह लंबी बीमारी के बाद 23 जनवरी को गुजर गए. 10 सालों तक गद्दी संभालने वाले किंग अब्दुल्ला दुनिया के बुजुर्ग शासक थे. उनकी मौत के बाद यह रिकार्ड उम्र में उनसे दो साल छोटी ब्रिटेन की महारानी क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय के नाम है.

ज्यादा खुले विचारों के

किंग सलमान को सऊदी मापदंडों के हिसाब से कुछ ज्यादा खुले दिमाग वाला और "सुधारवादी" माना जाता है. 79 साल की उम्र में सत्ता संभालने वाले किंग सलमान के सामने एक ओर तो देश के सैकुलर किस्म के उच्चकुलीय लोगों को सीमा में रखने की चुनौती है, तो दूसरी ओर अतिसंकीर्ण मानसिकता वाले वहाबी समुदाय पर भी नजर है. किसी भी सामाजिक सुधार के लिए उन्हें इन दोनों ही पक्षों का सामना करना होगा.

वहाबी समुदाय के कट्टरवादियों के हाथ में काफी शक्ति है. वहाबी संस्कृति को सऊदी अरब की सरकार ही दुनिया के कई देशों में बढ़ावा दे रही है. 2011 के अरब वसंत आंदोलन के नतीजों से डरकर सऊदी अरब ने 2013 में मिस्र में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए पहले राष्ट्रपति मुहम्मद मुर्सी के तख्तापलट का समर्थन किया था और उसके लिए अपना पैसा लगाया था.

आईएस को कुचलने के लिए साथ जरूरी

हाल में सीरिया और इराक जैसे देशों में इस्लामिक स्टेट के उभार के कारण भी सऊदी अरब चिंतित है. सऊदी अरब के सुन्नी नेतृत्व के लिए आईएस जिहादी एक बड़ा खतरा हैं और उनसे निपटने के लिए इसे पश्चिमी देशों की मदद की जरूरत है. भारत की यात्रा पूरी कर अमेरिकी राष्ट्रपति सऊदी अरब जाकर नए शासक से मिले और आईएस के खिलाफ लड़ाई में एक दूसरे का साथ देने पर चर्चा की. वहां के रूढ़िवादी समाज में मानवाधिकारों की स्थिति सुधारने के अलावा ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी बातचीत हुई. कई सालों से मध्यपूर्व में अमेरिका का प्रमुख क्षेत्रीय सहयोगी रहा सऊदी अरब पिछले साल से ही अमेरिका के साथ मिल कर आईएस के ठिकानों पर हवाई हमले भी कर रहा है.

Obama in Saudi Arabien 27.01.2015

ओबामा और किंग सलमान की मुलाकात

अमेरिका के ईरान के साथ परमाणु कार्यक्रम पर सहयोग के रास्ते पर बढ़ने से राजधानी रियाद से नाराजगी के स्वर भी उठे हैं. शिया बहुल ईरान से किसी भी तरह के संबंधों को सुन्नी बहुल सऊदी अरब पसंद नहीं करता. एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने समाचार एजेंसी एपी से बताया कि राष्ट्रपति ओबामा और किंग सलमान के बीच "आईएस के विरुद्ध अभियान के अलावा सीरिया के विपक्ष को सहयोग जारी रखने और इराक में एकता को बढ़ावा देने की जरूरत" पर चर्चा हुई. ओबामा की वापसी के बाद किंग सलमान ने ट्वीट किया, "राष्ट्रपति ओबामा की मेजबानी करना हमारा सौभाग्य था. दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक संबंधों और विश्व शांति के लिए कूटनीतिक साझेदारी पर बात हुई."

आरआर/एमजे(पीटीआई, एपी)

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