शेयर बाजार के घड़ियाली आंसू | दुनिया | DW | 25.08.2015
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

शेयर बाजार के घड़ियाली आंसू

चीन की अर्थव्यस्था को लगे झटकों पर दुनिया भर के शेयर बाजार घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं. ऐसा जताया जा रहा है जैसे शेयर बाजार ही अर्थव्यवस्था को चला रहे हों. लेकिन असली संकट कहीं और ही छुपा है.

2008 के बाद पहली बार शेयर बाजारों से ऐसा गोता खाया है. अमेरिका के बाद चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. बीजिंग को दुनिया के आर्थिक विकास का इंजन भी कहा जाता है. यही वजह है कि चीन का संकट वैश्विक असर दिखा रहा है. बीते चार दशकों के तेज आर्थिक विकास के दौरान चीन में लाखों लोग गरीबी से बाहर निकले. लाखों रोजगार पैदा हुए और आय बढ़ने के साथ साथ जीवन स्तर बेहतर हुआ.

लेकिन अर्थशास्त्र का नियम है कि धीरे धीरे समृद्ध होते देशों में श्रम लागत बढ़ती है और उससे निपटना आसान नहीं होता है. बीजिंग में फिलहाल ऐसा ही हो रहा है. 1995 के मुकाबले चीन में अब मजदूरी ज्यादा है. इसका असर लागत पर पड़ रहा है. दुनिया भर के बाजारों को सस्ता सामान मुहैया कराने वाला चीन श्रम लागत बढ़ने से ऐसा कर पाने की स्थिति में नहीं है. लिहाजा चीन में बनी चीजें महंगी हुई हैं और वैश्विक बाजार में उनकी मांग गिरने लगी है. इसकी सीधी मार चीनी अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ी.

चीन के औद्योगिक प्रांतों में बीते दो सालों में 1,500 से ज्यादा हड़तालें हुई हैं. कई मामलों में फैक्ट्रियां कामगारों को वेतन नहीं दे सकीं. मांग और उत्पादन में आई गिरावट के चलते बीते महीने चीन को अपनी मुद्रा दर गिरानी पड़ी. जानबूझकर गिराई गई मुद्रा दर को बाजार ने और नीचे गिराया. मुनाफे की चाह में चीन पहुंचे निवेशक इससे चिंतित हुए और अपनी हिस्सेदारी बेचने लगे. नतीजा यह हुआ कि चीनी शेयर बाजार ने ऐतिहासिक गिरावट देखी और उसकी देखा देखी दुनिया के बाकी शेयर बाजार भी लुढ़कने लगे.

घड़ियाली आंसू

सोमवार को हफ्ते के पहले कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार ने सात साल बाद सबसे बड़ी गिरावट देखी. कहा जा रहा है कि इस गिरावट के चलते सात लाख करोड़ रुपये बर्बाद हो गए, 10 रुपये का एक शेयर अगर महीने भर बाद 50 रुपये का हो जाए और उसे बेच दिया जाए तो कहा जाएगा कि बिकवाली के दबाव में बाजार टूट गया. अगर उसे न बेचा जाए और दो महीने बाद शेयर पांच रुपये पर आ जाए तो कहा जाएगा कि फलां कारण के चलते शेयर गिर गया. शेयर बाजार की वाहवाही करने वाले इसे 40 रुपये का नुकसान कहेंगे. लेकिन नकदी के तौर पर देखा जाए तो यह शुद्ध पांच रुपये का नुकसान है.

किसी दौर में शेयर बाजार का इस्तेमाल कंपनियां पूंजी जुटाने के लिए करती थीं. कुछ लोगों के पास नायाब आइडिया होते थे लेकिन जमा पूंजी नहीं होती थी, लिहाजा वो शेयर या हिस्सेदारी का सहारा लेते थे. आम लोग कंपनी में शेयर के जरिए निवेश करते और अच्छे प्रदर्शन पर उन्हें लाभांश मिलता था. लेकिन आज दुनिया भर के शेयर बाजार मुनाफा निवेश और कंपनी के प्रदर्शन से ज्यादा मुनाफा कमाओ के सिद्धांत पर चल रहे हैं, जो हमेशा टिकाऊ नहीं रह सकता.

घबराने की जरूरत नहीं

शेयर बाजार किसी भी देश का आर्थिक विकास तय नहीं करते हैं. इसके उलट आर्थिक विकास बेहतर हो तो शेयर बाजार पर उसका असर दिखता है. शेयर बाजार को आर्थिक विकास की जन्म कुंडली मानने वाले कई विश्लेषक फिलहाल 2008 की आर्थिक मंदी जैसे हालात पैदा होने की आशंका जता रहे हैं. लेकिन 2008 की मंदी बैंकिंग सेक्टर से आई थी, शेयर बाजार से नहीं.

चिंता फिलहाल चीन के मैन्युफैक्चरिंग उद्योग को लेकर है. अगर वह मंदी से बाहर नहीं निकला तो असली मुश्किल सामने आएगी. फैक्ट्रियां बंद होंगी और नियम के तहत चीन की प्रांतीय सरकारों को कामगारों की बकाया राशि का भुगतान करना होगा. दूसरी तरफ चीन जिन देशों के कच्चा माल खरीदता है वहां भी मंदी आएगी और नौकरियां तबाह होगी. चीन को हाई टेक मशीनें देने वाले देशों के निर्यात में भी गिरावट आएगी और बीजिंग की मुश्किल वैश्विक संकट बन जाएगी. फिलहाल बीजिंग की सरकार इसे रोकने के लिए हर संभव कदम उठा रही है.

DW.COM

संबंधित सामग्री