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दुनिया

'संवैधानिक अधिकारों का हनन है महिलाओं को रोकना'

भारतीय मंदिरों में महिलाओं को प्रवेश करने से रोकने का कोई संवैधानिक आधार नहीं है. यह साफ करते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इसे लैंगिक बराबरी के संघर्ष को कमजोर करने का प्रयास बताया है.

भारत की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने दक्षिण भारतीय राज्य केरल के सबरीमाला अयप्पा हिंदू मंदिर बोर्ड के सदस्यों से पूछा है कि उन्होंने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध क्यों लगाया है. सबरीमाला मंदिर भारत के उन कुछ प्रमुख मंदिरों में से एक है जो 10 से 50 साल की लड़कियों और महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं देते. मंदिर का मानना है कि इस उम्र में मासिक धर्म होने के कारण लड़कियां और महिलाएं अपवित्र होती हैं.

तीन जजों की बेंच के प्रमुख जस्टिस दीपक मिश्रा ने मंदिर के प्रबंधन बोर्ड को कहा कि अपने प्रतिबंध की दलीलें देते हुए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे भारत के संविधान पर आधारित हों. जस्टिस मिश्रा ने सवाल किया, "मंदिर के किसी भी हिस्से में एक महिला को जाने से रोकने का आपको क्या अधिकार है? क्या आप किसी महिला से माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई करने का अधिकार छीन सकते हैं? किसी भी प्रंतिबध का कारण सबके लिए एक समान होना चाहिए."

कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे किसी मामले में लैंगिक आधार पर भेदभाव स्वीकार्य नहीं है. देश भर में पूजा-प्रार्थना की जगहों पर बराबरी का हक पाने के लिए हाल ही में कई जगह संघर्ष हुए हैं. इस मुद्दे के कारण एक बार फिर भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में महिला अधिकारों की स्थिति पर खूब बहसें छिड़ी हैं. सोशल मीडिया साइट ट्विटर पर हैशटैग #RightoPray के साथ लोगों ने अपने विचार रखे हैं.

किशोरावस्था से लेकर रजोवृत्ति की उम्र तक महिलाओं को हर महीने होने वाली सामान्य शारीरिक क्रिया मेंस्ट्रुएशन के दिनों में भारत ही नहीं कई अन्य दक्षिण एशियाई देशों में भी उनसे तरह तरह का भेदभाव किया जाता है. कुछ जगहों पर उन्हें मंदिर और रसोई से बाहर, तो कहीं कहीं घर के भी बाहर रखा जाता है. मासिक धर्म के दौरान कई जगहों पर उन्हें त्योहारों और किसी दूसरी सामुदायिक गतिविधि में हिस्सा लेने से भी रोका जाता है.

सबरीमाला मंदिर के प्रतिबंध के खिलाफ याचिका दायर करने वाले भारतीय युवा अधिवक्ता संगठन के रवि प्रकाश गुप्ता कहते हैं, "हिंदू धर्म में उम्र के आधार पर किसी तरह का प्रतिबंध लगाने की परंपरा नहीं रही है." मंदिर के प्रतिबंध को चुनौती देने के कारण इस संगठन को जान से मारने तक की धमकियां दी गईं.

सुप्रीम कोर्ट के यह बयान महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर के गर्भ गृह को महिलाओं के लिए भी खोलने के मुंबई कोर्ट के फैसले के कुछ ही दिनों के बाद आया है. मुंबई कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा था कि ऐसी किसी भी पूजा की जगह पर महिलाओं को भी जाने का उतना ही बुनियादी अधिकार है जितना पुरुषों को है. कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्यों को इस अधिकार की रक्षा करनी चाहिए. इसके बाद महाराष्ट्र के ही महालक्ष्मी मंदिर में भी महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी गई.

एक दूसरे मामले में, मुंबई की ही एक प्रसिद्ध मस्जिद में महिलाओं को प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए दो मुसलमान महिलाएं संघर्षरत हैं. सबरीमाला मंदिर प्रशासन ने महिलाओं के प्रवेश पर रोक को सदियों पुरानी परंपरा बताते हुए कहा है कि "इस मामले को केवल पूजा करने वालों के पक्ष से नहीं, बल्कि उस पूज्य (अयप्पन) के पक्ष से भी देखना जरूरी है, जो कि एक ब्रह्मचारी हैं."

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