श्रीलंका में सामूहिक कब्र से फिर उठे सवाल | दुनिया | DW | 19.12.2012
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दुनिया

श्रीलंका में सामूहिक कब्र से फिर उठे सवाल

श्रीलंका में एक सामूहिक कब्र मिली है जिसने देश में चले खूनी गृहयुद्ध के दौरान मानवाधिकारों के उल्लंघन की याद ताजा कर दी है. कब्र में 59 लोगों के अवशेष हैं. श्रीलंका में इस मामले की आधिकारिक जांच के लिए मांग तेज हो गई है.

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फाइल

राजधानी कोलंबो से करीब 142 किलोमीटर दूर मताले शहर में एक अस्पताल के पास बन रही इमारत की जमीन से यह लाशें मिली है. खुदाई करने वालों को मिली हड्डियों और उनके टुकड़ों के आधार पर कब्र में कम से कम 59 लोगों के दफन होने की बात सामने आई है. यह मुमकिन है कि ये लोग कई सालों पहले हुई किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से मारे गए हों. हालांकि इसी देश में 1970 के दशक में दो हिंसक आंदोलन भी शुरू हुए और बहुत से लोगों का मानना है कि ये उन्हीं आंदोलनों से जुड़े कुछ गुमनाम लोग हैं जिसमें करीब डेढ़ लाख लोग मारे गए थे.

मौके पर मौजूद न्यायिक मेडिकल अफसर अजय जयसेना कहा कि वह सारे बिंदुओं को ध्यान में रख रहे हैं. जयसेना ने कहा, "हम ठीक ठीक नहीं बता सकते कि किन लोगों को दफनाया गया है. ये लापता लोग भी हो सकते हैं. यह अच्छा होगा कि हम इसकी पूरी जांच करें." राजनेता और अधिकारी जांच की मांग कर रहे हैं. उधर सरकार पहले से ही संयुक्त राष्ट्र के दबाव में है जो तीन दशक तक चले गृहयुद्द के आखिरी महीनों में हजारों आम लोगों की हत्या पर सवाल उठा रहा है और मानवाधिकारों पर जवाब मांग रहा है.

मानवाधिकार संगठन सरकार पर युद्ध अपराधों की सही तरीके से जांच न कराने के आरोप लगाकर उसकी निंदा करने में जुटे हैं लेकिन श्रीलंकाई सरकार आरोपों को खारिज करती है. इनके साथ ही बहुत पुरानी घटनाओं को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. 1971 में मार्क्सवादी विद्रोहियों के संगठन जनता विमुक्ति पेरेमुना(जेवीपी) ने हिंसक आदंलोन शुरू किया. इस विद्रोही संगठन ने श्रीलंका के कुछ हिस्सों पर कब्जा भी कर लिया था लेकिन फिर इस विद्रोह को कुचल दिया गया.

1980 के दशक में इस गुट ने फिर सिर उठाया और आंदोलन का दूसरा दौर शुरु हुआ. सुरक्षा बलों ने इनका बड़ी बेरहमी से दमन किया. इस दौरान कई विद्रोही और संदिग्ध लोग या तो मार दिए गए या फिर लापता हो गए. इसी तरह तमिल अलगाववादियों के आंदोलन ने 1983 में जोर पकड़ना शुरू किया जो ज्यादातर उत्तर और पूर्व के तमिल बहुल इलाकों फैला. इस आंदोलन को भी सरकार ने कुचल दिया और इस दौरान बड़ी संख्या में लोग मारे गए और मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगे. संयुक्त राष्ट्र ने इसी साल मार्च में लापता लोगों के बारे में एक रिपोर्ट के हवाले से कहा कि श्रीलंका में 5,600 लोगों के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

वक्त में दफन

करीब 125 वर्ग मीटर के इस जमीन के टुकड़े पर बायो गैस का एक संयंत्र लगना है. इसे पीली पट्टियों से घेर दिया गया है और पुलिस चौबीसों घंटे इसकी पहरेदारी कर रही है. यह एक पहाड़ी खेतों का इलाका है. इलाके के लोगों को भी यह अंदाजा नहीं है कि इस मिट्टी के नीचे कौन दबा हो सका है. कब्र के पास खड़े एक शख्स ने कहा, "हम मानते हैं कि यह 1889 के दशक में हुए विद्रोह के दौर का है. यहां से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर सेना का एक दस्ता रहता था." इस शख्स ने अपना नाम बताने से इनकार कर दिया.

हालांकि कुछ दूसरे लोगों का यह भी कहना है कि यह लोग 1940 के दशक में हुए भारी भूस्खलन या फिर उसी के आस पास फैले चेचक की महामारी के शिकार हुए लोग भी हो सकते हैं. पुलस प्रवक्ता प्रियशांता जयाकोडी ने कहा कि फिलहाल कुछ कहना जल्दबाजी होगी. हड्डियों की फिलहाल जांच नहीं की गई है और उन्हें सफेद प्लास्टिक की शीट से ढंक कर रखा गया है. कुछ लाशों को अलग अलग दफनाया गया था जबकि कुछ को एक साथ. मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने मामले की पूरी जांच कराने की मांग की है. इस बीच क्रांतिकारी संगठन से खुद को राजनीतिक दल में बदल चुके जेवीपी ने भी जांच की मांग की है.

एनआर/ओएसजे (रॉयटर्स)

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