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दुनिया

शर्म और हया की तलवार

फजलन बीबी जब एक खुले मैदान में दर्जन भर मर्दों के सामने लाई गईं तो उन्हें नहीं पता था कि उनके साथ क्या होने वाला है. पंचायत के लोग उनके भाई के मामले की सुनवाई कर रहे थे जिसका किसी और विवाहित महिला के साथ संबंध है.

फजलन बीबी की उम्र 30 के ऊपर है. उनका तलाक हो चुका है. सुनवाई बहुत देर नहीं चली क्योंकि उनके भाई के पास सफाई में कहने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था. कबायली अदालत में फैसला किया गया कि फजलन को दूसरे पक्ष को सौंप दिया जाए ताकि वे अपने अपमान का बदला ले सकें.

इसके बाद क्या हुआ इस बारे में दो बातें हैं. समाजसेवी संगठनों का कहना है कि उनके भाई की प्रेमिका के परिवार वालों ने फजलन बीबी के साथ बलात्कार किया, लेकिन पुलिस इस बात से इनकार कर रही है.

पाकिस्तान में महिलाओं पर हिंसा के खिलाफ काम करने वाली समाज सेविका मुख्तारन माई ने फजलन से पिछले हफ्ते रावलपिंडी में मिलने की कोशिश की. मुख्तारन माई ने कहा, "मुझे कई लोगों से पता चला है कि उनके साथ बलात्कार हुआ है. मुझे उनके घर के पास करीब 30 आदमियों ने रोक लिया और लौटने पर मजबूर किया."

दूसरी मुख्तारन नहीं चाहिए

मुख्तारन माई 2002 में ऐसे ही एक मामले की शिकार हुई थीं, जब पंचायत के फैसले पर उनके साथ दुष्कर्म हुआ. आज वह हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए एक संस्था चलाती हैं. क्षेत्रीय पुलिस अधिकारी शाहिद रमजान ने कहा कि फजलन को एक घर में ले जाकर निर्वस्त्र किया गया लेकिन इससे ज्यादा कुछ नहीं हुआ. उन्होंने बताया, "हमने मामले की विस्तृत जांच की है और अभी तक बलात्कार के कोई प्रमाण नहीं मिले हैं. यहां तक कि पीड़िता ने भी इससे इनकार किया है."

Mukhtaran Mai

2002 में मुख्तारन माई के साथ दुष्कर्म हुआ

फजलन के साथ यह घटना 24 जनवरी को हुई. न उसने खुद ना ही परिवार के सदस्यों ने पुलिस से संपर्क करने की कोशिश की. मीडिया और सामाजिक संगठनों में मामले की चर्चा के बाद पुलिस ने सुधबुध ली और एक हफ्ते बाद मामले की जांच शुरू की. घटना की खबर देने वाली पत्रकार तहसीन रजा ने कहा परिवार वालों के लिए मामला पहले ही खत्म हो चुका था क्योंकि उन्होंने तो कबायली सरदारों के फैसले के आगे सिर झुका दिया था.

रजा ने बताया, "मैंने उसके गांव जाकर लोगों से बात की. लोगों ने बताया उसका परिवार नहीं चाहता कि वह भी दूसरी मुख्तारन माई बन जाए." कई लोग बलात्कारियों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए माई की हिम्मत की तारीफ तो करते हैं लेकिन सेक्स जैसे मुद्दे पर इतना खुल कर बोलने के लिए निंदा भी करते हैं.

बदनामी का डर

सदियों से चली आ रही प्रथाओं ने महिलाओं को सिर झुका कर जुल्म सहने को ही जीवन मानने के लिए राजी कर लिया है. यहां तक कि बलात्कार भी. सिर्फ इसे तोड़ना ही चुनौती नहीं. वे जो पुलिस और अदालत तक मामला ले जाने की हिम्मत करते हैं उन्हें अगर कभी न्याय मिले भी तो इसके लिए सालों इंतजार करना पड़ता है.

मुख्तारन माई के मामले में 10 लोगों को बलात्कार और गैरकानूनी अदालत चलाने का दोषी पाया गया. लेकिन सिर्फ एक को उम्र कैद की सजा सुनाई गई. वह भी घटना के आठ साल बाद 2010 में.

गृह राज्यमंत्री बालिगुर रहमान ने स्वीकार किया था कि पिछले पांच सालों में इस्लामाबाद में दर्ज बलात्कार के 103 मामलों में से एक भी व्यक्ति को दोषी करार नहीं दिया गया है. बाल यौन शोषण के खिलाफ काम करने वाली संस्था साहिल के प्रोग्राम ऑफिसर अता मुहीउद्दीन मानते हैं कि सामाजिक बाधाएं और फैसलों में देरी महिलाओं के खिलाफ बढ़ रही यौन हिंसा की वजह हैं. उन्होंने बताया, "हमारे आकड़ों के अनुसार 1996 से बलात्कार पीड़ितों की संख्या में 7.6 फीसदी की वृद्धि हुई है."

औरत फाउंडेशन की राबिया हादी कहती हैं कि 2012 में देश में बलात्कार के 822 मामले हुए. 2013 के आकड़ें इकट्टा करने पर वह अभी काम कर रही हें, लेकिन मानती हैं कि यह संख्या 2012 से ज्यादा हैं. महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली सारह जमान ने बताया बलात्कार के 70 फीसदी मामले पुलिस या अदालत तक ही नहीं पहुंचते. उन्हें बदनामी और पुलिस के सवाल जवाब का डर होता है.

माई कहती हैं, "तकलीफ और सदमा तो जिंदगी भर के लिए रह जाता है, लेकिन अपराध करने वालों को सजा मिलने से थोड़ा सुकून तो मिलता ही है."

एसएफ/एजेए (डीपीए)

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