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दुनिया

शरणार्थी या जर्मन भेदिए

जर्मनी में एक सरकारी दफ्तर राजनीतिक शरण मांगने वालों से खुफिया पूछताछ करता रहा है. यह दफ्तर जल्द ही बंद कर दिया जाएगा. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि शरणार्थियों से पूछताछ नहीं होगी.

यूं तो करीब 50 साल से खुफिया विभाग का यह दफ्तर काम कर रहा है लेकिन आम तौर पर लोगों को इसकी जानकारी नहीं थी. इसका नाम "पूछताछ कार्यालय" (एचबीडब्ल्यू) है, जो जर्मन विदेशी खुफिया तंत्र बीएनडी का हिस्सा है. पिछले साल लोगों को पता चला कि यह दफ्तर राजनीतिक शरणार्थियों से गुप्त रूप से जानकारी इकट्ठा कर रहा है. इसके बाद जर्मन सरकार ने एचबीडब्ल्यू को बंद करने का फैसला किया है.

अप्रैल में विपक्षी वाम पार्टियों ने इस बारे में जानकारी मांगी, तो संसद को बताया गया कि फिलहाल 40 लोग इस दफ्तर के लिए काम करते हैं. सरकार ने डीडब्ल्यू को बताया कि 30 जून को एचबीडब्ल्यू को बंद कर दिया जाएगा. लेकिन कई नेताओं का मानना है कि सिर्फ इतने भर से समस्या दूर नहीं होगी. लेफ्ट पार्टी के उपाध्यक्ष यान कोर्ते का कहना है, "बीएनडी सिर्फ अपने दरवाजे पर नई तख्ती लगा देगा और जिन लोगों को जरूरत है, वे फिर इसके जाल में फंस जाएंगे." जर्मन सरकार ने लेफ्ट पार्टी को जानकारी दी है कि बीएनडी आगे भी राजनीतिक शरण मांगने वालों के बारे में जानकारी इकट्ठी करता रहेगा. बाद में लेफ्ट पार्टी ने यह सूचना समाचार एजेंसी डीपीए को दे दी.

मजबूरी का फायदा

प्रवासन कानून के जानकार और राजनीतिक शरणार्थियों के लिए प्रो असाइल नाम की संस्था चलाने वाले विक्ट फाफ का कहना है कि उन्हें इस सवाल जवाब से कोई परेशानी नहीं है लेकिन इसमें पारदर्शिता होनी चाहिए. उनके मुताबिक मुश्किल यह है कि "अगर राजनीतिक शरण के आवेदक को यह शंका हो जाए कि उसे सिर्फ शरणार्थी समझा जाए, तो उसके आवेग में आकर वह खुली और ज्यादा विस्तृत जानकारी देता चला जाता है." उनका कहना है कि अगर इन लोगों से विदेशी खुफिया जानकारी ली जाती है, तो यह कानूनी नहीं है.

फाफ का कहना है, "राजनीतिक शरण की अपील करने वाले को इस बात का भरोसा होना चाहिए कि वह जो कुछ कह रहा है, उसे साझा नहीं किया जाएगा और उसका इस्तेमाल सिर्फ राजनीतिक शरण के आवेदन के लिए किया जाएगा."

इस बात की भी रिपोर्टें हैं कि इन लोगों से हासिल जानकारी दूसरे देशों के खुफिया विभागों से भी बांटी गई. नवंबर 2013 में बीएनडी ने इस बात की पुष्टि की थी कि विवादित दफ्तर से जमा की गई जानकारी अंतरराष्ट्रीय साझीदारों के लिए उपलब्ध होती है. लेफ्ट पार्टी ने जब इस मुद्दे पर सरकार से सवाल किया, तो जवाब मिला कि ये सामान्य जानकारी विदेशी खुफिया विभागों के साथ आगे भी बांटी जाती रहेगी.

सूचना का इस्तेमाल

हालांकि यह मामला उस वक्त विवादित हो सकता है, जब मिसाल के तौर पर किसी विदेशी धरती पर अमेरिका के लक्षित हमले में जर्मन एजेंसी बीएनडी की जानकारी का इस्तेमाल किया गया हो. इस बात पर भी विवाद है कि किन आंकड़ों को साझा किया जा सकता है. संघीय सरकार के विचार से मोबाइल फोन का डाटा लक्षित हमले के लिए बहुत सटीक नहीं होता. हालांकि आईटी एक्सपर्ट इससे इत्तेफाक नहीं रखते. उनका कहना है कि दुनिया के किसी भी हिस्से से किसी मोबाइल की जगह का पता लगाना संभव है. जर्मन समाचारपत्र जुडडॉयचे साइटुंग और सार्वजनिक ब्रॉडकास्टर एनडीआर का कहना है कि अमेरिका ने जर्मनी में राजनीतिक शरणार्थियों की जानकारी पर ड्रोन हमले किए हैं. मिसाल के तौर पर फोन नंबर जैसे आंकड़ों से संदिग्ध आतंकवादियों को पकड़ा जा सकता है या उन्हें निशाना बनाया जा सकता है.

संघीय सरकार का कहना है कि इस तरह के मामलों में जानकारी की अदला बदली पर रोक लगनी चाहिए. इसके मुताबिक, "सूचना की अदला बदली का इस्तेमाल किसी हत्या को न्यायोचित ठहराने के लिए नहीं किया जाना चाहिए."

रिपोर्टः स्वेन पोहले/एजेए

संपादनः महेश झा

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