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विज्ञान

शवों के पहचान की नई तकनीक

आज भी बोसनिया युद्ध के हज़ारों शिकार लापता हैं. सामुहिक कब्रों में हज़ारों लाशें हैं, जिनकी शिनाख़्त नहीं हो सकी है. कैसे इन हड्डियों से पता लगाया जाए कि कौन थे वे? यहां जर्मनी की तकनीक काम आ रही है.

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15 साल पहले 11 जुलाई 1995 को बोसनिया में पिछले 50 सालों में यूरोप का सबसे बड़ा युद्ध अपराध हुआ था. अनुमान है कि चंद दिनों के अंदर सर्ब पृथकतावादियों ने बोसनिया के लगभग साढ़े आठ हज़ार लोगों की हत्या की थी और स्रेब्रेनित्सा नगर के पास सामूहिक कब्रों में उनकी लाशें दफ़ना दी थी. आज तक इनमें से बहुत सी लाशों की शिनाख़्त नहीं हो पाई है. अब इनके जेनेटिक मॉलेक्युल्स की जांच के लिए गुमशुदा लोगों की अंतर्राष्ट्रीय समिति आईसीएमपी नई तकनीकों का सहारा ले रही है. ड्युसेलडोर्फ़ के नज़दीक स्थित एक जर्मन बायो तकनीक उद्यम ऐसी ही तकनीक मुहैया करा रही है. 

ड्युसेलडोर्फ़ के नज़दीक हिल्डेन में बायो तकनीक उद्यम किआगेन. यहां प्रयोगशाला की मेज़पर हमें माइक्रोवेव की शक्ल का एक नीले रंग का प्लास्टिक का सेफ़ दिखता है. मारियो शेरर यहां वैज्ञानिक के रूप में काम करते हैं. सेफ़ को खोलकर वे उसके अंदर एक प्लास्टिक की थैली को लगाते हैं. इसकी व्याख्या करते हुए वे कहते हैं, ' मैंने इसमें अपना नमूना डाल दिया है. अब यह मशीन इसकी जांच करेगी. पहले इसकी कोशिकाओं को अलग किया जाएगा, ताकि उसके जेनेटिक कोड का पता लगाया जा सके.'

मारियो शेरर कुछ एक बटन दबाकर मशीन को चालू कर देते हैं. सेफ़ के अंदर एक सेंट्रीफ़्युगल मशीन है, जिसके ज़रिये बायो नमुने को ज़ोर से घुमाया जाता है. इससे नमूना साफ़ भी होता है. दूसरी प्रक्रियाओं के बारे में वे कहते हैं,'इसमें ख़ास फ़िल्टर भी हैं, जिसमें जेनेटिक तत्व आ जाते हैं, जबकि बाकी हिस्से बह जाते हैं. इस तरह मुझे नमूने के जीन्स मिल जाते हैं, जिनमें डीएनए की पहचान छिपी होती है.'

यह नीली मशीन अपने काम में खरी उतरी है. हिल्डेन की इस प्रयोगशाला में ख़ून की जांच के ज़रिये डीएनए का पता लगाने जैसे आसान कामों के लिए इसे बनाया गया था. जल्द ही पता चला कि इससे काफ़ी कुछ किया जा सकता है. मिसाल के तौर पर काफ़ी गंदी हो चुकी हड्डियों से डीएनए का पता लगाना, जिनमें इनकी मात्रा बहुत कम होती है. मारियो शेरर कहते हैं, 'काफ़ी परेशानियां भी आईं, ख़ासकर ज़मीन में गड़ी काफ़ी पुरानी हड्डियों के मामले में, क्योंकि भौतिक रासायनिक प्रक्रियाओं और बैक्टेरिया की वजह से वे काफ़ी हद तक नष्ट हो चुकी होती हैं. फ़िल्टर के प्रयोग का मकसद यही है कि जेनेटिक तत्वों को, जहां तक हो सके, साफ़ तरीके से प्राप्त किया जा सके.'

गुमशुदा लोगों की अंतर्राष्ट्रीय समिति आईसीएमपी के वैज्ञानिक किआगेन की इस तकनीक का उपयोग कर रहे हैं. उनका काम है 15 साल पुरानी हड्डियों से डीएनए का पता लगाना. सारायेवो में आईसीएमपी की डीएनए प्रयोगशाला के रेने हुएल कहते हैं,'अधिकतर मामलों में पहचान के लिए डीनए ही अकेला सुराग है. यह गुमशुदा लोगों को उनका नाम वापस लौटाता है. यहां किसी दूसरे तरीके से यह मुमकिन न था.'

युद्ध के बाद बोसनिया में अभी तक हज़ारों लोग गुमशुदा हैं. सामूहिक कब्रों में मिली लाशों की अभी तक शिनाख्त नहीं की जा सकी है. कोल्ड स्टोरेज में सैकड़ों बोरों में उनकी हड्डियां हैं. रेने हुएल कहते हैं कि लोगों की पहचान मुश्किल है, क्योंकि युद्ध अपराध को छिपाने के लिए उनका नामोनिशान मिटा देने की कोशिश की गई थी,'एक लाश को एक ही कब्र में नहीं, बल्कि टुकड़े-टुकड़े कर कई कब्रों में दफ़नाया गया. परिवार को गुमशुदा लोगों के बारे में बताना हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है.'

विशेषज्ञों के अनुसार हड्डियों से मिला डीएनए किसी व्यक्ति का जेनेटिक अंगूठा निशान है. गुमशुदा लोगों के ख़ून के नमूनों के साथ उन्हें मिलाया जाता है. आईसीएमपी के विशेषज्ञ अब तक 15 हज़ार से अधिक गुमशुदा लोगों की किस्मत का पता लगा चुके हैं. पिछले एक साल में और 775 लाशों की पहचान की जा सकी है. ये लाशें उनके परिवार के लोगों को दी गई हैं. स्रेब्रेनित्सा के नरसंहार की बरसी, 11 जुलाई को उन्हें दफ़नाया गया. इस प्रयोगशाला की तकनीक का आने वाले दिनों में अन्य इलाकों में भी इस्तेमाल किया जाने वाला है.

रिपोर्टः उज्ज्वल भट्टाचार्य

संपादनः एन रंजन

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