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ब्लॉग

शिक्षा सुधार की भारत की नई कोशिश

देश में नई शिक्षा नीति लागू होने के करीब तीन दशक बाद और सर्व-शिक्षा अभियान के करीब डेढ़ दशक बाद भारत सरकार को शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की फिर याद आई है. इसके लिए स्कूल लीडरशिप प्रोग्राम के नाम से नई महायोजना बनी है.

इस प्रोग्राम को राष्ट्रीय शैक्षिक योजना और प्रशासन विश्वविद्यालय (एनयूईपीए) के तहत चलाया जा रहा है. योजना का मंत्र है, "नेतृत्व सीखना और सीखने की ओर बढ़ना" (लर्निग टू लीड एंड लीडिंग टू लर्न). ये योजना ऊपर से इलाज शुरू करती है. पहले हेडमास्टर और प्रिंसिपल की गुणवत्ता को सुधारा जाएगा. उन्हें प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि वे स्कूल और पढ़ाई ठीक से चलाने लायक बनें. उन्हें अधिकार संपन्न बनाया जाएगा. अपने स्कूल को सुधारने का काम उनका होगा. वित्तीय या दूसरे प्रबंधकीय मामलों के लिए उन्हें विभाग के चक्कर नहीं काटने होंगे. स्कूल प्रशासन के इन टॉप मैनेजरों की ट्रेनिंग के लिए एक स्थायी ग्रुप बनेगा. उसमें ट्रेनर होंगे, जानकार होंगे, शोधकर्ता होंगे. जो स्कूलों की गुणवत्ता को देखेंगे, समझेंगे, सुझाव देंगे. शोध, फाइलों और दस्तावेजों का एक नया चक्र शुरु होगा, उलझन का, दबाव का और ब्यूरोक्रेसी का एक नया गलियारा नहीं खुलेगा, कौन जानता है?

पायलट प्रोजेक्ट राजस्थान और तमिलनाडु में शुरू हुए हैं. उनके नतीजों का इंतजार करना चाहिए. योजना तीन साल में पूरी करने का लक्ष्य है. देश के 12 लाख सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों को कवर किया जाएगा. मानव संसाधन विकास मंत्रालय का दावा है कि 12वीं योजना के अंत तक 38 हजार प्रिंसिपल और हेडमास्टरों को इसका लाभ मिलेगा.

एक के बाद एक प्रोग्राम सरकार की योजना और इरादों के बक्से से निकल रहे हैं जो दिखने में तो बहुत आकर्षक और असाधारण नजर आते हैं लेकिन योजनाओं का इतिहास बताता है कि वे कहां से चलती हैं और कहां जा पहुंचती हैं. आज हमारे स्कूल भयावह जर्जरता के शिकार हैं. इमारतें ही नहीं, शिक्षा और पूरा स्कूल सिस्टम जर्जर है. कई सरकारी प्राइमरी और इंटरमीडियट स्कूलों में कमरे हैं लेकिन कक्षाएं नहीं, उखड़ी हुई गीली दीवारें हैं, उन पर एक क्षतविक्षत ब्लैकबोर्ड चिपका हुआ है, उस पर पड़ी खरोंचे और कई निशान जैसे शैक्षिक बदहाली के ही निशान हैं.

कुर्सियां मेज दरवाजे खिड़कियां धूल खाईं और चरमराई हुई सी हैं. मानो ये हमारे बच्चों का भविष्य बनाने वाली जगहें न होकर कोई सजाघर हों. कई स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से टॉयलेट नहीं हैं, नल नहीं है. टंकियां हैं तो उनकी सफाई नहीं है. बिजली के बल्ब एक उदास उजाले में टिमटिमाते हैं जैसे उनका प्रकाश सोख लिया गया हो, पंखें जैसे अपनी निरीहताओं में झूल रहे हैं. इन अवसाद भरी जगहों को कुछ देर की रंगत बस मिलती है तो उन सैकड़ों किलकारियों, खिलखिलाहटों और उस भागमभाग से जिनमें स्कूली बच्चे सराबोर रहते हैं.

अपने गांव में एक बार प्राइमरी पाठशाला के करीब से गुजरना हुआ तो देखा कि एक मास्टरसाब स्वेटर बुन रहे थे. हां ठीक है, उन्हें भी वे काम करने चाहिए जिसकी अपेक्षा वे अपनी स्त्रियों से करते होंगे. लेकिन यहां स्कूल में, पढ़ाई के बीच. तो वो दृश्य अंकित हो गया जेहन में. ये मजाक लग सकता है लेकिन है ये विडम्बना. और अब इसी विडम्बना को दुरुस्त करने का ख्याल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली केंद्र सरकार को अपने आखिरी दिनों में आया है.

ऐसे प्रोग्राम बेशक होने चाहिए. आज से नहीं बहुत पहले से होने चाहिए थे. और वे थे भी. 1966 मे कोठारी कमीशन बना था. 1985 में चट्टोपाध्याय कमेटी बनी थी. प्रोफेसर यशपाल जैसे विद्वान "बोझ के बिना शिक्षा" का वृहद खाका 90 के दशक में बना चुके हैं. 1993 में यशपाल कमेटी आ चुकी है. जानेमाने शिक्षाविद् कृष्ण कुमार ने अपनी किताब "राज समाज और शिक्षा" में वे सारे मसले उठाएं हैं जो आज हम नेशनल सेंटर फॉर स्कूल लीडरशिप (एनसीएसएल) की सरकारी चिंता में देख रहे हैं. स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए टीचरों को उस लायक बनाने के लिए पहले से टीचर ट्रेनिग संस्थान (टीटीआई), टीचर एजुकेशन की नेशनल काउंसिल (एनसीटीई) और एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अध्ययन और प्रशिक्षण परिषद्) जैसे संस्थान हैं, और अब ये एनसीएसएल.

क्या ये शिक्षा को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के अर्ध-कॉरपोरेट तंत्र में पहुंचाने की कोशिश है? तो फिर प्रिंसिपलों-हेडमास्टरों की ट्रेनिंग के लिए अलग से ढांचा क्यों. प्रक्रियाओं और कार्यक्रमों की कमी नहीं रही है. उन पर अमल या तो बिल्कुल ही नहीं होता या आधा अधूरा होता है. लीडरशिप का प्रोग्राम भी जवाबदेही तय कर और कुछ प्राइवेट संस्थाओं को जोड़कर चैन की नींद न सोने चले जाए, शिक्षा में सुधार के पुराने अभियानों का हश्र देखकर ये डर तो लगता ही है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

संपादन: महेश झा

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