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ब्लॉग

शिक्षा की प्राथमिकता तय करने की जरूरत

भारत में विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी रहती है, लेकिन आर्थिक प्रगति के मामले में वह बहुत पिछड़ा है. विकास की जरूरत पर तो जोर दिया जाता है लेकिन ढांचे की उपेक्षा की जाती है. इसमें शिक्षा की उपलब्धता और गुणवत्ता अहम हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को प्रगति के रास्ते पर ले जाना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने मेक इन इंडिया का नारा दिया है. देश में सरकार बदलने के एक साल बाद भी आर्थिक मोर्चे पर वह कामयाबी नहीं दिखती जिसकी सभी को उम्मीद थी. भारतीय उद्यमी विदेशी निवेश में इजाफे की उम्मीद कर रहे थे, तो बेरोजगारी का सामना कर रहा देश का युवा वर्ग नई नौकरियों और संभावनाओं की. निवेश के लिए मुनाफा कमाने की इच्छा के अलावा अनकूल कारोबारी माहौल भी जरूरी है. इसमें आसान नियम, बेहतर संरचना और कुशल कामगारों का उपलब्ध होना मायने रखता है. यूरोप में अक्सर भारतीय इंजीनियरों की क्वालिटी पर सवाल उठाए जाते हैं.

भारत सरकार को शिक्षा का स्तर बढ़ाने, कामगारों की कुशलता बढ़ाने और युवाओं का कौशल बढ़ाने के प्रयास करने होंगे. इसमें विदेशी भाषाओं का अच्छा ज्ञान भी जरूरी है. आर्थिक रूप से पिछड़ा भारत अपने अंग्रेजी ज्ञान पर नाज करता रहा है और उसके फायदे भी रहे हैं. लेकिन ऐसे विश्व में जहां आर्थिक केंद्र जर्मनी, फ्रांस, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया होते जा रहे हैं, वहां स्थानीय भाषाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. भाषा न सिर्फ संवाद का माध्यम होती है, वह एक दूसरे को समझने में भी मददगार होती है. जो निवेशक किसी देश की असली हालत नहीं समझ पाएगा वह वहां निवेश कैसे और क्यों करेगा.

केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन भाषा की पढ़ाई में जर्मनी के साथ सहयोग के मुद्दे पर शिक्षा मंत्रालय ने पारस्परिकता का मुद्दा उठाया था. आपसी बर्ताव में तो पारस्परिकता की बात की जा सकती है, लेकिन अर्थव्यवस्था की जरूरतों पर पारस्परिकता नहीं हो सकती. यह सच है कि भारत खुद कई भाषाओं और संस्कृतियों वाला एक उपमहाद्वीप है. देश के अंदर सांस्कृतिक आदान प्रदान और कारोबार के लिए भी भारतीय भाषाओं को सीखने की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता. लेकिन हर किसी को हर कुछ सीखने की आवश्यकता भी नहीं.

इसलिए स्कूली शिक्षा में व्यापक बहस के बाद प्राथमिकताएं तय किए जाने की जरूरत है. इसलिए भी कि स्कूलों को उच्च शिक्षा और कौशल अर्जन के लिए योग्य छात्रों को तैयार करना है. यह स्वागत योग्य कदम है कि शिक्षा मंत्रालय तीन भाषा वाले फॉर्मूले और विदेशी भाषा की जरूरत पर बहस के लिए तैयार है. समझा जा सकता है कि बिहार के एक गांव के मुकाबले मुंबई या बंगलोर जैसे कॉस्मोपोलिटन महानगर की भाषाई जरूरतें अलग होंगी. शिक्षा का ढांचा ऐसा होना चाहिए जो छात्रों के हितों, अर्थव्यवस्था और देश की जरूरतों के अनुरूप हो.

ब्लॉग: महेश झा

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