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ब्लॉग

संकीर्ण स्वार्थों की शिकार संसदीय परंपरा

संसद में जिस तरह से पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण के लिए विधेयक को पारित कराया गया है, उससे भारत में संसदीय व्यवस्था और संघीय प्रणाली के भविष्य के बारे में चिंता होना स्वाभाविक है.

भारत की संघीय प्रणाली अमेरिका से भिन्न है. भारत विभिन्न राज्यों से मिलकर बना संघ नहीं है बल्कि एक केंद्रीकृत इकाई है और राज्यों को उससे अलग होने का अधिकार नहीं है. लेकिन व्यवहार में वह संघीय प्रणाली को अपनाए हुए है क्योंकि संविधान में केंद्र और राज्यों के अधिकारों का स्पष्ट रूप से उल्लेख है और उन्हें एक-दूसरे से पृथक रखा गया है. विविध धर्मों, संस्कृतियों और प्रजातियों का देश होने के कारण यूं भी भारत के लिए संघीय प्रणाली को अपनाना जरूरी है ताकि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच टकराव को टाला जा सके.

यह अलग बात है कि अनेक अवसरों पर केंद्र या राज्य सरकारें संघीय भावना के अनुरूप काम नहीं कर रहे पाए गए हैं. संघीय प्रणाली के उल्लंघन की शिकायतें भी होती हैं, लेकिन अक्सर उन्हें आपसी विचार-विमर्श के जरिये दूर कर लिया जाता है. लेकिन यदि किसी राज्य के लोगों को यह लगने लगे कि उनके राज्य पर केंद्र सरकार अपना निर्णय थोप रही है, और वह भी संसदीय परम्पराओं को ताक पर रखकर, तो देश के ढांचे पर और संघीय प्रणाली के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है.

निराशाजनक आचरण

नए राज्यों के निर्माण के पीछे अक्सर शक्तिशाली जनांदोलन होते हैं जिनके दबाव के कारण अंततः केंद्र सरकार को उनकी मांग मान लेनी पड़ती है. हर स्थिति में यह देखा गया है कि जिस राज्य से अलग करके नया राज्य बनाया जा रहा है, उसके लोग इस विभाजन के खिलाफ होते हैं और नए राज्य के निवासी उसका बहुत जोशोखरोश के साथ स्वागत करते हैं. तेलंगाना राज्य की मांग भी बहुत पुरानी है, और तेलंगाना अंचल के निवासी उसके बनने से बहुत खुश हैं, लेकिन शेष आंध्र प्रदेश, जिसे अब सीमान्ध्र कहा जाएगा, के लोग इससे बेहद नाखुश और नाराज हैं. लोकसभा और राज्यसभा, दोनों में इन दोनों क्षेत्रों के सांसदों ने जैसे अमर्यादित आचरण का प्रदर्शन किया, उसके कारण संसद की गरिमा कलंकित ही हुई. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने भी जिस तरह का आचरण किया है, उससे आश्वस्ति के बजाय निराशा ही होती है.

पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण संबंधी विधेयक पर न कोई चर्चा हुई, न ही ठीक से मतदान ही कराया गया. उसे शोरशराबे के बीच लोकसभा में पेश कर दिया गया और बिना किसी चर्चा के उस पर मतदान कराने का नाटक किया गया. इतना महत्वपूर्ण विधेयक संसद में पारित हो जाये और उस पर न चर्चा हो और न पारदर्शी ढंग से मतदान, लोकतंत्र का इससे बड़ा और क्या मजाक बनाया जा सकता है? यहां यह याद रखना होगा कि तेलंगाना के निर्माण के प्रस्ताव को आंध्र प्रदेश की विधानसभा ठुकरा चुकी है. इस संदर्भ में यह भी याद किया जाना चाहिए कि जब उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ का निर्माण हुआ था, तो उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश की विधानसभाओं ने इनके निर्माण संबंधी प्रस्तावों को स्वीकार किया था.

नहीं हुई ईमानदार कोशिशें

हालांकि केंद्र के लिए यह संवैधानिक विवशता नहीं है कि किसी राज्य की विधानसभा द्वारा स्वीकार किए जाने के बाद ही वह नए राज्य के निर्माण की दिशा में कदम उठाए, लेकिन यदि संघीय भावना का सम्मान करना है और संघीय प्रणाली को मजबूत बनाना है, तो इस स्वीकृति को प्राप्त करने के लिए हर संभव कोशिश की जानी चाहिए. यदि हर तरह की कोशिश विफल हो जाये, तभी केंद्र सरकार को पृथक राज्य के निर्माण के लिए इकतरफा कदम उठाना चाहिए. लेकिन पिछले कई दशकों का, विशेषकर पिछले कुछ सालों का, इतिहास साक्षी है कि इसके लिए ईमानदार कोशिशें नहीं की गईं. कांग्रेस पार्टी की कोशिश लोकसभा चुनाव के ऐन पहले तेलंगाना राज्य के निर्माण का श्रेय लेकर वहां की 17 सीटों में सेंध लगाने की है तो शेष पार्टियां भी अपनी-अपनी रणनीति के मुताबिक अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगी हैं. इस सबके बीच लोकतंत्र, संघीय प्रणाली और केंद्र-राज्य संबंध तथा देश की भावनात्मक एकता जैसे मुद्दे पृष्ठभूमि में धकेल दिये गए हैं.

कांग्रेस पार्टी तो आंध्र प्रदेश में अपने मुख्यमंत्री एन. किरण कुमार रेड्डी तक को तेलंगाना बनाने का औचित्य नहीं समझा पाई और उन्हें लोकसभा में विधेयक पारित होने के बाद अपनी सरकार का इस्तीफा राज्यपाल को सौंपना पड़ा. अभी तक यह भी तय नहीं है कि अगले पांच वर्षों तक हैदराबाद को सीमान्ध्र और तेलंगाना दोनों राज्यों की संयुक्त राजधानी बनाने के लिए केवल साधारण बहुमत से संसद में विधेयक पारित कराना पर्याप्त होगा या इसके लिए संविधान में संशोधन की जरूरत पड़ेगी. क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो संशोधन संबंधी विधेयक को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी.

इस समय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों में होड़ लगी है क्योंकि दोनों ही चाहती हैं कि तेलंगाना राज्य के निर्माण का सेहरा भी उनके सिर पर बंधे और वे सीमान्ध्र के खैरख्वाह भी बने रहें. जहां कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी सीमान्ध्र को विशेष दर्जा दिये जाने का सुझाव दे रही हैं, वहीं भाजपा लोकसभा में विधेयक को बिना किसी परिवर्तन के पारित कराकर राज्यसभा में उसमें बड़ी संख्या में संशोधन किए जाने की मांग की और उसने तीस से भी अधिक संशोधन पेश कर दिये. यानि पृथक राज्य के निर्माण की प्रक्रिया संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों का शिकार होकर रह गई है. यह भारतीय लोकतंत्र और संघीय प्रणाली के लिए शुभ संकेत नहीं है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

संपादक: महेश झा

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