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विज्ञान

शरीर में बिजली का सर्किट

आने वाले दिनों में उम्मीद है कि लकवा के मरीजों की सेहत पर नजर रखने के लिए एक बेहद पतला इलेक्ट्रिकल सर्किट उनके शरीर ही में लगाया जा सकेगा. खाना पैक करने वाली पन्नी से पांच गुना पतला यह सर्किट जापान तैयार कर रहा है.

टोक्यो यूनिवर्सिटी में यह उपकरण तैयार करने वाली टीम का कहना है कि बेहद पतली झिल्ली में लिपटा यह उपकरण खास है क्योंकि इसे एक गेंद की तरह मोड़ कर या फिर फैला कर रखने के बाद भी यह काम करता है. सर्किट को दुनिया के सामने पेश करते वक्त रिसर्चरों ने बताया कि शरीर का तापमान, ब्लड प्रेशर, दिल की धड़कनें और शरीर से जुड़े हर तरह के आंकड़ों पर नजर रखने में इसका इस्तेमाल हो सकता है.

रिसर्च टीम के सदस्यों का कहना है कि ऐसे लोग जो केवल अपनी जीभ हिला सकते हैं उनके मुंह में ऊपरी हिस्से में इस उपकरण को लगा या जा सकता है और इस तरह से यह संचार उपकरण को चलाने में टच पैड की तरह काम करेगा. टोक्यो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ताकाओ सोमेया ने बताया, "इसे हर तरह की सतह से जोड़ा जा सकता है और जिस शख्स में यह लगाया गया है उसकी गतिविधियों पर इससे बाधा नहीं पड़ती." आमतौर पर इस तरह के उपकणों में सिलिकॉन या इसी तरह की दूसरी सख्त चीजों का इस्तेमाल होता है जिसके कारण इन उपकरणों को पहनने में मुश्किल होती है. नया लचीला सर्किट इस तरह की दिक्कत को कम या पूरी तरह से खत्म कर देगा.

रिसर्च करने वालों का दावा है कि सर्किट में लगे बेहद पतले सेंसर उन लोगों की जिंदगी भी बेहतर बना सकते हैं जो कृत्रिम हाथ या पांव का इस्तेमाल करते हैं. बाहों या शरीर के दूसरे हिस्सों पर लपेटने के बाद दिमाग से मांसपेशियों को भेजे जाने वाले संकेत ये तुरंत महसूस कर सकेगा. इसके कारण शरीर के अंगों में हरकत लाना आसान हो सकता है. उनके लचीले होने का मतलब है कि लोग अलग अलग जगहों पर कहीं ज्यादा सेंसर लगा सकेंगे जिसका नतीजा कृत्रिम अंगों की तेज और बेहतर हरकत के रूप में सामने आएगा.

Symbolbild Nachdenken

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इस सर्किट का इस्तेमाल एथलीटों के लिए शॉक प्रूफ सेंसर के रूप में भी किया जा सकता है जो कठिन कसरत के दौरान उनके शरीर के तापमान और दिल की धड़कन पर नजर रखेगा. इस सर्किट की मोटाई महज 2 माइक्रोमीटर है और वजन है तीन ग्राम प्रति स्क्वेयर मीटर. खाना पैक करने के लिए जो पन्नी इस्तेमाल की जाती है वह 10 माइक्रोमीटर मोटी होती है. यह इतना हल्का है कि जब जमीन पर गिराया गया तो यह खूब हिलता डुलता और चक्कर खाते हुए गिरा. इतना ही नहीं इसकी गति और मूवमेंट किसी चिड़िया की पंख की तुलना में भी काफी ज्यादा थी.

सोमेया ने बताया कि उच्च स्तर की बेहद पतली इंसुलेटिंग परतों को बनाने में सफल होने के बाद ही यह उपकरण बनाने में सफलता हाथ लगी. मानव शरीर में जो लवणयुक्त तरल होता है उनके अंदर रखने पर भी यह उपकरण दो हफ्ते से ज्यादा तक काम करता रहा और इसने यह संभावना भी जगा दी है कि भविष्य में आंकड़े जमा करने के लिए यह शरीर के भीतर भी लगाया जा सकेगा. हालांकि सोमेया का कहना है कि ऐसा करने से पहले अभी बहुत सी और रिसर्च करनी होंगी. फिलहाल जिस पतली झिल्ली में इसे लपेटा गया है, त्वचा पर उसके असर के बारे में अभी सारी जानकारी नहीं मिली है. हो सकता है कि इससे त्वचा पर फुंसियां निकलें. इस उपकरण के लिए इतना छोटा और भरोसेमंद उर्जा यंत्र बनाना भी एक बड़ी चुनौती है.

एनआर/एएम (एएफपी)

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