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ब्लॉग

संशोधन लागू हुए तो फिर कहां का आरटीआई

दुनिया के सबसे पारदर्शी सूचना के अधिकार कानून की मूल भावना पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं. कुछ ऐसे संशोधन प्रस्तावित हैं जो न सिर्फ़ सख्त, जटिल और अटपटे लगते हैं बल्कि आरटीआई एक्टिविस्टों के लिए ही चुनौती बन सकते हैं.

एक पारदर्शी सूचना सिस्टम भारतीय लोकतंत्र की सेहत और विकास के लिए कितना अहम है, करीब 12 साल पुराने सूचना का अधिकार कानून की लोकप्रियता और शुरुआती सफलताओं से, ये सहज ही पता चल जाता है. एक अनुमान के मुताबिक आरटीआई के तहत हर साल 50-55 लाख अर्जियां दी जाती हैं और इस तरह ये दुनिया का सबसे ज्यादा और सबसे व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल किया जाने वाला कानून भी बना है. आरटीआई के जरिये ऐसी कई अहम सूचनाएं पब्लिक डोमेन में आई हैं जो अन्यथा यूं ही दबी रह जातीं. कई सुधार कार्यक्रम शुरू हुए हैं और वंचितों को उनके अधिकार और सुविधाएं हासिल हुई हैं. आरटीआई ने सरकारी सिस्टम की निष्क्रियता, अकर्मण्यता और यथास्थितिवाद को भी भरसक तोड़ने की कोशिश की है. लोग जागरूक हुए हैं तो सरकारी कर्मचारी भी कुछ मुस्तैद हुआ है. लेकिन ये मुस्तैदी कुछ दूर चलकर ढेर हो जाती है और जागरुकता का भी यही हश्र होता है.

आंकड़े का अभाव

इसी अप्रैल में पुणे के सुहास हलदनकर की हत्या हुई है. अक्टूबर 2005 से अब तक आरटीआई एक्टिविस्टों की हत्या के कुल 65 मामले सामने आए हैं. दिल्ली की एक संस्था कॉमनवेल्थ ह्युमन राइट्स इनीशिएटिव, सीएचआरआई ने मीडिया रिपोर्टो के आधार पर पाया कि 157 एक्टिविस्टों पर जानलेवा हमले हुए हैं, 167 को परेशान किया गया है या धमकी दी गई है जबकि छह एक्टिविस्ट आत्महत्या को विवश हुए. हत्या की सबसे ज्यादा वारदात क्रमशः महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश में हुई हैं. हालांकि देश में अब तक कुल आरटीआई आवेदनों और उनके निस्तारण का कोई सटीक विधिवत आंकड़ा उपलब्ध नहीं है लेकिन सीएचआरआई का एक सर्वे बताता है कि 2005 से 2015 तक पौने दो करोड़ आरटीआई आवेदन दाखिल हुए और इनमें से 65 फीसदी से ज्यादा क्रमशः केंद्र सरकार, महाराष्ट्र सरकार और कर्नाटक सरकार के विभागों से जुड़े थे. कुल मिलाकर कोई व्यवस्थित, समग्र और स्ट्रेटीफाइड आंकड़े उपलब्ध नहीं है. सरकारों को और सूचना आयोगों को भी इस दिशा में काम करना चाहिए कि समग्र तस्वीर सामने आ सके.

Subhash Chandra Agrawal (DW/M. Krishnan)

भारत में सुभाष अग्रवाल ने सूचना के अधिकार का लोकप्रिय बनाया है

प्रस्तावित संशोधन अगर मान लिए गए, जिसमें सरकार को कोई मुश्किल शायद ही आए, तो वे समूची आरटीआई  प्रक्रिया को एक तंग गली बना सकते हैं. न सिर्फ भारी भरकम कागजी कार्रवाई के रूप में बल्कि हर कागज एक अलग विधिक पेचीदगी की मांग के रूप में. सीधे रास्ते से हासिल हो सकने वाली चीजों के लिए अब टेढ़े-मेढ़े गलियारे हो सकते हैं और असली आरटीआई आवेदक को अपनी मायूसी और हताशा में लौटना पड़ सकता है. दस्तावेजों की अनुसूची हो, संलग्नक लगाने की बात हो या तमाम कागजों पर विश्वसनीयता की सरकारी मुहर, कागज सिलसिलेवार हों, मांगी गई सूचना से मेल खाते हों, मानो प्रक्रिया को बोझिल बनाने और उलझाने की रणनीति. यहां तक कि आवेदक को प्रमाणित करना होगा कि उसकी शिकायत पूर्व में दर्ज नहीं है और न उस पर पहले सुनवाई हुई है, और आयोग के सामने या अदालत में भी वो लंबित नहीं है. गरज ये कि आवेदक भी आप और भुगतिए भी आप. वैसे प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो की ओर से जारी सफाई मे कहा गया है कि आरटीआई के प्रस्तावित संशोधनों में ऐसी कोई असाधारणता नहीं है बल्कि 2007 और 2012 के संशोधनों को ही अमल में लाने की बात है. ब्यूरो के मुताबिक न तो आरटीआई आवेदन के शुल्क में वृद्धि की गई है और न ही शब्द संख्या बाध्यकारी तौर पर निर्धारित की गई है.

जटिल प्रक्रिया

अगर थक-हार कर आवेदक सूचना आयोग में अपनी अर्जी लगाता है तो प्रस्तावित संशोधनों की सलाह है कि उसके साथ फोटोप्रति उस अर्जी की भी लगानी होगी जो पीआईओ के पास जमा की गई है. लेकिन कई मामलों में देखा जाता है कि विभागीय जन सूचना अधिकारी अर्जी को टाल देते हैं, रोक देते हैं या लेने से ही मना कर देते हैं या कई जगह पीआईओ तैनात ही नहीं हैं. एक प्रस्ताव ये है कि आरटीआई का आवेदन, शिकायत की वजह पैदा होने की तारीख से 90 दिन के भीतर करना होगा अन्यथा देरी का कारण बताना होगा. सबसे चिंताजनक प्रस्तावित प्रावधान यह है कि आवेदक की मृत्यु हो जाने की स्थिति में कार्यवाही बंद मान ली जाएगी, या आवेदक अगर लिखित में देगा तो अपील वापस ली जा सकेगी. कौन नहीं जानता कि आरटीआई एक्टिविस्ट कैसे डरावने और जानलेवा माहौल में काम करते हैं. क्या विभिन्न किस्म का माफिया इससे और बुलंद नहीं होगा? आरटीआई आवेदक की मौत पर कार्यवाही बंद करना उनपर हमलों को बढ़ावा दे सकता है. क्या सरकार को इसका अंदेशा नहीं है? और ये हालात तब है जबकि तीन साल पहले संसद से पास हो चुका व्हिसल ब्लोअर्स प्रोटेक्शन एक्ट अभी तक लागू नहीं हो पाया है.

आखिर में एक बात. प्रस्तावित नियमों पर लोगों की प्रतिक्रियाएं और टिप्पणियां मांगी गई हैं. इसके लिए एक फीडबैक विंडो है. अवधारणा में भले ही ये खिड़की हो लेकिन व्यवहारिकता में ये एक किस्म की दीवार ही दिखती है.

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