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मंथन

शाकाहारी बनेंगी मछलियां

फॉर्मों में पलने वाली मछलियां ज्यादातर समुद्र की छोटी मछलियों से बनी खुराक पर निर्भर रहती हैं. लेकिन जिस तेजी से समुद्र से मछलियां खत्म हो रही है, उसे देखते हुए मछलियों के शाकाहारी चारे का इंतजाम करना होगा.

कई देशों में ट्राउट मछली को बहुत शौक से खाया जाता है. लेकिन बड़ी संख्या में इन मछलियों को पालना चुनौती से कम नहीं. ट्राउट एक शिकारी मछली है और छोटी मछलियां इसका चारा हैं. पर समुद्र, नदी, तालाबों में छोटी मछलियां खत्म होने से ट्राउट पर भी असर पड़ रहा है. छोटी मछलियों की कमी की वजह से उसे पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा.

इसी वजह से जर्मनी में कुछ वैज्ञानिक ट्राउट के लिए शाकाहारी चारा बनाने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि गुन्ना रीजे जैसे मछली पालक इससे बहुत खुश नहीं हैं. रीजे कहते हैं, "ट्राउट मछली शुद्ध शाकाहारी चारा खाकर जी सकती है, पर मुझे शक है कि इस तरह हम भविष्य की परेशानियों से निपट पाएंगे. ये शिकारी मछलियां दूसरी छोटी मछलियों को खा कर पेट भरती है. अब अचानक ये पौधों के प्रोटीन को पचाने के लिए पूरी तरह अपने एंजाइम बदल देगी, ये तो बहुत ही मुश्किल लगता है."

मांसाहार से शाकाहार

एक्वामरीन कल्चर वैज्ञानिक कार्स्टेन शुल्त्स का दावा है कि रेप्स प्रोटीन, सोया और वनस्पति तेल से मिलाकर मछलियों के लिए आदर्श शाकाहारी चारा बनाया जा सकता है. लेकिन चारा मछलियों को पसंद भी आना चाहिए और उनका शारीरिक विकास भी इतना होना चाहिए कि मछली को खाने के काम लाया जा सके.

इस प्रयोग के साथ इंसान का आर्थिक फायदा भी जुड़ा है. यह जरूरी है कि मछलियों का वजन ज्यादा हो ताकि उन्हें बाजार में मुनाफे के साथ बेचा जा सके. शुल्त्स इससे पहले आलू के प्रोटीन का इस्तेमाल कर चुके हैं, लेकिन मछलियों के लिए वह बहुत कड़वा था, "अगर चारा मछलियों को पंसद नहीं आया, अगर उन्हें इसका स्वाद अच्छा नहीं लगा, तो वे इसे खाएंगी ही नहीं. और ऐसा वे बहुत लंबे समय तक कर सकती हैं." शुल्त्स बताते हैं कि प्रयोग के जरिए उन्होंने देखा है कि मछलियां लगातार दो महीने बिना कुछ खाए रह लेती हैं, "वे भूखी मर जाएंगी, लेकिन अगर चारा पसंद नहीं, तो हरगिज नहीं खाएंगी."

Bildergalerie : Forellen

फिलहाल ट्राउट को रेपसीड से बना चारा खिलाया जा रहा है.

बदलाव से जुड़ी बहस

लेकिन क्या शाकाहारी ट्राउट इंसान के लिए उतनी ही पोषक है, जितनी की साधारण ट्राउट मछली? इसका पता आने वाले समय में चलेगा. ये जानने के लिए वैज्ञानिक मछलियों को मार कर उन्हें जमा लेते हैं. सूखी और जमी हुई मछली का फिर चूरा बनाया जाता है. इसे फिर पेट्रोलियम के साथ मिलाया जाता है. ऐसा करने से मछली का तेल अलग हो जाता है. वसा पर टेस्ट कर के मछली की सेहत की जानकारी हासिल की जाती है. शुल्त्स कहते हैं, "जब भी हमें बहुत ज्यादा वसा वाली मछली मिलती है तो हमें पता चलता है कि चारा पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हुआ. ये हमारे के लिए अहम मानक है."

रिसर्चर इसी तरह मछली में मौजूद प्रोटीन पर भी नजर रख रहे हैं. वे जानना चाहते हैं कि शाकाहारी खाने में मौजूद कितना प्रोटीन पौष्टिक फिश प्रोटीन में बदला. आने वाले समय में भी ये प्रयोग चलते रहेंगे. वैज्ञानिक खुद भी इन मछलियों को खा रहे हैं, ताकि वे जान सकें कि प्रयोग का असर कैसा हो रहा है. शुल्त्स बताते हैं, "अच्छी बात यह है कि अब तक हमें मछली के स्वाद में कोई नकारात्मक बदलाव महसूस नहीं हुआ है."

फिलहाल ट्राउट को रेपसीड से बना चारा खिलाया जा रहा है. कभी कभार आलू और काई के चारे का भी प्रयोग होता है. लेकिन मकसद साफ है कि चारा चाहे जैसा हो, मछलियों का वजन बढ़ना चाहिए, ताकि भविष्य में उन्हें इंसान खा सकें. उम्मीद है कि अगले 15 साल में रिसर्चर मछलियों के चारे का विकल्प मुहैया करा देंगे. इससे मछली पालकों को भी फायदा होगा, नदियों में मछलियों की कमी की समस्या भी सुलझ जाएगी और यह शाकाहारी चारा सस्ता तो पड़ेगा ही.

रिपोर्ट: इंगा वेगेमन/ओएसजे

संपादन: ईशा भाटिया

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