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दुनिया

शहरी क्षेत्रों में बढ़ती बाल-मजदूरी

आज भी भारत के शहरी क्षेत्रों में बाल मजदूरी की समस्या बनी हुई है. यूनिसेफ के मुताबिक भारत में नौ साल से भी कम उम्र के अनगिनत बच्चे फैक्ट्री-कारखानों, पर्यटन उद्योग और निर्माण क्षेत्र में मजदूरी कर रहे हैं.

बाल मजदूरी पर संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2001 में 5 से 9 साल तक की उम्र के करीब 14.6 फीसदी बच्चे मजदूरी कर रहे थे, लेकिन साल 2011 में यह आंकड़ा बढ़कर 24.8 फीसदी हो गया. 

इसी दशक में शहरी बाल मजदूरों की संख्या में भी इजाफा हुआ. साल 2001 में यह आंकड़ा 2.1 फीसदी था जो साल 2011 तक बढ़कर 2.9 फीसदी हो गया. कार्यकर्ताओं के मुताबिक देश भर में बाल मजदूरों की संख्या घटी जरूर है लेकिन अब भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है. साल 2001 के 5 फीसदी की तुलना में साल 2011 में बाल मजदूरों की तादाद गिरकर 3.9 फीसदी तक पहुंच गयी.

तमिलनाडु की एक गैरलाभकारी संस्था चाइल्ड राइट्स ऑब्जरवेटरी के एंड्रयू सेसुराज के मुताबिक इस अध्ययन में संगठित क्षेत्र में काम करने वाले बच्चों को ही शामिल किया गया था. एंड्रयू ने बताया जो लड़कियां घरों में काम कर रही हैं और जो बच्चे कृषिकार्यों में लगे हुए हैं, उन्हें इस अध्ययन में शामिल नहीं किया गया.

रिपोर्ट को तैयार करने वाली हेलेन आर सीकर बताती हैं कि अधिकतर बाल मजदूर बाहर से आते हैं इसलिए न तो इनका कोई पता-ठिकाना होता है और न ही ये सरकारी सूची में शामिल होते हैं.

कार्यकर्ताओं के मुताबिक कृषि में घटते लाभ के चलते ग्रामीण परिवारों के बच्चों को मजबूरन शहरों का रुख करना पड़ता है. अध्ययन बताते हैं कि शिक्षा नीतियों के चलते अब देश में साक्षरता का स्तर जरूर बढ़ा है लेकिन इसके बावजूद बच्चों को अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए मजबूरन काम करना पड़ता है.

चाइल्ड राइट्स ऐंड यू नामक गैर लाभकारी संस्था चलाने वाली कोमल गनोत्रा कहती हैं कि भारतीय परिवारों को आजकल नए तरह के काम सौंपे जा रहे हैं. अब इन्हें तैयार किए गए माल के मुताबिक भुगतान किया जाता है. इस के चलते मां-बाप अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा काम करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं ताकि अधिक से अधिक पैसा कमाया जा सके. ऐसे कामों में जूते बनाना, गलीचे, कपड़े तैयार करना, चमड़े के सामान बनाना मुख्य है.

वीवी गिरि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ लेबर के सहयोग से तैयार की गई रिपोर्ट में देश के 32 बाल मजदूर केंद्रों की पहचान की गई है. इन हॉटस्पॉट्स में हैदराबाद, 67,336 बाल मजदूरों के साथ, तो जालोर 50,440 बाल मजदूरों के साथ सूची में सबसे ऊपर है. रिपोर्ट के मुताबिक देश भर में बाल मजदूरी 2 फीसदी की धीमी दर से घट रही है और यही दर कायम रही तो देश को बाल मजदूरी से निपटने में तकरीबन 200 साल और लग सकते हैं.

एए/आरपी (रॉयटर्स)

 

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