शांति से ज्यादा छवि सुधारने का मौका | दुनिया | DW | 19.03.2013
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दुनिया

शांति से ज्यादा छवि सुधारने का मौका

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा इस हफ्ते पहली बार मध्य पूर्व के दौरे पर जा रहे हैं. कार्यकाल के शुरू में उन्होंने शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की बात कही थी, लेकिन अब यह दौरा मुख्य रूप से उनकी छवि सुधारने की कोशिश है.

व्हाइट हाउस विनम्रता दिखा रहा है. उप प्रवक्ता जोश अरनेस्ट ने मार्च के शुरु में कहा था, "राष्ट्रपति ठोस शांति योजना लेकर नहीं जा रहे हैं." लेकिन बराक ओबामा का विचार है कि शांति संधि दोनों पक्षों के हित में है, इसलिए वे इस्राएल और फलीस्तीनियों के साथ शंति प्रक्रिया पर बातचीत करेंगे. लेकिन राष्ट्रपति का इस्राएल, वेस्ट बैंक और जॉर्डन दौरे का लक्ष्य दूसरा है. अर्नेस्ट का कहना है, "उनकी बड़ी दिलचस्पी है कि अपने दौरे पर वे इस्राएल के नागरिकों से मुखातिब हों और वे इसे इस्राएल की मदद और सुरक्षा में अपने योगदान के प्रदर्शन का मौका समझते हैं." इसलिए ओबामा अपना भाषण संसद के सदस्यों के सामने नहीं देंगे.

इस्राएल के लिए ओबामा सरकार की व्यापक सैनिक और वित्तीय मदद के बावजूद राष्ट्रपति पर अक्सर आरोप लगते हैं कि वे इस्राएल का पूरा समर्थन नहीं कर रहे हैं. ये आरोप इस्राएली तो लगाते ही हैं, विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी भी यह आरोप लगाती है. इसे मार्च 2010 में बेंजामिन नेतान्याहू के साथ ओबामा के बर्ताव से भी हवा मिली है. तब नेतान्याहू व्हाइट हाउस में मेहमान थे, लेकिन ओबामा ने उनके साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस करने से इनकार कर दिया और बैठक अचानक छोड़कर चले गए.

ओबामा-नेतान्याहू रिश्ते

तब से दोनों नेताओं के रिश्ते ठंडे हैं. ओबामा को यहूदी बस्तियों के विस्तार को रोकने पर नेतान्याहू का आश्वासन लेने का विचार छोड़ना पड़ा था. अमेरिका के छह विदेश मंत्रियों को मध्य पूर्व पर सलाह देने वाले आरोन डेविड मिलर कहते हैं, "मौजूदा दौरा इन मतभेदों को मिटाने का प्रयास है कि राष्ट्रपति इस्राएल के प्रति विद्वेष रखते हैं या उसके साथ उनका कोई संवेदनात्मक रिश्ता नहीं है." यह संभव नहीं लगता कि ओबामा फिर से नेतान्याहू पर बस्ती नीति पर दबाव डालेंगे. वे इस्राएली प्रधानमंत्री के साथ इलाके की दूसरी प्रमुख समस्या ईरान के साथ परमाणु विवाद पर बात करना चाहते हैं. आरोन डेविड मिलर कहते हैं कि ईरान के खिलाफ प्रतिबंध काम नहीं कर रहे हैं, "यदि कूटनीति भी काम नहीं करेगी तो राष्ट्रपति को सैनिक विकल्प पर विचार करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा."

ओबामा और नेतान्याहू के बीच बातचीत के दूसरे मुद्दों की भी कमी नहीं है. मिस्र की राजनीतिक अस्थिरता और सीरिया का संकट ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर दोनों नेताओं की दिलचस्पी होनी चाहिए. उन्होंने इसमें अतिरिक्त योगदान दिया है कि मध्य पूर्व की शांति प्रक्रिया अमेरिकी सरकार की संकट सूची पर पहले स्थान पर नहीं है. इसके बावजूद विवाद में शामिल दोनों ही पक्ष उम्मीद लगाए बैठे हैं. इस्राएल के राष्ट्रपति शिमोन पेरेस का मानना है कि राष्ट्रपति ओबामा का दौरा शांति प्रक्रिया को फिर से शुरू करने का अच्छा मौका है.

रॉक 'न रोल है शांति प्रक्रिया

मध्य पूर्व की शांति प्रक्रिया अटकी पड़ी है. वाशिंगटन के ब्रूकिंग इंस्टीट्यूट के खालेद एलगिंदी कहते हैं, "फलीस्तीनी नेताओं की जिंदगी एक आजाद फलीस्तीनी राज्य की दिशा में प्रगति पर निर्भर है." एलगिंदी ने सालों तक फलीस्तीनी नेताओं को इस्राएल के साथ उनकी बातचीत में सलाह दी है. उनका कहना है कि फलीस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास काफी समय से अमेरिकी योगदान की मांग कर रहे हैं. शुरुआती उम्मीदों के बाद ओबामा ने खासकर अपने विशेष दूत जॉर्ज मिचेल के इस्तीफे के बाद शांति प्रक्रिया को कोई प्राथमिकता नहीं दी. उन्होंने अपना ध्यान घरेलू नीति पर लगाया, स्वास्थ्य बीमा, आप्रवासन और हथियार कानून के सुधारों पर. और अगले साल होने वाले कांग्रेस चुनावों पर, जिसमें डेमोक्रैटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल करना चाहती है.

मध्यपूर्व विशेषज्ञ मिलर का कहना है कि ओबामा शांति प्रक्रिया में अकेले कुछ कर भी नहीं सकते हैं. इस्राएल और फलीस्तीनी दोनों ही अपनी घरेलू समस्याओं से जूझ रहे हैं. उन्हें किसी भी समाधान का हिस्सा बनना होगा, लेकिन ऐसा इस समय संभव नहीं दिख रहा है. मिलर कहते हैं, "यह मानना कठिन है कि इन परिस्थितियों में अमेरिका राष्ट्रपति बहुत कुछ कर सकता है." मिलर के मुताबिक इसमें इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि जॉन केरी अब विदेश मंत्री हैं और फिलिप गॉर्डन मध्यपूर्व के नए समन्वयक. "मौलिक फैसले बराक ओबामा लेते हैं."

तो क्या मध्य पूर्व शांति प्रक्रिया का अंत हो गया है. मिलर कहते हैं कि यह रॉक 'न रोल की तरह है, जो कभी नहीं मरता. लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति कुछ कर सकें, इसके लिए पहल या तो विवाद में फंसे पक्षों की ओर से होनी होगी या दबाव इतना बढ़ जाए कि मौजूदा हालत को बनाए रखना संभव न रहे. मिलर और एलगिंदी दोनों का मानना है कि फिलहाल हालात ऐसे नहीं हैं. लेकिन एलगिंदी का कहना है कि इस्राएल की बस्ती नीति नए तथ्य बना रही है. समस्या यह है कि नई बस्तियां मध्यपूर्व में दो राज्यों के समाधान को असंभव बना सकती है. एलगिंदी कहते हैं, "और ऐसा बहुत जल्द हो सकता है."

रिपोर्ट: क्रिस्टीना बैर्गमन/एमजे

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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