1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

शिक्षा तंत्र से मायूस भारतीय शिक्षक

भारतीय शिक्षा तंत्र की बदहाली छुपी नहीं है. एक सर्वे के मुताबिक 57 फीसदी छात्र पढ़े लिखे तो हैं लेकिन किसी रोजगार के लायक नहीं हैं. टीचर शिक्षा के ढांचे से निराश हैं.

शिक्षा हर देश के भविष्य की बुनियाद होती है. लेकिन क्या भारत की यह बुनियाद कमजोर पड़ रही है, शिक्षा पर काम करने वाली कंपनी एनुअल इनिशिएटिव ऑफ पर्सन के सर्वे में कुछ ऐसी ही बातें सामने आई हैं. पर्सन वॉयस ऑफ टीचर्स सर्वे के मुताबिक 75 फीसदी भारतीय शिक्षक मानते हैं कि शिक्षा को रोजगार और औद्योगिक क्षेत्र से जोड़ना चाहिए. इसके लिए शिक्षा के ढांचे में व्यापक बदलाव किए जाने चाहिए.

शिक्षा के ढांचे से मायूस शिक्षक

देश की राजधानी दिल्ली के ज्यादातर शिक्षकों को लगता है कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली छात्रों को सर्वांगीण शिक्षा नहीं दे रही है. सर्वे देश के 527 शहरों में किया गया. जुलाई और अगस्त में किए गए इस सर्वे में यह बात भी सामने आई कि भारत में शिक्षा के स्तर को जांचने के लिए भी कोई कारगर उपाय नहीं है. सर्वे में शामिल ज्यादातर लोगों ने सबसे ज्यादा निराशा उच्च या उच्चतर शिक्षा को लेकर जताई.

66 फीसदी टीचरों ने कहा कि स्कूलों में कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्टिविटी के साथ साथ स्मार्ट बोर्ड और आईसीटी की भी जरूरत है. भारत में अब भी ऐसे लाखों स्कूल हैं जहां कंप्यूटर तो दूर बिजली तक नहीं है. जिन स्कूलों में बिजली, कंप्यूटर और आधुनिक सुविधाएं हैं उनकी फीस बहुत ज्यादा है. बच्चे किसी भी स्कूल से पढ़कर आएं, आखिर में डिग्री कॉलेज तक पहुंचने के बाद फिर वही किताबी शिक्षा जारी रहती है. वक्त बदल रहा है, दुनिया बदल रही है, लेकिन भारतीय शिक्षा तंत्र में जड़ता दिखाई पड़ती है.

यही वजह है कि पढ़ाई लिखाई के बावजूद छात्र रोजगार के लायक नहीं बन पाते. सर्वे के मुताबिक कर्नाटक के 53 फीसदी शिक्षकों को लगता है कि छात्र नौकरी के लिए योग्य नहीं हैं. राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 57 फीसदी है. पर्सन इंडिया के महानिदेशक दीपक मल्होत्रा के मुताबिक, "शिक्षक दिवस के मौके पर शिक्षक समुदाय ने सामूहिक रूप से अपनी राय सामने रखी है और भारतीय छात्रों की रोजगारपरक क्षमता को देखते हुए नई शिक्षा नीति बनाने के लिए बेहद अहम सुझाव दिए हैं."

राजस्थान में बदलाव

शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए राजस्थान ने शिक्षा के अधिकार कानून में बदलाव करने का फैसला किया है. सरकार के मुताबिक अच्छा प्रदर्शन न करने वाले बच्चों को पास करना ठीक नहीं है. इस बदलाव के साथ ही राजस्थान भारत का पहला ऐसा राज्य बनेगा जो शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 में परिवर्तन करने जा रहा है. अधिनियम में बदलाव को राज्य कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है. संशोधन विधेयक मानसून सत्र में विधानसभा में पेश किया जाएगा. संशोधन विधेयक को बाद में राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा.

राष्ट्रपति की हरी झंडी मिलने के बाद राज्य के स्कूलों में आठवीं क्लास तक के बच्चों का टीचर मूल्यांकन कर सकेंगे. पढ़ाई में कमजोर बच्चों को कानूनी रूप से अगली क्लास में भेजने के बजाए उन्हें उसी कक्षा में रखा जाएगा. सरकार का तर्क है कि इससे शिक्षा का स्तर बेहतर होगा.

हालांकि शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 की रुपरेखा रखते समय कई शिक्षाविदों ने आठवीं तक बच्चों को फेल न करने का तर्क रखा था. कई शिक्षाविदों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि फेल होने से बच्चे में हीन भावना पैदा होती है. यही वजह है कि शिक्षा अधिकार अधिनियम में आठवीं क्लास तक बच्चों को अनिवार्य रूप से पास करने का नियम है.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेक इन इंडिया और कौशल विकास का नारा दिया हैं. लेकिन सरकारी स्कूलों की बदहाली और पूरे शिक्षा तंत्र की बदहाली बताती है कि सरकार को सबसे पहले ध्यान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर देना होगा.

ओएसजे/एमजे ( पीटीआई)

DW.COM

संबंधित सामग्री