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दुनिया

शरणार्थी संकट पर जर्मनी का पहला कदम

हिंसा व हालात के मारे लोगों का सैलाब कई आशाओं के साथ यूरोप का रुख कर रहा है. लेकिन यूरोपीय संघ के ज्यादातर देश इसे बला समझ दूसरे के सिर टाल रहे हैं. जर्मनी ने शरण की प्रक्रिया आसान की.

शरणार्थी संकट में साझा कदम उठाने में विफलता के चलते यूरोपीय संघ की आलोचना हो रही है. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सबसे बड़ा विस्थापन संकट झेल रहे यूरोपीय देश एकमत होकर कोई फैसला नहीं कर पा रहे हैं, वहीं लाखों की संख्या में शरणार्थियों का आगमन जारी है. असमंजस के बीच जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल को भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है. शरणार्थियों के खिलाफ हो रही हिंसा को लेकर उनकी चुप्पी पर लोगों से सवाल किए. बीते हफ्ते जर्मनी के हाइडेनाऊ शहर में शरणार्थी शिविरों पर हमले हुए.

अब मैर्केल सामने आ रही हैं. वो उग्र दक्षिणपंथियों को निशाना बने शरणार्थी शिविर का दौरा कर रही हैं. इससे पहले मंगलवार को जर्मनी ने कहा कि सीरियाई शरणार्थियों को उनके दाखिले वाली जगह से वापस भेजने की प्रक्रिया रोक दी गई है. इसके साथ ही जर्मनी यूरोपीय संघ का पहला ऐसा देश बन गया जिसने शरण के आवेदन की अर्जी को भी आसान कर दिया है. आवेदन में प्रक्रिया उन लोगों के लिए आसान की गई है जो बर्बर युद्ध वाले इलाकों से भागकर आए हैं.

यूरोपीय आयोग की प्रवक्ता नताशा बेरटाउड ने जर्मनी की सराहना करते हुए कहा, "यूरोप में शरण पाने की उम्मीद में बड़ी संख्या में आ रहे विस्थापितों के मामले में हम बाहरी सीमा वाले सदस्य देशों को अकेला नहीं छोड़ सकते."

Deutschland Francois Hollande und Angela Merkel PK in Berlin

शरणार्थियों के मुद्दे पर फ्रांस और जर्मनी में बातचीत

डबलिन समझौते के तहत शरण पाने के लिए यूरोप पहुंचने वाले शख्स के आवेदन पर वही देश कार्रवाई करता है जहां विस्थापित पहली बार पहुंचे. इस नियम के तहत अब तक सारा भार ग्रीस और इटली के कंधों पर पड़ा है. जान जोखिम में डालकर भूमध्य सागर पार कर लाखों लोग पहले इटली और ग्रीस ही पहुंचे. ग्रीस खुद आर्थिक रूप से खस्ताहाल है. इटली की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं हैं. ऐसे में लाखों विस्थापितों को रहने की जगह मुहैया कराना, उनके खान पान और स्वास्थ्य का ध्यान रखना तथा उनकी शरण अर्जी पर सुनवाई करना आसान नहीं है.

अब ऐसे ही हालात हंगरी में भी खड़े हो गए हैं. विस्थापितों की रिकॉर्ड संख्या सर्बिया से वहां दाखिल हो रही है. विस्थापितों को रोकने के लिए हंगरी सर्बिया की सीमा पर कटीले तारों की वाली बाड़ लगा रहा है. हंगरी की पुलिस सीमा पर गश्त भी शुरू करने वाली है.

विस्थापितों की बड़ी संख्या के चलते मेसेडोनिया ने बीते हफ्ते इमरजेंसी लगा दी और सीमा बंद कर दी. हालांकि सीमा पर विस्थापितों के साथ हिंसक झड़प के बाद बॉर्डर को खोल दिया गया. इराक के मोसुल से भागकर यूरोप पहुंचे 29 साल के आईटी इंजीनियर ने मेसेडोनिया के अनुभव का जिक्र करते हुए कहा, "हम दो दिन मेसेडोनिया में रुके. दंगे बेहद बुरे थे. पुलिस ने बंदूक और आंसू गैस का इस्तेमाल किया. मैंने एक बुजुर्ग महिला को पिटते हुए देखा, उनके पैसे और कागजात छीन लिए गए."

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी का अनुमान है कि जल्द ही हर दिन 3,000 विस्थापित मेसेडोनिया पहुंचने लगेंगे, इनमें बच्चे भी होंगे. ग्रीस और इटली में इस साल के अंत तक तीन लाख लोगों के आने का अनुमान है. अकेले जर्मनी में ही इस साल शरण के लिए 10 लाख लोगों की अर्जी आने की संभावना है. जनवरी 2015 से अब तक भूमध्य सागर में डूबकर 2,370 लोगों को मौत हो चुकी है.

शरणार्थी संकट निश्चित रूप से पश्चिमी बाल्कान इलाके के नेताओं के वियना सम्मेलन में भी गूंजेगा. जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल भी उसमें भाग लेंगी. हाल के समय में बाल्कान का रास्ता यूरोपीय संघ की तरफ आने के लिए ज्यादा इस्तेमाल होने लगा है. सीरिया, इराक, अफगानिस्तान और अफ्रीकी देशों के अलावा अल्बानिया और कोसोवो के लोग भी अपनी मिट्टी छोड़ यूरोपीय संघ की तरफ आ रहे हैं.

ओएसजे/एमजे (डीपीए, एएफपी)

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