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ब्लॉग

शीत युद्ध में धकेले जाने से बचे पश्चिम

ब्रिस्बेन में हुई जी20 शिखर वार्ता ना तो यूक्रेन संकट का हल नहीं निकाल सकती थी और ना ही रूस से संबंध बेहतर करवा सकती थी. डॉयचे वेले के इंगो मनटॉयफल का कहना कि पश्चिमी देशों को नई रणनीति की जरूरत है.

शिखर सम्मलेन का मकसद तो था वैश्विक आर्थिक सवालों के जवाब ढूंढना लेकिन ब्रिस्बेन में यूक्रेन का संकट ही हावी रहा. जर्मनी की चांसलर अंगेला मैर्केल ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ यूरोप में चल रहे संकट पर जो अनिर्णायक भेंट कीं, उन्हें शीत युद्ध की शुरुआत के संकेत के रूप में लिया जा रहा है.

इस पर कोई शक नहीं कि रूस और पश्चिम के बीच तनाव की वजह यूक्रेन का राजनीतिक भविष्य और रूस द्वारा क्रीमिया पर कब्जा जमाया जाना है. पूर्वी यूक्रेन में क्रीमिया की डगमगाती हुई राजनीति से काफी बुरा असर पड़ा है. पर फिर भी पश्चिम को अफरा तफरी में प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए और उसे खुद को शीत युद्ध में धकेल दिए जाने से भी बचना चाहिए.

समझदारी से पेश आने की जरूरत है, संभावनाओं और खतरों को जानने और नई नीतियों की जरूरत है. अंगेला मैर्केल जो कर रही हैं, वह बिलकुल सही है. उन्होंने क्रेमलिन से बातचीत के रास्ते खुले रखे हैं, खास कर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से, भले ही इस समय उनकी चर्चाओं का कोई नतीजा ना निकल रहा हो.

नया नजरिया चाहिए

रूस की नीतियों ने अविश्वास और विस्मय को जन्म दिया है. इसके बावजूद पश्चिम के लिए पुतिन के साथ चर्चा में बने रहना एक अहम लक्ष्य होना चाहिए. अगर थोड़ा सा भी विश्वास बन पाया, तभी नए टिकाऊ समझौते मुमकिन हो पाएंगे. केवल मिंस्क समझौते की नजाकत और डोनेस्क में चल रही हिंसा ही इस जरूरत को उजागर नहीं करते. वैश्विक शांति के लिए बड़ा खतरा तब बनेगा जब रूस अपनी सेना का इस्तेमाल बढ़ा देगा. अगर उत्तरी अटलांटिक में उसने अपने लड़ाके खड़े कर दिए या फिर ऑस्ट्रेलिया के पास युद्धपोत सक्रिय कर दिए तो अनियंत्रित विवाद खड़े हो जाएंगे.

इसके अलावा पश्चिमी देशों और यूक्रेन की सरकार को इस कड़वे सच को स्वीकारना ही होगा कि रूस की मदद के बिना यूक्रेन के आर्थिक और सामाजिक हालात बदलना नामुमकिन है. क्रेमलिन के पास गैस की सप्लाई, गैस ट्रांसफर फीस, यूक्रेनी औद्योगिक उत्पादों का बाजार होने का फायदा है. इस पर अब किसी को शक नहीं रहना चाहिए कि क्रेमलिन अपने मुनाफे के लिए इस सबका फायदा उठाएगा.

इसलिए जरूरत अब इस बात की है कि कीव और पश्चिम के नेता एक कंन्सेप्ट पर राजी हो जाएं और क्रेमलिन के आगे एक ऐसा प्रस्ताव रखें जिससे रूस के राजनीतिक लक्ष्य भी पूरे होते हैं. जाहिर है कि नव साम्राज्यवादी विचारधारा को स्वीकारा नहीं जा सकता. और यूरोप जैसी संवैधानिक सरकार बनाने और बाजार में आर्थिक विकास लाने में यूक्रेन पर बाहर से किसी तरह का दबाव नहीं होना चाहिए.

एक मध्यमार्ग यह हो सकता है कि यूक्रेन रक्षा से जुड़ी राजनीति पर निष्पक्ष रहे, वह फिलहाल नाटो की सदस्यता ना मांगे, यूरोपीय संघ के साथ मिल कर रूस के लिए किसी भी तरह आर्थिक रुकावटें ना खड़ी करे और विवादित इलाकों को स्वयत्ता देने पर राजी हो जाए. यूक्रेन के राष्ट्रपति पेट्रो पोरोशेंको पहले ही स्वयत्ता का वायदा कर चुके हैं और ब्रसेल्स ने प्रतिबंधों के लागू होने की तारीख को 1 जनवरी 2016 तक बढ़ा कर यह साबित किया है कि यूक्रेन और यूरोपीय संघ के रिश्तों के चलते रूस के लिए आर्थिक परेशानियां नहीं खड़ी होंगी.

एक सक्षम राजनीतिक समाधान निकालना तो अभी मुमकिन नहीं लगता. क्रेमलिन को भी कदम पीछे ले लेने के लिए मनाना बहुत मुश्किल होगा. लेकिन बार बार किसी ना किसी तरह रोक लगा देने की बजाए, पश्चिमी सरकारों को ऐसे प्रतिबंधों के बारे में सोचना चाहिए जिनके जरिए वे इस तरह के राजनीतिक समाधानों तक पहुंच पाएंगे. इसके बाद प्रतिबंधों को बेहतर करने या हटाने के बारे में सोचा जा सकता है.

यकीनन रोष और अविश्वास का माहौल तो है और यह बात भी साफ है कि रूस और पश्चिम के रिश्तों को बहुत जल्दी वैसा नहीं बनाया जा सकता जैसे कि वे संकट के दिनों से पहले थे. यूक्रेन के लिए पश्चिम का बड़ा मार्शल प्लान समस्या का हल नहीं है. अमेरिका और यूरोपीय संघ को बलिदान देना ही होगा, क्योंकि रूस के साथ समझौता किए बिना, सब कोशिशें नाकाम ही रहेंगी. राष्ट्रपति पुतिन भी ये सब बखूबी जानते हैं, यही वजह है कि ब्रिस्बेन में वे इतने अड़ियल अंदाज में नजर आए.

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