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ब्लॉग

शिक्षक दिवस या गुरु उत्सव?

जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, वे इस तरह का बरताव कर रहे हैं जैसे वे सीधे जनता द्वारा चुने हुए अमेरिकी शैली के राष्ट्रपति हों. शिक्षक दिवस को गुरु उत्सव में बदल कर उन्होंने एक और विवाद छेड़ दिया है.

जब से केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई है, तभी से वह अपने हिन्दुत्व के एजेंडे के कारण लगातार कोई न कोई विवाद खड़ा करती रही है. पहले उसने भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष पद पर वाई. सुदर्शन राव नामक एक ऐसे व्यक्ति को नियुक्त कर दिया जिनके इतिहासलेखन में योगदान के बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं है और जो सार्वजनिक रूप से विचार व्यक्त कर चुके हैं कि रामायण और महाभारत में वर्णित घटनाएं ठीक वैसे ही घटी थीं जैसा वर्णन किया गया है. फिर केंद्र सरकार ने संस्कृत दिवस मनाने की घोषणा कर डाली जिसका तमिलनाडु के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर भी भारी विरोध हुआ. अब नया शगूफा पांच सितंबर को हर वर्ष मनाए जाने वाले शिक्षक दिवस के बारे में छोड़ा गया है.

सभी जानते हैं कि पांच सितंबर को प्रति वर्ष शिक्षक दिवस इस लिए मनाया जाता है क्योंकि भारत के पहले उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन, जो बाद में देश के दूसरे राष्ट्रपति भी बने, एक शिक्षक थे और उन्होंने शिक्षकों को सम्मान देने के उद्देश्य से अपने जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का फैसला लिया था. इसी दिन केंद्र सरकार द्वारा देश भर के श्रेष्ठ शिक्षकों को पुरस्कार देकर सम्मानित भी किया जाता है. लेकिन इस बार इस दिवस को बिलकुल नए ढंग से मनाया जा रहा है. जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, वे इस तरह का बरताव कर रहे हैं जैसे वे संसदीय लोकतंत्र की केबिनेट प्रणाली के तहत निर्वाचित प्रधानमंत्री न होकर सीधे जनता द्वारा चुने हुए अमेरिकी शैली के राष्ट्रपति हों.

इसी क्रम में उन्होंने निर्णय लिया है कि वे शिक्षक दिवस पर तीसरे पहर तीन बजे से लेकर शाम पौने पांच बजे तक पूरे देश के स्कूली छात्र-छात्राओं को टीवी और वेबकास्टिंग के जरिये संबोधित करेंगे. केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इस संबंध में सभी सरकारी और गैर-सरकारी स्कूलों को सर्कुलर जारी करके निर्देश दिया है कि इसे सभी छात्र-छात्राओं को दिखाने की समुचित व्यवस्था की जाए. टीवी सेट और केबल कनेक्शन की ही नहीं, बिजली जाने की स्थिति में जेनरेटर और इनवर्टर का प्रबंध भी किया जाए. अगले ही दिन सरकार को रिपोर्ट भेजी जाए कि कितने छात्र-छात्राओं ने प्रधानमंत्री के भाषण को सुना.

Sarvepalli Radhakrishnan

सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपने जन्मदिन को गुरु दिवस या गुरु उत्सव न कहकर केवल शिक्षक दिवस कहना बेहतर समझा था.

शिक्षक दिवस को गुरु उत्सव का नाम भी दिया जा रहा है. हालांकि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने स्पष्टीकरण दिया है कि शिक्षक दिवस को गुरु उत्सव का नाम नहीं दिया गया है, केवल छात्रों के लिए ‘गुरु उत्सव 2014' विषय पर निबंध प्रतियोगिता आयोजित की गई है, लेकिन उनका यह स्पष्टीकरण किसी के भी गले से नहीं उतर रहा. उसी तरह जैसा उनका यह स्पष्टीकरण कि प्रधानमंत्री मोदी के भाषण को सुनना अनिवार्य नहीं, ऐच्छिक है. यदि यह ऐच्छिक है, तो फिर स्कूलों से यह क्यों कहा गया है कि वे अगले ही दिन सरकार को यह रिपोर्ट भेजें कि भाषण को कितने छात्रों ने कितनी देर सुना?

पूरे विश्व में भारतीय दर्शन के व्याख्याता के रूप में प्रसिद्ध सर्वपल्ली राधाकृष्णन को क्या गुरु की महिमा और उसके जीवन में महत्व के बारे में नहीं पता था जो उन्होंने अपने जन्मदिन को गुरु दिवस या गुरु उत्सव न कहकर केवल शिक्षक दिवस कहना बेहतर समझा? क्या यह हकीकत नहीं है कि जहां शिक्षक एक मूल्य-निरपेक्ष शब्द है वहीं गुरु के साथ अनेक किस्म के अर्थ और पारंपरिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक मूल्य जुड़े हुए हैं? जब कबीर गुरु और गोविंद के बीच गुरु को पांव छूने के लिए चुन रहे थे, तो क्या उनका आशय शिक्षक से था? क्या शिक्षक को गुरु का पर्याय माना जा सकता है या माना जाना चाहिए? क्या गुरु पर जोर इसलिए तो नहीं क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के मातृ संगठन के सबसे प्रसिद्ध प्रमुख माधवराव सदाशिव गोलवलकर 'गुरुजी' के नाम से जाने जाते थे?

कारण जो भी हो, शिक्षक दिवस को गुरु उत्सव कहे जाने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण को जबर्दस्ती छात्रों पर थोपने की व्यापक प्रतिक्रिया हुई है और तमिलनाडु में भाजपा के सहयोगी दलों ने भी इसकी आलोचना की है. तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने घोषणा की है कि वे पांच सितंबर को पिछले वर्ष की तरह ही शिक्षक दिवस के रूप में मनाएंगे और सरकारी स्कूल मोदी के भाषण नहीं दिखाएंगे. गैर-सरकारी स्कूल दिखाने या न दिखाने के लिए स्वतंत्र हैं. डीएमके, पीएमके, एआईडीएमके, सीपीएम, सीपीआई और कांग्रेस ने भी शिक्षक दिवस का स्वरूप बदलने के लिए मोदी सरकार की आलोचना की है. तमिल पार्टियों का आरोप है कि दक्षिण भारतीयों पर संस्कृत और आर्य तौर-तरीके थोपे जा रहे है. उधर इस बात पर भी चिंता व्यक्त की जा रही है कि स्कूली बच्चों को स्कूल के समय के बाद भी रुकना पड़ेगा.

एक सवाल यह भी उठता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को संबोधित न करके छात्रों को संबोधित क्यों करना चाहते हैं? और दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि जब देश के अनेक स्कूलों में ढंग की इमारतें, कुर्सी-मेज, शौचालय, बिजली और पीने के पानी तक की उचित व्यवस्था नहीं है, तब उन्हें टीवी, केबल कनेक्शन, जेनरेटर और इनवर्टर की व्यवस्था करने को कहा जा रहा है ताकि प्रधानमंत्री स्कूली बच्चों को सीधे संबोधित करने का अपना शौक पूरा कर सकें.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

संपादन: ईशा भाटिया

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