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दुनिया

संकट के बाद गरीबी से जूझता यूरोप

करीब 12 करोड़ से ज्यादा यूरोपीय लोग गरीबी की चपेट में आने का खतरा झेल रहे हैं, इनमें एक तिहाई तो ऐसे हैं जिन्हें पर्याप्त खाना भी नहीं मिल रहा. रेड क्रॉस की एक रिपोर्ट ने वित्तीय संकट के बुरे नतीजों का खाका खींचा है.

इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस (आईफसीआर) के तैयार किए 68 पन्नों की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दूसरे महाद्वीप गरीबी घटाने में सफल हो रहे हैं लेकिन यूरोप में गरीबी बढ़ती दिख रही है. आईएफसीआर के महासचिव बेकेला गेलेटा ने कहा है, "यूरोप पिछले छह दशकों के सबसे बड़े मानवीय संकट से गुजर रहा है." यूरोप में वित्तीय संकट के पांच साल बाद भी करोड़ों लोग गरीबी के दलदल में फंस रहे हैं, वह बस किसी तरह अपना पेट पाल रहे हैं और उनके पास कोई बचत नहीं है, जिसे किसी गैरयोजना मद में खर्च कर सकें. रिसर्च में यूरोपीय संघ के सांख्यिकी संस्थान यूरोस्टैट के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है.

गरीबों की नई श्रेणी

रेड क्रॉस की यूरोपीय शाखा की प्रमुख अनिता अंडरलिन ने डीडब्ल्यू से कहा, "हम गरीबों को और गरीब होते देख रहे हैं." वह इन लोगों के समाज में शामिल होकर दोबारा सक्रिय नागरिक बनने में काफी मुश्किलें देख रही हैं. वह गरीबों का एक नया समूह बनते देख रही हैं, जिन्हें अपने जीवन में पहले कभी सामाजिक सुविधाओं के लिए आवेदन नहीं करना पड़ा. नए गरीब मध्य वर्ग से आ रहे हैं, जो वास्तव में नीचे गए हैं. अंडरलिन ने बताया, "उदाहरण के लिए सर्बिया मध्य आय वर्ग से बना, लेकिन आज यह वर्ग घटता जा रहा है." यही हाल सर्वे में शामिल सभी देशों का है जहां 2012 में 35 लाख यूरोपीय लोग रेडक्रॉस के पास खाना मांगने आए. 2009 की तुलना में यह करीब 75 फीसदी ज्यादा है.

अंधकार में डूबा भविष्य

स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र की बात करते हुए अंडरलिन ने कहा, "हम लंबे समय के परिणामों को लेकर चिंतित हैं. संकट के समय हमें शारीरिक और मानसिक तरीकों से मेडिकल सहायता की जरूरत बढ़ जाती है, लेकिन खर्च घटाने की नीतियों के तहत इन क्षेत्रों के बजट में भारी कटौती हुई है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिसर्च बताती है कि संकट बढ़ने के साथ आत्महत्या की दर भी बहुत तेजी से बढ़ी है." ग्रीस में ही संकट बढ़ने के बाद महिलाओं की खुदकुशी की दर करीब दुगुनी हो गई है.

यूरोप में एक और बड़ी समस्या भारी बेरोजगारी की है. खासतौर से युवा पीढ़ी इससे बहुत बुरी तरह प्रभावित हुई है और इसका नतीजा अवैध अप्रवासन, विदेशियों को लेकर मन में भय, सामाजिक उथल पुथल का बढ़ता जोखिम और राजनीतिक अस्थिरता के रूप में सामने आया है." ब्रसेल्स के थिंक टैंक ब्रोएगेल के निदेशक गुंतराम वोल्फ ने बढ़ती बेरोजगारी से लड़ने के लिए दो चरणों वाली योजना का सुझाव दिया है. उनका कहना है, "सबसे पहले हमें सारे छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों को कर्ज लेने, बढ़ने और लोगों को रोजगार देने की मंजूरी देनी होगी." इसके बाद दूसरे चरण में उन्होंने युवा बेरोजगारी फंड की बात की है जो युवाओं की शिक्षा और एक से दूसरी जगह जाने में मदद करे और बढ़ावा दे.

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हर ओर समस्या

रिपोर्ट में जिस मानवीय असर की बात की गई है, वह केवल संकट से जुड़े देशों में ही नहीं बल्कि यूरोपीय संघ के पावरहाउस कहे जाने वाले फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में भी है. फ्रेंच रेडक्रॉस के मुताबिक सहायता लेने वाले एक तिहाई लोग ऐसे हैं, जिन्हें अगर मुफ्त में भोजन की सहायता नहीं मिले तो वो अपने घर का किराया भी नहीं दे सकेंगे.

हालांकि जर्मनी में बेरोजगारी की दर दूसरे देशों जितनी ऊंची नहीं लेकिन नौकरी करने वाले बहुत से लोगों की भी स्थिति अच्छी नहीं. काम कर रहे एक चौथाई लोग ऐसे हैं जिन्हें कम आमदनी वालों में गिना जाता है. 2008 से ही आधी से ज्यादा नौकरियों के करार ऐसे हैं जिनमें कम पैसा है, कम सुरक्षा है और आम तौर पर सामाजिक सुविधाएं नहीं दी जातीं, इसका नतीजा हुआ है कि जर्मनी में 6 लाख से ज्यादा लोग ऐसे हैं जो नौकरी करने के बावजूद जीने लायक पर्याप्त पैसा नहीं जुटा पा रहे.

रिपोर्ट में जिन समस्याओं का जिक्र है उनसे यूरोपीय संघ और उसकी खर्च में कटौती की नीति पर सवाल उठ रहे हैं. अंडरलिन का कहना है, "हम सभी पक्षों को नए, अलग और रचनात्मक तरीके से संकट से निपटने के लिए बढ़ावा दे रहे हैं. हमें सच्चाई का सामना करना होगा और कार्रवाई करनी होगी जिससे कि कोई मानवीय संकट यूरोप के लिए सामाजिक और नैतिक संकट में न बदल जाए."

रिपोर्टः कैरोलिना माखहाउस/एनआर

संपादनः आभा मोंढे

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