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मनोरंजन

संघर्ष के बीच आम जिंदगी

भारतीय पत्रकार किशलय भट्टाचार्जी का भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से पुराना रिश्ता है. वह वहीं पले बढ़े और उनका पेशेवर जीवन भी काफी हद तक वहां बीता. शायद इसी वजह से वह इनके बारे में पूर्वाग्रह खत्म करना चाहते हैं.

डीडब्ल्यू के साथ बातचीत में अपनी किताब 'चे इन पाओना बाजार' के जरिए भट्टाचार्जी मणिपुर को संघर्ष से परे एक कौम की तरह समझने की कोशिश कर रहे हैं.

आपकी किताब का नाम आपने 'चे इन पाओना बाजार' क्यों रखा?
नाम में चे चे गेवारा से है और पाओना बाजार मणिपुर की राजधानी इम्फाल में एक जगह है. म्यांमार की सरहद पर मणिपुर भारत का एक ऐसा राज्य है जहां आज सबसे ज्यादा संघर्ष चल रहा है वह भी पिछले 30 साल से. पाओना बाजार में चीन और म्यांमार से सामान आता है. दिलचस्प बात यह थी कि हर दुकान में टीशर्ट, जूते या टोपियां होती थीं जिसमें चे गेवारा का चेहरा बना हुआ था.

चे गेवारा वहां इतने लोकप्रिय क्यों हैं?
मुझे पहले तो लगा कि शायद वहां विद्रोह की वजह से लोग चे को पसंद करते हैं. लेकिन वहां के ज्यादातर विद्रोहियों को पता ही नहीं है कि चे कौन थे. लेकिन जिस वक्त मैं यह किताब लिख रहा था उस वक्त टीशर्ट पर चे गेवारा का चेहरा फैशन में आ गया था.

किताब में आपने किन मुद्दों पर बात की है?
एक टीवी पत्रकार के सामने हमेशा यह चुनौती होती है कि वह बिना संदर्भ के केवल खबर देता है, क्योंकि आपके पास वक्त कम होता है और आपको अपनी खबर कम वक्त में और सटीक तरीके से देनी पड़ती है. और जिन इलाकों में संघर्ष हो रहा है, वहां यह चुनौती बढ़ जाती है क्योंकि कहने को बहुत कुछ होता है. लेकिन जब आप संदर्भ नहीं दे पाते तो उस जगह को लेकर दृष्टिकोण भी नहीं मिलता. फिर एक इलाके और लोगों को लेकर पूर्वाग्रह पैदा होने लगते हैं, चाहे वह इस्राएल हो या श्रीलंका या अफगानिस्तान या पंजाब और मणिपुर. हमारे कुछ तय पूर्वाग्रह हैं और हम यहां के लोगों को एक तरह से देखते हैं.
मैं आम लोगों की कहानियां लेकर इन पूर्वाग्रहों को खत्म करना चाहता था. इन कहानियों से पता चलता है कि जिंदगी हर जगह एक जैसी है.

आपकी किताब में से एक कहानी सुनाइए.


मणिपुर में भारतीय सुरक्षा बलों से लोग एक तरह से नफरत करते हैं क्योंकि विद्रोहियों और भारत सरकार के बीच जंग चल रही है जिसमें आम लोग फंस जाते हैं. लेकिन एक गांव ने एक सैनिक को अपने यहां आमंत्रित किया. मैं इस सैनिक के साथ गांव गया. यह सैनिक दक्षिण भारत का है. 16 साल पहले मणिपुर में उसकी पोस्टिंग हुई. उस वक्त वह भारतीय सेना में कप्तान था और उसने इस गांव को बचाने में मदद की थी.

कैसे मदद की?
उस समय गांव में चार विद्रोही छिपे हुए थे और कप्तान अपनी टीम के साथ वहां पहुंचा. गोलीबारी हुई. एक विद्रोही मारा गया, दो पकड़े गए और एक भाग निकला. कप्तान को गोली लगी और वह मौत की कगार पर था. आम तौर पर अगर एक सैनिक को गोली लगती है तो सेना पूरे गांव को खत्म कर दती है, लेकिन कप्तान ने गांववालों पर गोली चलाने के आदेश नहीं दिए और कहा कि उनकी आखिरी तमन्ना है कि गांववालों को कुछ न हो. दो बच्चों को भी गोली लगी थी. घायल कप्तान के लिए जब हेलिकॉप्टर भेजा गया तो कप्तान इन बच्चों को भी अपने साथ इलाज कराने ले गए.
इस तरह की कहानी में संघर्ष पीछे हट जाता है, यह एक आदमी और एक गांव की कहानी है. इस कहानी का चरम तब आया जब कप्तान 16 साल बाद गांव वापस गए और उस आदमी से मिले जिसने उनपर गोली चलाई. वह आदमी हैरान था कि कप्तान बच गया, क्योंकि उसने सीधे कप्तान के दिल पर निशाना साधा था.

इस किताब और इस तरह की कहानियां लिखने का आपका मकसद क्या है?
पूर्वोत्तर भारत के राज्य के बारे में बाकी देश सोचता है कि या तो यह बंदूक चलाते हैं या गिटार बजाते हैं. इन कहानियों का उद्देश्य है कि यह पूर्वोत्तर के लोगों का दोबारा चित्रण करें. पूर्वोत्तर भारत को एक मानकर चलना भी गलत है. मेघालय और मणिपुर में कोई भी चीज एक जैसी नहीं है. मैंने मणिपुर पर किताब लिखी क्योंकि मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि संघर्ष और चुनौतियों के बावजूद यह राज्य आगे बढ़ रहा है.
इंटरव्यूः मानसी गोपालकृष्णन
संपादनः आभा मोंढे

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